समस्याओं की वास्तविकता भाग - 2


प्रिय बहनों इस ऑडियो सीरीज में मैं आप सभी का एक बार फिर से स्वागत करती हूँ।

ये पहले ऑडियो का शेष भाग हैं, पहले ऑडियो में हम ने बहनों की समस्याएँ, उनके कारण और उनके समाधान को प्रस्तुत किया। हमने पहले ऑडियो में केवल एक ही समस्या जो परिवार से जुड़ी हैं उसके बारे में और उस समस्या से जुड़ी केवल एक ही कारण पर बात की थी। इस बचें हुए ऑडियो सीरीज को हम शुरू करते हैं, हम इस ऑडियो में समस्याओं के साथ साथ समाधान पर भी बात करते जाएंगे ताकि आप समस्या और उसके समाधान दोनों को पूर्ण रूप से समझ सकें।

प्रिय बहनों मेरा आप से निवेदन है़ कि कृपया करके इस ऑडियो सत्र को पूरा सुनें, बिना सुने किसी भी निर्णय पर ना पहुँचे। आइए, हम शुरू करते है़ पहले ऑडियो के शेष भाग को, हम जवान बच्चों और माताओं की समस्या पर बात कर रहे थे जो बहनें जवान बच्चों की आदतों से परेशान है़ वह बहनें जवान बच्चों से कभी भी गलत भाषा का प्रयोग न करें। आप उन्हें मौका दे उन्हें उनका पक्ष रखने के लिए, आप उनकी बात को धैर्य से सुनें अपनी सलाह जरूर दें उन पर अपनी सलाहें थोपे नहीं; उनके लिए निरन्तर प्रार्थना करते रहें आप प्रभु पर भरोसा रखें कि वही आपके बच्चों के जीवन को नाश होने से बचाएगा। उन्हें प्रेम करना और क्षमा करना ना छोड़ें जवानी में बच्चें बहुत सी सांसरिक अभिलाषाओं की तरफ आकर्षित होते हैं।

कई बार उनके लिए भी कठिन होता है़ अपने आपको सम्भालना इसलिए आपकी जरूरत हमेशा उनको पढ़ेगी। यदि प्रेम और दोस्ताना व्यवहार माता पिता से मिलें तो बच्चें बाहर के लोगों की ओर नहीं देखेंगे। लेकिन फिर भी यह मेहनत कार्य है़।

इफिसियों की पुस्तक 6:1-4 पद हम पढेंगे, "हे बालको, प्रभु में अपने माता-पिता के आज्ञाकारी बनों, क्योंकि यह उचित है़। " अपनी माता और पिता का आदर कर यह पहली आज्ञा है़ जिसके साथ प्रतिज्ञा भी है़ कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे।" हे बच्चें वालों अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, परन्तु प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन-पोषण करो।"

पहले पद में बच्चों से कहा गया है़, बच्चों प्रभु में माता पिता का आदर करो क्योंकि यह उचित है़। लेकिन साथ ही माता पिता को भी आज्ञा दी गई है़, हे बच्चें वालो अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, क्रोध न दिलाओ।
तो आपको अपने बच्चों को वचन से याद दिलाना होगा कि परमेश्वर वचन में क्या कहते है़? साथ ही आपको वचन की अधीनता में जीवन को बिताना है़ क्योंकि जो सलाह आप अपने बच्चों को दे रहे हैं बच्चें आपके जीवन में प्रभु की आज्ञाकारिता को देखेंगे। इसलिए ध्यान रहे आप खुद बच्चों के सामने आदर्श रखें ताकि आपको देखकर वह भी परमेश्वर की ओर फिरें। 

आप अपने समस्याओं के लिए प्रभु पर भरोसा रखें अपने किए हुए कार्य पर नहीं; अच्छी बात है़ कि आप आज्ञा मानकर परमेश्वर को समझ रहें हैं और अपने सम्बन्धों को परमेश्वर के साथ मजबूत बना रहे है़।

आइए, हम कारण नंबर दूसरे पर चलते हैं,

कारण दूसरा : वचन को समझने में चूक होना।

इसका अर्थ है़ वचन को गलत रीति से समझना और उसका अंगीकार अपनी प्रार्थनाओं में करना।

