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जो चाहो विश्वास से मांगों और वो मिल जाएगा

 

जो चाहो विश्वास से मांगों और वो मिल जाएगा (मरकुस 11:24)

    यीशु ने अपने चेलों से कहा कि “जो कुछ तुम प्रार्थना में मांगते हो विश्वास करो कि पा चुके हो, और वो तुम्हें मिल जाएगा।”

    इस पद के आधार पर कई लोग यह सोचते हैं कि उन्हे “जो कुछ” चाहिए उसे वो विश्वास के साथ मांग सकते हैं और उन्हे वो मिल जाएगा। कई प्रचारक इसे “जो भी चाहिए उसे प्रार्थना में नाम लेकर अधिकार सहित दावा करना या मांगना” कहते हैं। उनका मानना यह है कि अगर हम वास्तव में विश्वास करते हैं, तो परमेश्वर हमारी सभी मांगों को पूरी करेगा। तो क्या वास्तव में हम अपनी प्रार्थना में विश्वास के साथ जो चाहे मांग सकते हैं?

सर्वप्रथम, हमें यह समझना है कि जब भी हम ऐसे चुनौतीपूर्ण या कठिन खंड को पढ़ते हैं, तो हमें उसके तात्कालिक और वृहद या आस पास के संदर्भ पर ध्यान देना चाहिए। उसके अनुसार हम यह देख सकते हैं कि पद 23 में एक पर्बत के उखाड़े जाने और समुद्र में जा पड़ने की बात को कहते हुए यीशु ने कहा (पद 24) कि “जो कुछ तुम प्रार्थना में मांगते हो विश्वास करो कि पा चुके हो, और वो तुम्हें मिल जाएगा।”

    एक पर्बत के उखाड़े जाने और समुद्र में जा पड़ने का कहना उस समय के एक सामान्य रूपक का प्रयोग था। किसी कठिन समस्या या परिस्थिति के समाधान या उसे हटाए जाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था। यहां एक प्रश्न यह भी है कि यीशु किस पर्बत कि बात कर रहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि यह कोई ऐसा पर्बत है जिसे लोग जानते थे और उस समय भली भांति समझ भी रहे थे क्योंकि पद 23 में “इस पर्बत” लिखा गया है।

जब हम इस घटना के वृहद संदर्भ पर ध्यान देते हैं तो कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं। मरकुस 11 अध्याय का आरम्भ यरूशलेम में यीशु के विजयी प्रवेश के साथ होता है। अगले दिन जब यीशु यरूशलेम के मंदिर में जाता है तो वहां पर उसे दुर्व्यवस्था दिखाई देती है। वह कहता है कि लोगों ने इस प्रार्थना के भवन को डाकुओं की अड्डा बना दिया है। उस मंदिर में यीशु ने आत्मिक ढोंग और पाखंडपन को देखा। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यह स्थान एक पर्बत था अर्थात यरूशलेम का मंदिर एक पर्बत के ऊपर बनाया गया था।

वृहद संदर्भ में हम यह भी पाते हैं कि यीशु ने अंजीर के एक हरे पेड़ को उसमें फल ना होने के कारण शाप दिया था और वो सुख गया था। बाइबल में अंजीर का पेड़ इस्राइल को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता है। उस पेड़ का फ़लरहित होना इस्राइल के आत्मिक स्थिति को दर्शाता है। उस पेड़ में फल ना होने के कारण वो यीशु के लिए किसी काम का ना था और वैसे ही इस्राइल के लोगों का जीवन परमेश्वर के सन्मुख ग्रहणयोग्य नहीं था। यरूशलेम के मंदिर का डाकुओं का अड्डा बन जाना यही दर्शाता है कि वो आत्मिक रीति से फ़लरहि थे।

    इसलिए, जब चेलों ने देखा कि अंजीर का पेड़ सुख गया है और उसे देखकर चेले आश्चर्य करने लगे, तो यीशु ने पर्बत के उखाड़े जाने और समुद्र में जा पड़ने के रुपक को देते हुए न्याय की बात कर रहा था। अर्थात, यरूशलेम पर्बत पर स्थित उस मंदिर की धर्मिव्यवस्था जिसे वहां के धर्मगुरुओं ने रूढ़िवादी बना दिया था, एक ठोस और मजबूत धर्मिव्यवस्था बना दिया था, नियमों पर आधारित बना दिया था, जिसके द्वारा लोगों का आत्मिक शोषण हो रहा था, उस व्यवस्था के ऊपर अब परमेश्वर का न्याय होने पर था। इस धर्मिव्यवस्था का आधार व्यवस्था के पालन के द्वारा / अपने कामों और प्रयासों के द्वारा धार्मिकता प्राप्त करना था। यहूदी धर्मगुरु इसी बात का लाभ उठाकर लोगों पर आत्मिक शोषण कर रहे थे। इसलिए, मंदिर में व्यापार और लेन - देन हो रहा था जिसे देखकर यीशु ने कहा कि यह डाकुओं का अड्डा बन गया है।

    परन्तु, यीशु इस संसार में परमेश्वर के राज्य को स्थापित करने आया था। वो लोगों को उद्धार देने आया था जो लोगों के कार्यों, व्यवस्था पालन या लोगों के स्व-धार्मिकता पर नहीं परन्तु यीशु के कार्यों पर आधारित था। उसने संसार में आकार हमारे बदले में एक सिद्ध जीवन जिया, क्रूस पर परमेश्वर के कोप को शांत किया और हमारा प्रायश्चित बना। क्रूस पर एक महान अदला बदली हुई जिसके फलस्वरूप हमारे सारे अपराधों को उसने उठा लिया और उसने अपनी धार्मिकता हमें दे दी। अब उसके ऊपर विश्वास करने के द्वारा हम धर्मी ठहराए गए हैं। इसलिए, वो पर्बत अर्थात यरूशलेम पर्बत पर स्थित उस मंदिर की धर्मिव्यवस्था को हटा दिया जाएगा और एक ऐसी धर्मिव्यवस्था स्थापित की जाएगी जो यीशु के कार्य पर आधारित होगी क्योंकि उसने क्रूस पर हमारे स्थान पर अपने प्राण को देकर हमारा मेल परमेश्वर के साथ करा दिया।

इसलिए यीशु के इस कार्य पर विश्वास करके हम जो कुछ मांगेंगे वो हमे दे दिया जाएगा। तो यीशु के इस कार्य पर विश्वास करते हुए हम प्रार्थना में क्या मांग सकते हैं? हमें क्या मांगना चाहिए? “जो चाहो विश्वास से मांगों” का हवाला देकर क्या हम धन, समृद्धि, वैभव इत्यादि मांगेंगे? क्या हम स्वस्थ, संपन्नता, बढ़िया नौकरी, विदेश यात्रा का अवसर, और सांसारिक उन्नति मांगेंगे? नहीं, हम यह मांगेंगे कि हम एक फ़लरहित अंजीर का पेड़ ना बने। हम वो सब कुछ मांगेंगे जो हमें एक फ़लदायक अंजीर का पेड़ बनाएगी। वो सब कुछ मांगेंगे जो हमें एक ऐसा जीवन जीने के लिए आवश्यक है जिससे यीशु प्रसन्न होगा। हम यह मांगेंगे कि हमारी दृष्टि यीशु की सिद्ध धार्मिकता पर बनी रहे और उन हर एक बातों से हटती जाए जो हमारे भीतर स्वधार्मिकता के घमंड को ला सकती है। जब हम ये सब कुछ मांगेंगे, तो ऐसी प्रार्थना का उत्तर निश्चित रूप से हमें मिलेगा।

~by Monish Mitra
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अगर परमेश्वर भला है, तो बुराई क्यों है?

अगर परमेश्वर भला है, तो बुराई क्यों है?