प्रिय बहनों, आपने लोगों को प्रार्थनाओं में अंगीकार करते सुना होगा कि प्रभु तुम को सिर बनाएँगा, पूछ नहीं यह पद हम व्यवस्थाविवरण की पुस्तक 28:13 पद में पातें है़, उसी तरह एक और पद जिसको हम यशायाह की पुस्तक 54:17 पद में पाते है़, "तेरी हानि के लिए बनाया कोई भी हथियार सफल न होगा और जितने भी जीवे तुझ पर दोष लगाए तू उन्हें दोषी ठहरायेगा।" परमेश्वर इस्त्राएल देश के लोग जिसको परमेश्वर ने चुना, अपना बनाया उनके विषय यह बात कर रहा है़ किसी एक व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है़। रेस्टॉर का अर्थ है़ पुर्नस्थापित करना, बहाल करना। इस्त्राएलियों को परमेश्वर ने फिर से बहाल करेगा तब 17 पद उन पर ठीक बैठता है़। लेकिन कई बार हम इसको व्यक्तिगत तौर पर ले लेते है़ ऐसी कई पद हम देखते है़ कि लोग अंगीकार करते है़ उसी तरह यदि लोग हमें सताते है़ तो हम ऐसे पदों को वचन से निकाल लेते हैं और अपनी प्रार्थनाओं में अंगीकार करने लगते है़।

आइए, हम वचन में से एक और उदाहरण के द्वारा समझेंगे। मेरे साथ खोल लीजिए, भजन संहिता 71:1-4 "हे यहोवा मेरे तेरे शरण में आया हूँ मुझे कभी लज्जित न होने दे अपनी धार्मिकता के कारण मुझे छुड़ा और मेरा उद्धार कर, मेरी ओर कान लगा और मुझे बचा तू मेरे लिए आश्रय की चट्टान बन जिससे मैं नित्य शरण ले सकू तूने मेरे उद्धार की आज्ञा दी है़ क्योंकि तू मेरी चट्टान और मेरा गढ़ है़। हे परमेश्वर मुझे दुष्ट के हाथ से, कुटिल और क्रूर मनुष्य के पंजे से छुड़ा लें।"

जब हम इन पदो को पढ़ते हैं तो हमारे विचारो में एक चित्र बन जाता है़, हमारे सताने वालों का और हमारा कि किस रीति से हमारे सताने वाले के एक तरफ और प्रभु के साथ मैं एक तरफ खड़ी हूँ।

जब दाऊद ने यह भजन लिखा तो उसकी परिस्थिति यह थी कि वह अपने शत्रुओं द्वारा घिरा हुआ था और शत्रु उसके जीवन के पीछे पड़े थे। लेकिन दाऊद के द्वारा लिखा गया भजन उन शत्रु रूपी मनुष्य की नाश के अंगीकार के लिए नहीं था परन्तु प्रभु वचनों के द्वारा हमें हमारे सही शत्रु की पहचान करा रहे थे हमारा शत्रु कोई मनुष्य नहीं केवल और केवल शैतान और पाप है़। जो व्यक्ति आपको सताते थे उनके नाश हो जाने से समस्या समाप्त नहीं हो जाती यह उनका बड़ा नुकसान होने पर उनको सबक मिल जाएगा ऐसा नहीं होता बल्कि हमें प्रभु के चरित्र को भूलना नहीं है़ जो हमेशा क्षमा करना सिखाता है़ वह कैसे आपको आपके सताने वालों के नाश होने की प्रार्थनाए या उसके अंगीकार को करा सकते हैं?

हम अपने सताने वालों के लिए वचन एक भाग को तो बहुत अच्छे से अपने प्रार्थनाओं इस्तेमाल करते है़। लेकिन वचन में जब ऐसी कई बातें लिखी है़ जो हमें चेताती है़, जो हम से बात करती है़ हम उस पर ध्यान भी  नहीं देते। जैसे रोमियों 3:10-12 तक हम पढ़ेंगे, कोई धर्मी नहीं एक भी नहीं। कोई समझदार नहीं; कोई भी नहीं जो परमेश्वर को खोजता हैं सब भटक गए वे सभी निकम्मे बन गए। कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी नहीं।" 

प्रभु का वचन कहता है़, कोई धर्मी नहीं। कोई नहीं जो परमेश्वर को खोजता हो। हम परमेश्वर को अपने लाभ लिए खोजते हैं इसलिए नहीं कि वे परमेश्वर को प्रसन्न करना है़, इसलिए नहीं कि परमेश्वर जीवित प्रभु है़, हमारे प्रभु है़। 

यदि हम रोमियों की पुस्तक और उसके 12 अध्याय को देखें तो पहले पद से परमेश्वर अपने लोगों से क्या कह रहे हैं? रोमियों की पुस्तक 12:1-2 पद तक, "इसलिए हे भाईयो, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित और पवित्र, और ग्रहण योग्य बलिदान करके परमेश्वर को समर्पित कर दो। यही तुम्हारी आत्मिक आराधना है़ इस संसार के अनुरूप न बनें परन्तु अपने मन के नए हो जाने से तुम परिवर्तित हो जाओ कि परमेश्वर की भली ग्रहण योग्य और सिद्ध इच्छा को अनुभव से मालूम करते जाओ।" 

जीवित बलिदान क्या है़? अपनी इच्छाओं को मारना, अपने देह को मारना यह आसान नहीं है़ लेकिन प्रभु की इच्छा यही है़। क्या ऐसे प्रार्थनाएँ हम करते है़?

दूसरे पद में लिखा है़, "इस संसार के अनुरूप न बनों" यानी कि जो संसार करता है़, जो संसार के तरीके है़ उसको हम न अपनाए परन्तु हमारे मन के नए हो जाने से तुम परिवर्तित होते जाओ। यीशु मसीह ने अपने खून के द्वारा, अपने लहू के द्वारा हमें नया बनाया है़ इसलिए परमेश्वर की आज्ञाओं को मानते जाए और एक नए जीवन की शुरुवात कर सकें।

आगे वचन में लिखा है़, "परमेश्वर की भली, ग्रहणयोग्य और सिद्ध इच्छा को तुम अनुभव से मालूम करते जाओ।" जब हम उसके खून से खरीदे हुए है़, खून के द्वारा बदल रहे है़ उसने हमें एक नया जीवन दिया है़ अब हम पुराने नहीं रह गए। तो अब हम धीरे धीरे परमेश्वर के वचन से उसकी भली और ग्रहण योग्य और सिद्ध इच्छा को हम मालूम करते जाए और हम जीते जाए। 

यदि हम इसी अध्याय के 9 पद से आगे पढ़ें, 9-19 पद तक पढ़ें, हम इसमें सारे पदों को नहीं पढेंगे हम इसमें 9,12,14,17,18 और 19 पद को पढेंगे, 

रोमियों 12:9 इस प्रकार से कहता है़, प्रेम निष्कपट हों, बुराई से घृणा करो; भलाई में लगे रहो।

रोमियों 12:12 आशा में आनन्दित रहो;क्लेश में स्थिर रहो; प्रार्थना में नित्य लगे रहो। 

रोमियों 12:14 अपने सतानेवालों को आशीष दो; पर श्राप न दो। 

रोमियों 12:17-19 बुराई के बदले किसी से बुराई न करों; उन बातों का आदर करों जो सब की दृष्टि में भली है़ जहाँ तक तुम से बन पड़े सब के साथ यर्थाथ सम्भव शान्ति पूर्वक रहो, प्रिय अपना बदला कभी न लेना। 19 पद ऐसा कहता है़, परन्तु परमेश्वर की कोप को जगह दो क्योंकि लिखा है़ प्रभु कहता है़ कि बदला लेना मेरा काम है़ बदला मैं दूँगा। 

प्रिय बहनों, कृपया करके जो काम प्रभु का है़ उसे प्रभु को करने दे जो काम प्रभु ने हमें करने को कहा है़ उन्हें ही हम करें। परमेश्वर कभी भी गलत अंगीकार को जो हम प्रार्थनाओं में करते है़, या वचन पढ़ते समय वचनों के अर्थ को हम गलत रीति से समझते है़ इसमें हमारा साथ नहीं देंगे; "परमेश्वर पवित्र है़, परमेश्वर क्षमा करने वाला है़" और हम बहनों को परमेश्वर अपने चरित्र से प्रेरित करते रहते है़ ताकि हम परमेश्वर का गलत चित्रण हमारे द्वारा दूसरे लोगों के बिच में प्रस्तुत न करें। 

परमेश्वर के वचन को जभी हम पढ़ें तो कुछ बातों का ध्यान रखें ताकि उसके सही अर्थ को समझ सकें सब से पहले वचन के सन्दर्भ को समझें, सन्दर्भ में इन बातों का ध्यान रखना है़ कि यह पत्र किसको लिखा गया है़ क्यों लिखा गया? किस परिस्थिति में लिखा गया? और उस समय, उस वचन को सुनने वालें लोगों के लिए उसका अर्थ क्या था? 

प्रिय बहनों, यदि हों सकें तो आप अध्ययन बाइबल खरीदे और उससे सन्दर्भों को समझने का प्रयत्न करें ताकि आपकी प्रार्थनाएँ व्यर्थ न ठहरे। इस आडिओ सत्र को हम यही समाप्त करते है़, अगले ऑडियो में हम तीसरे कारण से शुरू करेंगे।

प्रभु आप सभी को आशिषित करें।

No comments:

Post a Comment

Thank you for reading this article/blog! We welcome and appreciate your opinion in the comments!