    बहुत से लोग इस सोच से जूझते हैं - यदि परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिशाली, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है, तो वह अपनी सृष्टि में बुराई को आने नहीं देगा। जब लोग इस सृष्टि में बुराई को देखते हैं तो उनके मन में यह सवाल उठता है कि "परमेश्वर कैसे भला हो सकते है?" अगर परमेश्वर की इच्छा और मर्जी में होकर संसार में हर एक बुराई होती है, तो फिर परमेश्वर को कैसे "भला" कहा जा सकता है ? यद्यपि परमेश्वर ने हमें बुराई और पीड़ा की समस्या को लेके एक संपूर्ण और पर्याप्त उत्तर नहीं दिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि परमेश्वर इस विषय पर संपूर्ण तरीके से शांत और चुप है।

सबसे पहले हमे यह समझना है कि बुराई अपने आप में कोई "पदार्थ, धातु या वस्तु" नहीं है। बुराई को हम तीन वर्ग में विभाजित कर सकते हैं।
  • प्राकृतिक - तूफान, भूकंप, बीमारी, प्राकृतिक आपदाएं इत्यादि।
  • नैतिक - मनुष्यों के द्वारा बुरा चुनाव और बुरी क्रिया।
  • तात्त्विक - त्रुटिपूर्ण स्वभाव से भरा होना।
    तो एक साधारण परिभाषा के अनुसार यह कहा जा सकता है कि बुराई वह कार्य, चरित्र, गुण, स्वभाव और प्रकृति है जो न केवल भलाई के मापदंड और पैमाने के विपरीत है बल्कि उसकी बराबरी करने में विफल भी हैं। भलाई के तुलना में बुराई बहुत मायनों में प्रतिवाद है (विरोधाभास / विपरीत है) और कई मायनों में भलाई के तुलना में एक अभाव / कमी को दर्शाता है। इस कारण बुराई की सही समझ इस बात पर निर्भर करती है कि हम सर्वप्रथम भलाई के बारे में एक सही समझ को रखें; अर्थात बिना भलाई को जाने और भलाई के अस्तित्व के न तो बुराई की परिभाषा है और न ही उसके अस्थित्व को समझा जा सकता है। परमेश्वर के बिना भलाई का कोई आधारभूत और बुनियादी मानक नहीं है क्यूंकि भलाई की आधारभूत और बुनियादी मानक स्वयं परमेश्वर है।

इसलिए हमें कुछ बुनियादी बातों को ध्यान देने की आवश्यकता है :-

पहली बात - परमेश्वर का अस्तित्व है और बुराई का भी अस्तित्व हैं। वास्तव में परमेश्वर की सिद्ध भलाई ही वह मानक है जिसके आधार पे हम किसी चीज़ को बुरा कहते हैं क्यूंकि बिना कोई मानक के किसी चीज़ को कैसे और किस आधार पे बुरा कहा जा सकता है? बिना किसी पूर्ण मानक के भलाई और बुराई के विषय में हम सबके अलग अलग नज़रिये होंगे; फिर तो किसी के लिए हत्या और व्यभिचार बुरी बातें होंगी और किसी को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आएगी।

दूसरी बात - संसार में बुराई के अस्तित्व के पीछे परमेश्वर का एक उद्देश्य होता है। परमेश्वर कोई कार्य बेवजह और उद्देश्यरहित नहीं करता है और न ही होने की अनुमति देता है। यह हमारे लिए हर वक़्त संभव नहीं होगा कि किसी जगह या फिर किसी के साथ होने वाली बुराई का कारण हम जान जाएँ या समझ जाएँ। पवित्र शास्त्र यह सिखाती है कि परमेश्वर बुरा नहीं कर सकता है (याकूब 1:13), वह चाहे तो हर बुराई को रोक सकता है क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है (उत्पत्ति 18:14a, मरकुस 10:27), परमेश्वर अपनी योजना को पूरी करने के लिए बुराई का उपयोग भी कर सकता है (1 राजा 22:23, भजन 105:23-25)। हमें यह नहीं भूलना है कि बुराई कभी भी परमेश्वर का अंतिम उद्देश्य या लक्ष्य नहीं है; पर वह इसे एक बड़े भले उद्देश्य के लिए ठहराता है और वह बड़ा भला उद्देश्य हमारी भलाई और से भी बढ़कर परमेश्वर की महिमा है (रोमियों 8:28, याकूब 1:2-4)। उत्पत्ति 50:20 यूसुफ अपने भाइयों से कहता है यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिए बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उस बात में भलाई का विचार किया, जिससे वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं। उस बुराई के पीछे परमेश्वर के उद्देश्य को न केवल हम वहां पढ़ते हैं पर हमारे जीवन में उसका लागूकरण यूँ होता है कि परमेश्वर ने उस बुराई को इस्तेमाल करके उस वंशावली को अकाल के समय नाश होने न दिया और आगे चलके उसी वंशावली में येशु पैदा हुआ और हमे पाप में से छुड़ाया। मसीह की मृत्यु में हमे बुराई का सबसे विशाल रूप दिखता है; एक ऐसी बुराई जिसको परमेश्वर ने खुद ठहराया पर जिसके लिए परमेश्वर खुद नैतिक रूप से ज़िम्मेदार नहीं था (प्रेरितों 2:23)। इस विशाल बुराई के माध्यम से परमेश्वर ने एक महान भलाई को नियुक्त किया और वह था हमारा उद्धार। परमेश्वर के पास यह क्षमता है कि वह नैतिक रूप से ज़िम्मेदार न होते हुए भी बुराई को ठहरता है; यह उसकी महानता को साबित करता है। परमेश्वर अपने चरित्र का समझौता किये बिना ही बुराई को ठहरा सकता है।

तीसरी बात - बुराई के साथ सब कुछ समाप्त नहीं होता है। पवित्र शास्त्र कभी भी बुराई के अस्तित्व का इंकार नहीं करती है पर यह भी स्वीकार नहीं करती है की बुराई की शक्ति परमेश्वर के तुल्य या उससे अधिक है। विजय के रूप में परमेश्वर बुराई के ऊपर अपनी अंतिम घोषणा को ठहरता है। अपने अंतिम छुटकारे के लिए सृष्टि करहाती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है (रोमियों 8:22)। सारी सृष्टि के ऊपर मसीह पुनर्जीवित होके, जयवंत होके खड़ा है और सब कुछ नया करने वाला है।

तो फिर क्या कहा जाए ?
    एक बात हम निश्चित रूप से जानते हैं कि बुराई का अस्तित्व है। उसका अस्तित्व तो है; अगर कहीं और नहीं तो हमारे चरित्र में, व्यवहार और क्रियाओं में तो निश्चित रूप से है। हम यह भी जानते हैं कि बुराई संसार में दुःख, तकलीफ और वेदना लेके आता है, पर हम इस बात से निश्चित हैं कि परमेश्वर की संप्रभुता सब पर है और वह अपनी संप्रभुता में बुराई के ऊपर अपना अंतिम फैसला दे चुका है। वह बुराई के हाथ में उस अंतिम जीत को नहीं सौंपेगा। सदैव ही से बुराई परमेश्वर की जीत के हित में ही काम करती है भले ही हम अपने सीमित विचार शक्ति में उसे समझ न सके। संसार में इन बुराई के मध्य हम परमेश्वर के उस अंतिम जय और छुटकारे में प्रवेश करने की आशा में आनंद और विश्राम को पा सकते हैं; लेकिन जब तक हम उसमे प्रवेश नहीं करते तब तक हमे इस संसार में रहना है जो पाप से ग्रसित हैं। भले ही वर्तमान में कैसी भी बुराई को हम देखते हैं परन्तु पवित्रशास्त्र हमे उस भले भविष्य के बारे में बताती है जिसको परमेश्वर ने हमारे लिए रखा है (प्रकाशित वाक्य 21: 3-4)।

~Article by Monish Mitra

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धन्य मनुष्य परीक्षा के मध्य स्थिर रहता है - याकूब 1:12- 16


धन्य मनुष्य परीक्षा के मध्य स्थिर रहता है - याकूब 1:12- 16


परिचय 


  • यह पत्री उन बारहों गोत्रों को लिखा लिखा गया था जो तित्तर बित्तर होकर रह रहे थे 

  • यह लोग अपने विश्वास के कारण विभिन्न परीक्षाओं का सामना कर रहे थे 

  • विभिन्न परीक्षाओं के कारण वह अस्थिर हो रहे थे 

  • विभिन्न परीक्षाओं का सामना वह परिपक्वता के साथ नहीं कर रहे थे 

  • याकूब उन्हें स्थिर होने के लिए प्रोत्साहन कर रहे हैं 


2 - 8 पद में याकूब विभिन्न परीक्षाओं के प्रति एक विश्वासी के स्वभाव के बारे में स्मरण दिलाते हैं। 

  • परीक्षा को आनंद की बात समझना 

  • परीक्षा के द्वारा हमारा विश्वास परखा जाता है 

  • परीक्षा के द्वारा धीरज का कार्य हमारे जीवन में पूरा होता है 

  • परीक्षा का सामना करने के लिए हमें परमेश्वर से बुद्धि मांगनी चाहिए

   

इन बातों को स्मरण दिलाने के बाद, याकूब यह समझाना चाहता है परीक्षा के मध्य स्थिर रहना क्यों आवश्यक है। सर्वप्रथम याकूब कहता है की एक धन्य मनुष्य की पहचान और परिचय यह है की वह परीक्षा के मध्य स्थिर रहता है। एक मनुष्य इसलिए धन्य नहीं कहलाता क्यूंकि वह भौतिक आशीषों से भरपूर है या फिर उसके जीवन में कुछ चिह्न - चमत्कार - चंगाई इत्यादि हुआ है। वह धन्य इसलिए भी नहीं है क्यूंकि उसके जीवन में कुछ बड़ा और अद्भुत कार्य हुआ है। वह अपने वैभव, बुद्धि, धन, ज्ञान इत्यादि के कारण भी धन्य नहीं है। इन सब के विपरीत वह धन्य इसलिए कहलाता है क्यूंकि वह विभिन्न परिक्ष्याओं के मध्य स्थिर रहता है। 


सच में, परमेश्वर के मूल्यांकन और मनुष्य के मूल्यांकन के मानक / पैमाने बिलकुल विपरीत है। हम में से अधिकांश लोग परमेश्वर के मूल्यांकन के मानक के अनुसार न तो सोचते हैं, न सीखने की इच्छा रखते हैं और न ही सिखाते हैं। हमारी सोच विकृत है, भ्रष्ट है, पापमय है और ईश्वरविरोधी है। परमेश्वर हमें सहायता करे और अनुग्रह दे की हम धन्य कहलाने के सही अर्थ को आज समझ सकें। 


तो परीक्षा के मध्य स्थिर रहने की आवश्यकता क्यों है?


विश्वासी परीक्षा के मध्य स्थिर रहेगा क्यूंकि यह परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम का प्रमाण है  (12)


परीक्षा के मध्य स्थिरता के कारण, हम खरे बनते हैं। यह मानक परमेश्वर ने ठहराया है। इससे कोई फरक नहीं पड़ता है की हम इस बारे में क्या विचार रखते हैं। सर्वज्ञानी परमेश्वर ने यही मानक ठहराया है खरा बनने के लिए। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प, उपाय, रास्ता नहीं है।      


परीक्षा के मध्य स्थिरता के कारण, हम मुकुट प्राप्त करते हैं। यहाँ पर यह बात महत्वपुर्ण नहीं है की इस मुकुट का वज़न कितना होगा, यह कैसा दिखेगा, किस रंग का होगा इत्यादि। मुख्य बात यह है की यह परीक्षा में स्थिर रहने का प्रतिफल होगा। यह एक निश्चित प्रतिफल होगा क्यूंकि यह प्रभु की प्रतिज्ञा है। यह झूटी, मनगढंत, भरमानेवाली बात नहीं है। यह सर्वशक्तिमान - संप्रभु - अटल - अनंत - जीवित - पवित्र परमेश्वर की प्रतिज्ञा है। मुकुट की सुंदरता हमारा प्रोत्साहन नहीं है, वरण इस प्रतिज्ञा की अटलता और आश्वशान्ता हमारा प्रोत्साहन है।  


परीक्षा के मध्य स्थिरता, परमेश्वर के प्रति हमारे प्रेम का प्रमाण है। परीक्षा में स्थिर रहना, उसके द्वारा खरा बनना, खरा बनने के कारण मुकुट प्राप्ति की प्रतिज्ञा पाना एक मनुष्य को परमेश्वर से प्रेम रखने वाला ठहराता है। परमेश्वर को इस प्रकार से प्रेम करने वाले के लिए यह प्रतिज्ञा है की उसे मुकुट मिलेगा। परमेश्वर से प्रेम रखने वाला - इसकी परिभाषा बनाने का अधिकार केवल परमेश्वर के पास है। हम अपने मन से, इच्छा से, बुद्धि से इसकी परिभाषा नहीं बना सकते। परमेश्वर ने उससे प्रेम रखने वालों के लिए जो परिभाषा ठहराया है वह यह है की वह मनुष्य परीक्षा में स्थिर रहेगा; वह अपनी खराई का प्रमाण परीक्षा में स्थिर रहने के द्वारा देगा।


विश्वासी परीक्षा के मध्य स्थिर रहेगा क्यूंकि अस्थिरता पाप और मृत्यु को लेकर आता है (13-16)


परीक्षा के उद्देश्य का अस्वीकरण शैतान को अवसर देता है की वह हमें बुरी अभिलाषा से प्रलोभित कर सके। परीक्षा के समय अब्राम का मिस्र देश को चला जाना (उत्पत्ति 12:10), इस्राएलियों का परीक्षा के समय कुड़कुड़ाना (निर्गमन 15:23-24)। परीक्षा का जीवन में आना बुरा नहीं है पर परीक्षा से बाहर निकलने के लिए या उसका सामना करने के लिए गलत रास्ता / उपाय का प्रयोग करना बुरा है और पाप है। परमेश्वर पर भरोसा न करना मूर्खता है। शैतान हमारी इस मूर्खता का लाभ उठाता है और हमें गलत उपाय का प्रयोग करने के लिए प्रलोभित करता है। यह वह बुराई है जिसके विषय में याकूब चेतावनी दे रहा है। यह बुरी अभिलाषा के विषय वस्तु अलग अलग हो सकते हैं पर उसका उद्देश्य यह होता है की हमें परीक्षा में अस्थिर बना दे। यीशु के जीवन में हम देखते हैं की शैतान कैसे यीशु को बुरी बातों / उपाय से प्रलोभित कर रहा था जब यीशु 40 दिन और रात के उपवास के बाद भूखा हो गया था (लूका 4:1-12)।


परीक्षा में बुरी अभिलाषा से प्रलोभित होना हमें धोखा देता है, बहला देता है और पाप में गिराता है। प्रलोभन एक जाल के सामान है जिसे हम देख नहीं सकते हैं। वह सतही स्तर में लाभदायक, अच्छा और सही दीखता है लेकिन अंत में वह बुराई लेकर आता है और हमें मृत्यु तक ले जाता है। वह इस सच्चाई से हमें वंचित करने का प्रयास करता है की परीक्षा हमारे विश्वास को परिपक्व करने के लिए और हमारी भलाई के लिए है। परमेश्वर की उस प्रतिज्ञा से हमें वंचित रखने का प्रयास करता है की वह हमें प्रतिफल में एक मुकुट देगा। 


निष्कर्ष 

  • हमें परीक्षाओं से भागने या बचने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 

  • हमें स्मरण रखना है की परीक्षा का उद्देश्य हमारे भले के लिए है। 

  • परीक्षा में स्थिर रहना एक धन्य मनुष्य का परिचय है। 


Article by Ps Monish Mitra

कैसे विश्वास पश्च्याताप की ओर ले जाता है


कैसे विश्वास पश्च्याताप की ओर ले जाता है

परिचय
    अगर "विश्वास" शब्द के बारे में लोगों को पूछा जाए, तो हमें भिन्न और अलग प्रतिक्रियाएं मिलेंगी। किसी व्यक्ति का विश्वास कोई मनुष्य के ऊपर होगा तो किसी और का किसी और मनुष्य के ऊपर। कोई कहेगा की वह किसी ख़ास विचारधारा पर विश्वास करते हैं, कोई कहेगा की वह खुद पर विश्वास करता है। लेकिन बाइबिल के सन्दर्भ में सोचा जाए, तो कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने आते हैं। क्या विश्वास से जुड़े लोगों के भिन्न सोच और मान्यताएं उन्हें पश्च्याताप की और लेकर जा सकते हैं? विश्वास में क्या विशेषताएँ होनी चाहिए, जिसके द्वारा विश्वास एक मनुष्य को पश्चाताप की ओर लेकर जाता है? इस लेख में हम विश्वास के उन विशेषताओं को देखेंगे जो हमें पश्याताप की और लेकर जाता है।

यीशु मसीह पर विश्वास
            यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है की हमारा विश्वास किस पर है ? पश्च्याताप के लिए हमारे विश्वास का आधार कौन है? अक्सर लोग अपने आवश्यकताओं की पूर्ति, इच्छाओं की पूर्ति, भौतिक विषयों के सन्दर्भ में किसी पर विश्वास करने के बात करते हैं। यह विश्वास इस पृथ्वी पर उनके जीवन काल से सम्बंधित बातों पर केंद्रित होता है। पर यहाँ, हम किसी भौतिक वास्तु की प्राप्ति के लिए विश्वास की बात नहीं कर रहे हैं पर पश्चाताप के सन्दर्भ में विश्वास की बात कर रहे हैं। इसीलिए, स्वयं पर विश्वास, मनुष्यों द्वारा बनाये गए विचारधाराओं पर विश्वास इत्यादि हमें पश्चाताप की ओर लेकर नहीं जा सकता है। पश्चाताप के लिए हमारा विश्वास यीशु मसीह पर होना चाहिए और यीशु मसीह का जन्म इसलिए हुआ क्योंकि वह अपने लोगों को उनके पापों से छुटकारा / उद्धार देने आया था (मत्ती 1:21) और वह हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है (1 यूहन्ना 1:9)। तो यीशु मसीह में क्या विशेषताएं हैं जिन पर विश्वास करना हमें पश्चाताप की ओर ले जाएगा?

यीशु के जीवन पर विश्वास
        यीशु को संसार में देहधारी होकर (यूहन्ना1:18) आने की क्या आवश्यकता थी ? इसको समझना बहुत आवश्यक है। बाइबिल हमें अपनी वास्तविकता और पहचान के बारे में स्पष्टता से अवगत कराती है। अधिकांश लोग सोचते हैं की वह अच्छे हैं, वह भले लोग हैं, सच्चे हैं इत्यादि। पर बाइबिल इसके विपरीत बात हमारे सामने लेकर आती है। हम सब पापी हैं (रोमियों 5:17a), परमेश्वर की महिमा से रहित हैं (रोमियों 3:23), पाप में मरे हुए हैं (इफिसियों 2:1)। परमेश्वर का क्रोध हम पर बना हुआ है (इफिसियों 2:3b) और इसीलिए हम पिता परमेश्वर से दूर हैं। इसी कारण से यीशु संसार में आया क्योंकि वह पापियों को बचा सके। वह इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा टहल करी जाए, परन्तु इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे और बहुतों की छुडौती के लिये अपने प्राण दे (मत्ती 20:28)। जब हम अपनी वास्तविकता से अवगत होते हैं तो हम समझते हैं की यीशु इस संसार में क्यों आया। वह अपनी व्यक्तिगत इच्छा के कारण, अपने किसी मनोरंजन के लिए नहीं आया। हमारे जैसे पापी मनुष्यों के छुडौती के लिये अपने प्राण को देने आया था। अब, अपने वास्तविकता की सच्चाई और यीशु का संसार में आने के कारण को जानने के बाद हम उसपर विश्वास करते हैं और यह हमें पश्च्याताप की ओर ले जाता है।

यीशु मसीह के कार्य पर विश्वास
        यीशु मसीह के कार्य पर विश्वास का अर्थ क्या है ? क्या हम यीशु के द्वारा किये गए चंगाई और चमत्कार पर विश्वास करने की बात कर रहे हैं ? नहीं। यहाँ, यीशु मसीह के कार्य पर विश्वास करने का अर्थ पिता परमेश्वर के प्रति यीशु का संपूर्ण और सिद्ध आज्ञाकारिता से भरे जीवन पर, हमारा विश्वास करना दर्शाता है (फिलिप्पियों 2:8, रोमियों 5:18)। यीशु का पिता परमेश्वर के प्रति यह सिद्ध और संपूर्ण आज्ञाकारिता उसका वह कार्य है जिसपर हमें विश्वास करना है क्योंकि यह विश्वास हमें पश्चाताप की ओर ले जाएगा। अपनी इस आज्ञाकारिता के कारण यीशु हमारे लिए वह निष्पाप, सिद्ध बलिदान बन पाया जिसके द्वारा हमारे पाप क्षमा हुए (1 पतरस 1:18, इब्रानियों 9:14)। यीशु का यह महान बलिदान हमें यह अवगत करता है की यीशु ने हमारे लिए जो किया वह हम अपने लिए नहीं कर सकते थे। हम पापी थे और परमेश्वर के क्रोध को शांत नहीं कर सकते थे। हमारे निमित यीशु वह बलिदान बना जिससे परमेश्वर का क्रोध शांत हुआ। अब, हमारे उद्धार के निमित यीशु के सिद्ध और संपूर्ण आज्ञाकारिता से भरे जीवन के महत्व को जानने के बाद हम उसपर विश्वास करते हैं और यह हमें पश्च्याताप की ओर ले जाता है।

निष्कर्ष
हमें यह स्मरण रखना होगा की यीशु क्यों इस संसार में आया ओर उसने इस संसार में रहकर कैसा जीवन जिया। वह यह सब केवल हमारे प्रति अपने प्रेम को दर्शाने के लिए किया। ओर इसका सबसे उत्तम प्रतिउत्तर यह होगा की हम उसपर विश्वास करें जिसके फलस्वरूप हम पश्च्याताप कर सकेंगे।

- Ps Monish Mitra

विश्वास से भटकने के चार कारण


परिचय

स्थानीय कलीसिया में एक रखवाले / उपदेशक / प्राचीन की भूमिका में सुसमाचार का प्रचार करना और पवित्र शास्त्र से शिक्ष्या देना एक बड़ी ज़िम्मेदारी होती है। इस सेवकाई के फलस्वरूप जब हम यह गवाही सुनते हैं की किस प्रकार सुसमाचार के प्रचार के द्वारा लोगों ने अनंत जीवन को पाया तो यह एक बहुत आनंद का विषय होता है। पर एक सच्चाई यह भी है की कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो विश्वास से पीछे हट जाते हैं जब उनके जीवन में दुःख, तकलीफ और परीक्षा आती हैं। वह मसीह संगति त्याग देते हैं और अपने पुराने जीवन में लौट जाते हैं। मत्ती 16:13-15 में हम यह पाते हैं की केसरिया फिलिप्पी के देश में लोग यीशु के बारे में अलग-अलग विचार रखते थे। कितने तो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला कहते थे और कितने एलिय्याह, और कितने यिर्मयाह या भविष्यवक्ताओं में से कोई एक कहते थे। पर यीशु ने अपने चेलों से कहा; "परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?"

यीशु कौन है? - जब तक हम इसकी सही समझ के आधार पर अपने विश्वास का अंगीकार नहीं करते, हम विश्वास से भटक जाएंगे। सामान्य तौर पे, लोगों का यीशु के बारे में चार भ्रम / गलतफ़हमी होता है भले ही वह अपने आप को विश्वासी कहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे अपने जीवन में क्लेश, परीक्षा और कठिन समय में विश्वास से भटक जाते हैं। इस लेख के माध्यम से हम उन चार बातों पर विचार करेंगे।

1. यीशु, परमेश्वर तक पहुँचने के अनेक रास्तों में से एक है या स्वर्ग तक पहुँचने के अनेक तरीकों में से एक है।
इस संसार में बहुत सारे लोग धार्मिक बहुलवाद / अनेकवाद विचारधारा रखते हैं। आस्था वादी होने के कारण वह स्वर्ग भी जाना चाहते हैं। धार्मिक बहुलवाद / अनेकवाद विचारधारा रखने वाले यह आस्था वादी लोग ईसाई धर्म को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। अनेक धर्मगुरुओं में से वह यीशु को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। शायद वह यीशु की नम्रता या सादगी या निष्कपटता से बहुत प्रभावित हुए हैं। इसलिए वे यीशु का अनुसरण करना चाहते हैं और उसपर विश्वास करते हैं। उन्होंने कभी भी यीशु के उन विशिष्ट दावों पर भरोसा नहीं किया जिसका उल्लेख यीशु ने यूहन्ना 6:48, 8:12, 10:9,11, 11:25, 14:6, 15:1 में किया था। वे प्रेरितों की शिक्षाओं पर भरोसा नहीं करते हैं जिन्होंने लिखा है कि स्वर्ग के नीचे कोई दूसरा नाम नहीं है जिसके द्वारा मनुष्य उद्धार पा सकता है (प्रेरितों के काम 4:12), परमेश्वर और मनुष्य के बीच केवल एक बिचवई है (1 तीमुथियुस 2:5)। इन बातों को गंभीरता से न लेने के कारण ऐसे लोग जीवन में क्लेश, परीक्षा और कठिन समय में विश्वास से भटक जाते हैं। जब तक किसी व्यक्ति का यीशु के प्रति समझ, उस पर विश्वास और अंगीकार यीशु के विशिष्ट दावों पर आधारित नहीं है, तब तक उनका विश्वास और अंगीकार केवल सतही है और वह अंततः विश्वास से भटक जाएंगे।

2. यीशु के पीछे चलने से हमें पृथ्वी पर एक आरामदायक और अच्छा जीवन मिलेगा।
बहुत से ऐसे लोग हैं जो पृथ्वी पर एक आरामदायक जीवन की तलाश में हैं। वे किसी ऐसे अगुवा की तलाश में हैं जो उन्हें इस धरती पर एक आरामदायक जीवन दे सके। हो सकता है कि इस वजह से वे उन चंगाई, चिन्हों और चमत्कारों से आकर्षित भो गए जो यीशु ने पृथ्वी पर रहते हुए लोगों के मध्य किया था। इसके आधार पर वे मानते हैं कि यदि वे यीशु को अपने जीवन में स्वीकार करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं तो यीशु भी उनके जीवन में ऐसे चंगाई, चिन्ह और चमत्कार करेंगे और उन्हें भौतिक आशीष प्रदान करेंगे जिनकी उन्हें आवश्यकता है। वे जीवन के बारे में चिंतित हैं और चाहते हैं कि यीशु उन्हें चिंताओं से मुक्त जीवन देंगे जहाँ आराम और शांति होगी। वे यह देखने में विफल जो जाते हैं कि यीशु ने हमें चिंता करने के बजाय अपने जीवन की आवश्यकताओं के लिए नियमित रूप से उस पर भरोसा और निर्भर रहने के लिया कहा है (मत्ती 6:11, 25-34)। ऐसा न करने के कारण वह जीवन के क्लेश, परीक्षा और कठिन समय में विश्वास से भटक जाते हैं। यीशु के जीवन को देखें तो हम पाते हैं की यीशु ने विलासमय जीवन नहीं जिया परन्तु वह स्वर्ग से उतरकर आया और परमेश्वर पिता की योजना को पूरा करने के लिए संपूर्ण आज्ञाकारिता और पिता परमेश्वर की निर्भरता में रहा (फिलिप्पियों 2:7-8)। यदि कोई व्यक्ति केवल चिंता मुक्त जीवन का आनंद लेने के लिए यीशु पर अपना भरोसा रखना चाहता है पर वह यीशु पर दैनिक रूप से निर्भर होकर जीना नहीं चाहता है, वह अंततः विश्वास से भटक जाएंगे।

3. यीशु जो भला और प्रेमी है, मेरे जीवन में पीड़ा या बुराई को होने नहीं देगा।
कुछ ऐसे लोगों का समूह भी है जो इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकते कि मसीह जीवन में दुख भी शामिल होता है। हो सकता है कि वे सोचते हों कि चूंकि यीशु ने हमारे लिए क्रूस पर दुख उठाया है, इसलिए हमें इस जीवन में न तो दुखों को सहना है और न ही दुखों का सामना करना है। वे दुखों से भयभीत हो जाते हैं और मसीह के लिए कष्ट सहने से हिचकिचाते हैं। वे मानते हैं कि बाइबिल में दिए गए कुछ वचनों का दावा और घोषणा करना उन्हें दुखों और बुराई से प्रतिरक्षा करता है। वे यीशु द्वारा निर्धारित शिष्यता की माँगो को अनदेखा करते हैं जहाँ यीशु स्पष्ट करता है कि जब हम प्रतिदिन क्रूस उठाकर चलेंगे और उसका अनुसरण करेंगे, तो लोग हमें घृणा करेंगे, उसके लिए हम सताए जाएंगे (लूका 14:27, मत्ती 5:11, यूहन्ना 17:18,20)। वे प्रेरितों के उन शिक्षाओं को भी नज़रअंदाज़ करते हैं जहाँ प्रेरितों ने यह स्पष्ट कर दिया कि दुख और कष्ट हमारे विश्वास का एक हिस्सा है जिसे हमें सहना है और इन कष्टों और दुखों के पीछे परमेश्वर का एक उद्देश्य है जैसा कि 1 पतरस 1:6-7, 4:1, 5:10, 2 तीमुथियुस 3:12, याकूब 1: 2-4, 12, रोमियों 5:3-5, 2 कुरिन्थियों 1:3-4 में लिखा गया है। यदि कोई व्यक्ति यीशु के लिए कष्ट सहना नहीं चाहता है, एक स्वार्थी रवैया रखता है और दुःख-पीड़ा रहित मसीह जीवन जीना चाहता है वह अंततः विश्वास से भटक जाएगा।

4. यीशु हमें अपनी इच्छानुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है क्योंकि अब हम व्यवस्था के अधीन नहीं हैं परन्तु अनुग्रह के अधीन हैं।
कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मसीह का अनुसरण करना चाहते तो हैं, लेकिन वे जवाबदेह नहीं ठहराया जाना चाहते हैं। वे नहीं चाहते हैं की उन्हें कोई सुधारे, अनुशासित करें और न ही कोई उन्हें कुछ सिखाए। वे इस धारणा रखते हैं कि उन्हें मसीह ने स्वतंत्र ठहरा दिया है। इसलिए उनसे बिना कोई पूछताछ और जवाबदेही के अपनी स्वतंत्रता का आनंद लेने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि वे अनुग्रह के अधीन हैं। हाँ, यह सच है कि हम मसीह के द्वारा स्वतंत्र किए गए हैं, परन्तु यह लोग इस तथ्य को पसंद नहीं करते कि अब हम मसीह में धार्मिकता के दास बन गए हैं (रोमियों 6:18)। वे इस सच्चाई को पसंद नहीं करते हैं कि अनुग्रह के अधीन होने का मतलब यह नहीं है कि अब हम एक अनियंत्रित जीवन, जवाबदेह रहित जीवन जी सकते हैं और जो चाहे वह कर सकते हैं। हम अनुग्रह के अधीन हैं और हम मसीह की देह (स्थानीय कलीसिया) का भी भाग हैं जहाँ हम संगी विश्वासियों के साथ जुड़ते हैं और आत्मा के द्वारा परमेश्वर का निवास स्थान होने के लिये एक साथ बनाए जाते हैं (इफिसियों 2:19-22)। पवित्र शास्त्र के द्वारा उपदेश पाना, समझ प्राप्त करना, सुधार प्राप्त करना, और धर्म की शिक्षा पाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए (2 तीमुथियुस 3:16-7)। वास्तव में अनुग्रह के अधीन होना हमें मसीह में हमारे चाल चलन के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाता है। हमें अपने जीवन में पवित्रीकरण और पवित्रता का अनुसरण करना चाहिए (रोमियों 12:1, 1 कुरिन्थियों 6:19, 2 कुरिन्थियों 7:1, इफिसियों 5:3, 27, 1 थिस्सलुनीकियों 4:7, 1 पतरस 1:15-16)। यह तब नहीं हो सकता जब तक हम अनुग्रह के बहाने एक मनमर्जी का जीवन जीने की स्वतंत्रता चाहते हैं। यदि कोई व्यक्ति पूर्ण स्वतंत्रता चाहता है, उसके पास सीखने की प्रवृत्ति नहीं है, उसे अधीनता, जवाबदेही पसंद नहीं है पर वह मसीह का अनुसरण करना चाहता है, वह अंततः विश्वास से भटक जाएगा।

निष्कर्ष
भाइयों और बहनों, हमें यह याद रखना होगा कि एक व्यक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण और जरूरी है कि वह मसीह के बारे में क्या सोचता है, समझता है और स्वीकारता है। यदि उसका अंगीकार मसीह के बारे में एक ऐसी सतही समझ पर आधारित है जो उसके अनुकूल है, उन्हें लाभ और फ़ायदा पहुँचाता है, उनके लिए सहज और आसान जान पड़ता है, वह अंततः विश्वास से भटक जाएंगे। जब भी हम सुसमाचार को बताते हैं, आइए इसे बहुत स्पष्ट करें और लोगों को समझाएं कि यीशु कौन हैं, उसके विशिष्ट और अनोखे दावे क्या हैं और शिष्यता के जीवन में हमसे यीशु का क्या मांग है। यह सच है कि क्रूस का संदेश लोगों को असहज करेगा, लोग इस सुसमाचार को पसंद और प्रेम नहीं करेंगे। यह बहुतों के लिए ठोकर का कारण होगा, जिसे बहुतों ने ठुकरा दिया है, लेकिन सच्चाई तो यह है की हर एक विश्वास करने वाले के लिये यह उद्धार के निमित परमेश्वर की सामर्थ है।

Ps Monish Mitra

समस्याओं की वास्तविकता भाग - 2


प्रिय बहनों इस ऑडियो सीरीज में मैं आप सभी का एक बार फिर से स्वागत करती हूँ।

ये पहले ऑडियो का शेष भाग हैं, पहले ऑडियो में हम ने बहनों की समस्याएँ, उनके कारण और उनके समाधान को प्रस्तुत किया। हमने पहले ऑडियो में केवल एक ही समस्या जो परिवार से जुड़ी हैं उसके बारे में और उस समस्या से जुड़ी केवल एक ही कारण पर बात की थी। इस बचें हुए ऑडियो सीरीज को हम शुरू करते हैं, हम इस ऑडियो में समस्याओं के साथ साथ समाधान पर भी बात करते जाएंगे ताकि आप समस्या और उसके समाधान दोनों को पूर्ण रूप से समझ सकें।

प्रिय बहनों मेरा आप से निवेदन है़ कि कृपया करके इस ऑडियो सत्र को पूरा सुनें, बिना सुने किसी भी निर्णय पर ना पहुँचे। आइए, हम शुरू करते है़ पहले ऑडियो के शेष भाग को, हम जवान बच्चों और माताओं की समस्या पर बात कर रहे थे जो बहनें जवान बच्चों की आदतों से परेशान है़ वह बहनें जवान बच्चों से कभी भी गलत भाषा का प्रयोग न करें। आप उन्हें मौका दे उन्हें उनका पक्ष रखने के लिए, आप उनकी बात को धैर्य से सुनें अपनी सलाह जरूर दें उन पर अपनी सलाहें थोपे नहीं; उनके लिए निरन्तर प्रार्थना करते रहें आप प्रभु पर भरोसा रखें कि वही आपके बच्चों के जीवन को नाश होने से बचाएगा। उन्हें प्रेम करना और क्षमा करना ना छोड़ें जवानी में बच्चें बहुत सी सांसरिक अभिलाषाओं की तरफ आकर्षित होते हैं।

कई बार उनके लिए भी कठिन होता है़ अपने आपको सम्भालना इसलिए आपकी जरूरत हमेशा उनको पढ़ेगी। यदि प्रेम और दोस्ताना व्यवहार माता पिता से मिलें तो बच्चें बाहर के लोगों की ओर नहीं देखेंगे। लेकिन फिर भी यह मेहनत कार्य है़।

इफिसियों की पुस्तक 6:1-4 पद हम पढेंगे, "हे बालको, प्रभु में अपने माता-पिता के आज्ञाकारी बनों, क्योंकि यह उचित है़। " अपनी माता और पिता का आदर कर यह पहली आज्ञा है़ जिसके साथ प्रतिज्ञा भी है़ कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे।" हे बच्चें वालों अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, परन्तु प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन-पोषण करो।"

पहले पद में बच्चों से कहा गया है़, बच्चों प्रभु में माता पिता का आदर करो क्योंकि यह उचित है़। लेकिन साथ ही माता पिता को भी आज्ञा दी गई है़, हे बच्चें वालो अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, क्रोध न दिलाओ।
तो आपको अपने बच्चों को वचन से याद दिलाना होगा कि परमेश्वर वचन में क्या कहते है़? साथ ही आपको वचन की अधीनता में जीवन को बिताना है़ क्योंकि जो सलाह आप अपने बच्चों को दे रहे हैं बच्चें आपके जीवन में प्रभु की आज्ञाकारिता को देखेंगे। इसलिए ध्यान रहे आप खुद बच्चों के सामने आदर्श रखें ताकि आपको देखकर वह भी परमेश्वर की ओर फिरें। 

आप अपने समस्याओं के लिए प्रभु पर भरोसा रखें अपने किए हुए कार्य पर नहीं; अच्छी बात है़ कि आप आज्ञा मानकर परमेश्वर को समझ रहें हैं और अपने सम्बन्धों को परमेश्वर के साथ मजबूत बना रहे है़।

आइए, हम कारण नंबर दूसरे पर चलते हैं,

कारण दूसरा : वचन को समझने में चूक होना।

इसका अर्थ है़ वचन को गलत रीति से समझना और उसका अंगीकार अपनी प्रार्थनाओं में करना।

प्रिय बहनों, आपने लोगों को प्रार्थनाओं में अंगीकार करते सुना होगा कि प्रभु तुम को सिर बनाएँगा, पूछ नहीं यह पद हम व्यवस्थाविवरण की पुस्तक 28:13 पद में पातें है़, उसी तरह एक और पद जिसको हम यशायाह की पुस्तक 54:17 पद में पाते है़, "तेरी हानि के लिए बनाया कोई भी हथियार सफल न होगा और जितने भी जीवे तुझ पर दोष लगाए तू उन्हें दोषी ठहरायेगा।" परमेश्वर इस्त्राएल देश के लोग जिसको परमेश्वर ने चुना, अपना बनाया उनके विषय यह बात कर रहा है़ किसी एक व्यक्ति विशेष के लिए नहीं है़। रेस्टॉर का अर्थ है़ पुर्नस्थापित करना, बहाल करना। इस्त्राएलियों को परमेश्वर ने फिर से बहाल करेगा तब 17 पद उन पर ठीक बैठता है़। लेकिन कई बार हम इसको व्यक्तिगत तौर पर ले लेते है़ ऐसी कई पद हम देखते है़ कि लोग अंगीकार करते है़ उसी तरह यदि लोग हमें सताते है़ तो हम ऐसे पदों को वचन से निकाल लेते हैं और अपनी प्रार्थनाओं में अंगीकार करने लगते है़।

आइए, हम वचन में से एक और उदाहरण के द्वारा समझेंगे। मेरे साथ खोल लीजिए, भजन संहिता 71:1-4 "हे यहोवा मेरे तेरे शरण में आया हूँ मुझे कभी लज्जित न होने दे अपनी धार्मिकता के कारण मुझे छुड़ा और मेरा उद्धार कर, मेरी ओर कान लगा और मुझे बचा तू मेरे लिए आश्रय की चट्टान बन जिससे मैं नित्य शरण ले सकू तूने मेरे उद्धार की आज्ञा दी है़ क्योंकि तू मेरी चट्टान और मेरा गढ़ है़। हे परमेश्वर मुझे दुष्ट के हाथ से, कुटिल और क्रूर मनुष्य के पंजे से छुड़ा लें।"

जब हम इन पदो को पढ़ते हैं तो हमारे विचारो में एक चित्र बन जाता है़, हमारे सताने वालों का और हमारा कि किस रीति से हमारे सताने वाले के एक तरफ और प्रभु के साथ मैं एक तरफ खड़ी हूँ।

जब दाऊद ने यह भजन लिखा तो उसकी परिस्थिति यह थी कि वह अपने शत्रुओं द्वारा घिरा हुआ था और शत्रु उसके जीवन के पीछे पड़े थे। लेकिन दाऊद के द्वारा लिखा गया भजन उन शत्रु रूपी मनुष्य की नाश के अंगीकार के लिए नहीं था परन्तु प्रभु वचनों के द्वारा हमें हमारे सही शत्रु की पहचान करा रहे थे हमारा शत्रु कोई मनुष्य नहीं केवल और केवल शैतान और पाप है़। जो व्यक्ति आपको सताते थे उनके नाश हो जाने से समस्या समाप्त नहीं हो जाती यह उनका बड़ा नुकसान होने पर उनको सबक मिल जाएगा ऐसा नहीं होता बल्कि हमें प्रभु के चरित्र को भूलना नहीं है़ जो हमेशा क्षमा करना सिखाता है़ वह कैसे आपको आपके सताने वालों के नाश होने की प्रार्थनाए या उसके अंगीकार को करा सकते हैं?

हम अपने सताने वालों के लिए वचन एक भाग को तो बहुत अच्छे से अपने प्रार्थनाओं इस्तेमाल करते है़। लेकिन वचन में जब ऐसी कई बातें लिखी है़ जो हमें चेताती है़, जो हम से बात करती है़ हम उस पर ध्यान भी  नहीं देते। जैसे रोमियों 3:10-12 तक हम पढ़ेंगे, कोई धर्मी नहीं एक भी नहीं। कोई समझदार नहीं; कोई भी नहीं जो परमेश्वर को खोजता हैं सब भटक गए वे सभी निकम्मे बन गए। कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी नहीं।" 

प्रभु का वचन कहता है़, कोई धर्मी नहीं। कोई नहीं जो परमेश्वर को खोजता हो। हम परमेश्वर को अपने लाभ लिए खोजते हैं इसलिए नहीं कि वे परमेश्वर को प्रसन्न करना है़, इसलिए नहीं कि परमेश्वर जीवित प्रभु है़, हमारे प्रभु है़। 

यदि हम रोमियों की पुस्तक और उसके 12 अध्याय को देखें तो पहले पद से परमेश्वर अपने लोगों से क्या कह रहे हैं? रोमियों की पुस्तक 12:1-2 पद तक, "इसलिए हे भाईयो, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित और पवित्र, और ग्रहण योग्य बलिदान करके परमेश्वर को समर्पित कर दो। यही तुम्हारी आत्मिक आराधना है़ इस संसार के अनुरूप न बनें परन्तु अपने मन के नए हो जाने से तुम परिवर्तित हो जाओ कि परमेश्वर की भली ग्रहण योग्य और सिद्ध इच्छा को अनुभव से मालूम करते जाओ।" 

जीवित बलिदान क्या है़? अपनी इच्छाओं को मारना, अपने देह को मारना यह आसान नहीं है़ लेकिन प्रभु की इच्छा यही है़। क्या ऐसे प्रार्थनाएँ हम करते है़?

दूसरे पद में लिखा है़, "इस संसार के अनुरूप न बनों" यानी कि जो संसार करता है़, जो संसार के तरीके है़ उसको हम न अपनाए परन्तु हमारे मन के नए हो जाने से तुम परिवर्तित होते जाओ। यीशु मसीह ने अपने खून के द्वारा, अपने लहू के द्वारा हमें नया बनाया है़ इसलिए परमेश्वर की आज्ञाओं को मानते जाए और एक नए जीवन की शुरुवात कर सकें।

आगे वचन में लिखा है़, "परमेश्वर की भली, ग्रहणयोग्य और सिद्ध इच्छा को तुम अनुभव से मालूम करते जाओ।" जब हम उसके खून से खरीदे हुए है़, खून के द्वारा बदल रहे है़ उसने हमें एक नया जीवन दिया है़ अब हम पुराने नहीं रह गए। तो अब हम धीरे धीरे परमेश्वर के वचन से उसकी भली और ग्रहण योग्य और सिद्ध इच्छा को हम मालूम करते जाए और हम जीते जाए। 

यदि हम इसी अध्याय के 9 पद से आगे पढ़ें, 9-19 पद तक पढ़ें, हम इसमें सारे पदों को नहीं पढेंगे हम इसमें 9,12,14,17,18 और 19 पद को पढेंगे, 

रोमियों 12:9 इस प्रकार से कहता है़, प्रेम निष्कपट हों, बुराई से घृणा करो; भलाई में लगे रहो।

रोमियों 12:12 आशा में आनन्दित रहो;क्लेश में स्थिर रहो; प्रार्थना में नित्य लगे रहो। 

रोमियों 12:14 अपने सतानेवालों को आशीष दो; पर श्राप न दो। 

रोमियों 12:17-19 बुराई के बदले किसी से बुराई न करों; उन बातों का आदर करों जो सब की दृष्टि में भली है़ जहाँ तक तुम से बन पड़े सब के साथ यर्थाथ सम्भव शान्ति पूर्वक रहो, प्रिय अपना बदला कभी न लेना। 19 पद ऐसा कहता है़, परन्तु परमेश्वर की कोप को जगह दो क्योंकि लिखा है़ प्रभु कहता है़ कि बदला लेना मेरा काम है़ बदला मैं दूँगा। 

प्रिय बहनों, कृपया करके जो काम प्रभु का है़ उसे प्रभु को करने दे जो काम प्रभु ने हमें करने को कहा है़ उन्हें ही हम करें। परमेश्वर कभी भी गलत अंगीकार को जो हम प्रार्थनाओं में करते है़, या वचन पढ़ते समय वचनों के अर्थ को हम गलत रीति से समझते है़ इसमें हमारा साथ नहीं देंगे; "परमेश्वर पवित्र है़, परमेश्वर क्षमा करने वाला है़" और हम बहनों को परमेश्वर अपने चरित्र से प्रेरित करते रहते है़ ताकि हम परमेश्वर का गलत चित्रण हमारे द्वारा दूसरे लोगों के बिच में प्रस्तुत न करें। 

परमेश्वर के वचन को जभी हम पढ़ें तो कुछ बातों का ध्यान रखें ताकि उसके सही अर्थ को समझ सकें सब से पहले वचन के सन्दर्भ को समझें, सन्दर्भ में इन बातों का ध्यान रखना है़ कि यह पत्र किसको लिखा गया है़ क्यों लिखा गया? किस परिस्थिति में लिखा गया? और उस समय, उस वचन को सुनने वालें लोगों के लिए उसका अर्थ क्या था? 

प्रिय बहनों, यदि हों सकें तो आप अध्ययन बाइबल खरीदे और उससे सन्दर्भों को समझने का प्रयत्न करें ताकि आपकी प्रार्थनाएँ व्यर्थ न ठहरे। इस आडिओ सत्र को हम यही समाप्त करते है़, अगले ऑडियो में हम तीसरे कारण से शुरू करेंगे।

प्रभु आप सभी को आशिषित करें।

समस्याओं की वास्तविकता - भाग 3

 प्रिय बहनों, इस ऑडियो सीरीज में मैं फिर एक बार आप सभी का हृदय से स्वागत करती हूँ, हम ने पिछले ऑडियो में पहले और दूसरे कारणों पर बातें की हैं। 

इससे पहले कि हम तीसरे कारण की ओर जाए, मेरा उन बहनों से अनुरोध है़ यदि आप ने पहला और दूसरा ऑडियो नहीं सुना है़ तो तीसरा ऑडियो आपको समझने में परेशानी होगी क्योंकि हरक ऑडियो एक दूसरे से सम्बन्धित है़। एक को बिना समझें दूसरे को समझना कठिन होगा, हम तीसरे कारण पर चर्चा करने वाले है़।

हमारा तीसरा कारण था : "लोगों को खुश करने का प्रयत्न करना।" 

कई बार हम यह महसूस करते है़ कि जब हमारे रिश्तेदार हमारे घर आते है़ तो हम उन्हें प्रसन्न करने में लग जाते हैं, किसी के घर आने पर उनका आदर सत्कार करना गलत नहीं हैं लेकिन जब हम अपने मसीही आचरण के विपरीत कार्य करते है़ तो वह गलत होता है़। 

कई बार यह सब कार्य बहनें डर के कारण करती हैं, बहनें सोचती है़ कि कोई बुरा न मान जाए इसलिए वह सबको प्रसन्न  करने में लग जाती है़। परमेश्वर कभी भी आपको, उनको इस रीति से खुश करने की बात नहीं करता। 

अगर हम इफीसियों की पुस्तक 5:10 पद को देखें, तो उसमें क्या लिखा है़? "परखो प्रभु किन बातों से प्रसन्न होता है़?" वहाँ पर ऐसा नहीं लिखा कि परखो कि लोग किन बातों से प्रसन्न होते हैं। यदि इस पूरे 5 अध्याय को आप पढेंगे तो आपको समझ आएगा कि परमेश्वर किन बातों से प्रसन्न होते हैं। लेकिन परमेश्वर को छोड़कर हम लोगों को प्रसन्न करने में लग जाते है़, परमेश्वर हरक लोगों के भीतरी स्वभाव को जानते हैं हर मनुष्य अलग है़ और उसके खुश होने की सीमा भी अलग अलग है़ जरूरी नहीं कि हम उसकी सीमा या उसकी आशा अनुसार प्रसन्न करें। आप लोगों को कभी भी पूरी तरह से सन्तुष्ट नहीं कर पाएंगे आपको हरक कार्य सन्तुलन में करना चाहिए; जितनी आपकी शक्ति है़, जितना आपके बस में है़ उतना ही करें।

परमेश्वर यदि अपने गुणों को आपको सिखा रहें हैं, यदि उसकी आज्ञा अनुसार आप कार्यों को कर रहे हैं तो वह आपको अनावश्यक कार्यों में नहीं उलझाएँगे। यदि आप 1थिस्सलुनीकियों 4:11 पद को पढ़ें, "और जैसी आज्ञा हमने तुम्हें दी है़, तुम शान्ति पूर्वक जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा रखो अपने काम से काम रखो और अपने हाथों से परिश्रम करो" इस पद के अनुसार परमेश्वर चाहते हैं कि हम शान्ति पूर्वक जीवन व्यतीत करें, हमें शान्ति सब के साथ बनाके रखनी हैं। अपने काम में ध्यान देना है़ और परिश्रम करते रहना है़।

आप कहेंगे हम तो शान्ति से रहना चाहते हैं परन्तु लोग ही किसी कारण से शान्ति को भंग करते हैं इसलिए हर एक कार्य सन्तुलन में करना है़। जब लोग अशान्त माहौल को बनाने का प्रयत्न करें तब आप शान्त हों जाइए; उन्हें किसी भी बात की सफाई नहीं दे, उन्हें समझाने की भी कोशिश न करें। कई बार समझाने की कोशिश में बात और बढ़ जाती हैं और जिन बातों से आप बचना चाह रही थी वही हों जाता है़। 

यदि कोई आपके बारे में गलत शब्दों का प्रयोग करें या आप पर उँगली उठाए तो क्रोधित मत होइए बल्कि शान्त हों जाए अपने आपको डिफेंड मत कीजिए, अपना बचाव खुद करने मत लग जाइए, अपना बचाव बहुत सारी बातें रखकर अलग अलग तरीकों से समझाकर करने की कोशिश न करें क्योंकि अगला व्यक्ति आपको समझता होता तो बात यहाँ तक नहीं बढ़ती क्योंकि वह व्यक्ति आपको समझ नहीं पा रहा है़ इसलिए इस तरीके से बात नहीं सुलझीगी। आप अपनी शारीरिक और आर्थिक स्थिति को देखकर ही कार्य करें। 

यदि आप शरीर से कमजोर हैं या बीमार है़ तो प्रभु की ओर से, वचन से आप पर कोई दबाव नहीं कि आप काम करें आपको पूरा हक्क है़ आराम करने का, अपनी शारीरिक दशा को बताने का यदि आप आर्थिक स्थिति से जुँझ रहीं हैं, धन की कमी है़ तो जो आपके पास है़ उसी से लोगों का आदर सत्कार करें; ज्यादा खर्च करने की आवश्यकता नहीं हैं, किसी के लिए कर्ज न लें बल्कि जो भी आप से अपेक्षा रखते हैं उन्हें यह ऐहसास होने दे कि आप इससे ज्यादा उनके लिए नहीं कर पाएंगी। धीरे-धीरे वह समझने लगेंगे। 

यदि आपके तरीके लोगों को खुश करने के लिए वचन से प्रेरित हैं तब तो हों सकता है़ कि लोगों के साथ आपके सम्बन्ध ठीक हों जाए। यदि आपके तरीके संसारिकता से प्रेरित हैं तो कोई भी गारंटी नहीं कि आप उन्हें खुश कर पाए; एक यह भी कारण हों सकता हैं कि जिस व्यक्ति को आप खुश करना चाह रहे हैं उसका सही सम्बन्ध प्रभु से नहीं है़ तो हों सकता है़ आप चाहे कितना भी प्रभु की इच्छा अनुसार कार्य करें वह समझेगा ही नहीं ऐसी परिस्थिति में परमेश्वर की सुनें इसलिए कार्य नंबर 2 में बताया गया "सही सम्बन्ध का परमेश्वर के साथ होना।" यदि आपका सम्बन्ध प्रभु के साथ सही हैं उसके वचनों को पढ़ते हैं, समझते हैं, तो आपको पता चल जाएगा कि कब क्या करना है़। जब ऐसे लोग समस्या खड़ी करें लेकिन आपका सम्बन्ध प्रभु के साथ नहीं हैं तो बहुत कठिन है़ कि आप लोगों को समझकर सही समय पर उन्हें मना करें ना कहे सकें।

परमेश्वर के अनुसार जिन बातों को करना है़ मैं उनमें से कुछ बातों को बताऊँगी।

पहला तथ्य : प्रेम करना किसी को न छोड़े, प्रेम करने का अर्थ उनकी बुराई न करें, उनका बुरा न सोचें।

आप मेरे साथ निकाल लीजिए, 1यूहन्ना 4:11,12,19,20,21।

प्रियों, "यदि परमेश्वर ने हम से ऐसा प्रेम किया तो हमको भी एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए, परमेश्वर को कभी किसी ने नहीं देखा यदि हम एक दूसरे से प्रेम करें तो परमेश्वर हम में बना रहता है़" (1यूहन्ना 4:11-12)।

"हम इसलिए प्रेम करते है़ क्योंकि उसने पहले हम से प्रेम किया यदि कोई कहे, मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूँ और अपने भाई से घृणा करें तो वह झूठा है़ क्योंकि जो अपने भाई से जिसे उसने देखा है़ प्रेम नहीं करता तो वो  परमेश्वर से जिसे उसने नहीं देखा प्रेम नहीं कर सकता" (1यूहन्ना 4:19-20)।

"हमें उससे यह आज्ञा मिली हैं कि जो परमेश्वर से प्रेम करता है़ वह अपने भाई से भी प्रेम करें" (1यूहन्ना 4:21)।

दूसरा तथ्य : अपने सामर्थ्य के बाहर कार्य न करें।
तीसरा तथ्य : मुँह से अपशब्द न बोले यानी कि टिप्पणी न करें।

"यदि कोई अपने आपको भक्त समझें और अपने जीभ पर लगाम न लगाए पर अपने हृदय को धोखा दे तो उसकी भक्ति व्यर्थ है़" (याकूब 1:26)।

आप सभी बहनों से यह निवेदन है़ कि याकूब की पुस्तक 3 अध्याय को पूरा पढ़ें।

चौथा तथ्य : घर में लड़ाई-झगड़ा या कोई भी बात हों जाने के बाद आप शान्त मन से सोचे कि क्या आपकी गलती थी यदि आप गलत थी तो प्रभु से क्षमा मांगे और दोबारा न करें लेकिन किसी और की गलती होने पर अपने आपको दोषी न ठहराए। 

प्रभु से प्रार्थना में उन लोगों के लिए समझ मांगे जिनके द्वारा माहौल बिगड़ा। 

"यदि हम अपने पापों को मान ले तो वह हमारे पापों को क्षमा करने में और हमें सब अधर्म से शुध्द करने में विश्वास योग्य और धर्मी हैं" (1यूहन्ना 9)।

पाँचवा तथ्य : अपने मरने की कामना न करें ऐसा न सोचे कि आप किसी लायक नहीं है़।

परमेश्वर आपके बारे में ऐसे विचार नहीं रखता, जब आप उसकी आज्ञओं को मानेंगी, तो परमेश्वर आपकी सहायता करेंगे समस्या से बाहर आने में; परमेश्वर आपके लिए मार्ग तयार करेंगे कि आप परमेश्वर की शान्ति को अपने जीवन और अपने परिवार के सदस्यों के जीवन में देख सकें। 

छठा तथ्य : लोगों की बातों से निराश न हों जाए, अपने मन को लोगों की बातों से न भरें परन्तु वचन से भरें। 

जितना ज्यादा आप वचन पढेंगे उतने ही मन से कड़वाहट बाहर निकलेंगी। मन हल्का होगा और परमेश्वर अपने वचन से आपको हिम्मत देगा; एक नए दिन के लिए इसलिए हिम्मत न हारे। "इसलिए उस पर ध्यान करों जिसने पापियों का अपने विरोध में इतना विरोध सह लिया कि तुम थकर निरुत्साहित न हों जाओ" (इब्रानियों 12:3)।

यीशु मसीह ने स्वंय इन बातों का सामना किया वह भी उन लोगों के द्वारा जिनको यीशु ने स्वंय सृजा; यीशु मसीह का सहना हमें उसकी कमजोरी नहीं दिखाता परन्तु उसका प्रेम, दीनता और हर पापियों को एक और अवसर मिलें ताकि वह हमेशा के लिए अन्धकार में ही रह जाए। 

सातवा तथ्य : गलत सलाह लेने से बचें, गलत लोगों से बचें; गलत सलाह के घातक परिणाम हों सकते हैं।

आठवा तथ्य : हम बहनें बहुत भावुक होती हैं अपनी भावना को नियंत्रण में रखें, किसी के कुछ भी कहने पर सोचने मत लग जाए या उनकी कोई भी बात आपको बुरी न लगें।

नौवा तथ्य : परमेश्वर को धन्यवाद करना न छोड़े, संसार में अन्यजाति के लोगों के पास कोई आशा नहीं परन्तु हमारे पास यीशु नाम की आशा हैं। "इसमें इस प्रकार लिखा है़ यह बातें मैंने तुम से कही है़ कि तुम मुझ में शान्ति पाओगे। संसार में तुम्हें क्लेश होता है़ परन्तु साहस रखो, मैंने संसार को जीत लिया है़" (यूहन्ना 16:33)। 

यीशु मसीह ने हर बात को क्रूस पर जीत लिया हैं, बस हमारा विश्वास करके उसकी आज्ञाओं को मानना बाकी है़। 

प्रभु आप सभी आशिष दें।

समस्याओं की वास्तविकता - भाग - 4


प्रिय बहनों, एक बार फिर से मैं आपका इस ऑडियो सीरीज में स्वागत करती हूँ। यह ऑडियो सीरीज का चौथा भाग हैं इसमें हम कारण नंबर चार पर चर्चा करेंगे।

कारण नंबर चार : प्रभु के बनाए हुए तरीके से कार्य न करना।

इस कारण को समझने के लिए हम बाइबल में 1 शमूएल 15 अध्याय खोलेंगे और उसके कुछ पदों को पढेंगे, इसके पृष्टभूमि इस प्रकार हैं कि शमूएल नबी के द्वारा शाऊल को राजा होने के लिए इस्त्राएलियों पर नियुक्त किया जाता हैं। ताकि शाऊल राजा पर परमेश्वर यहोवा की अगुवाई में इस्त्राएली प्रजा को चला सकें। 

जब हम इस 15 अध्याय को पढ़ते हैं, तो हमें पता चलता है़ कि अमालेकियों पर चढ़ाई करने के लिए इस्त्राएली सेना को भेजा जाता है़। राजा शाऊल को शमूएल नबी के द्वारा परमेश्वर का यह वचन पहुँचता है़। जो आपको पद 3 में मिलेगा।

1शमूएल 15:3 "अब जा और अमालेकियों पर चढ़ाई करके उसका जो कुछ है़ वह सब पूर्णता नाश कर दें और उसको भी मत छोड़ना। परन्तु पुरुष, स्त्री, बालक, शिशु, गाय-बैल, भेड़-बकरी, ऊँट-गधा सबको सत्यनाश कर देना; यह आज्ञा परमेश्वर के द्वारा राजा शाऊल को मिली।"

लेकिन 9 पद में हम क्या पढ़ते है़? 1शमूएल 15:9

"परन्तु शाऊल और लोगों ने अगाग के साथ सर्व उत्तम भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, मोटे-मोटे पशुओं, मेम्नों और सब अच्छी वस्तुओं को बचा लिया, उनका सर्वनाश नहीं करना चाहते थे परन्तु प्रत्येक तुच्छ निकम्मे तथा अनुपयोगी वस्तु को ही उन्होंने पूर्णता नष्ट किया। 

यहाँ पर अगाग जो है़ अमालेकियों का राजा है़, आप सभी बहनें इस पूरे अध्याय को पढ़िएगा जिससे आपको समझ आएगा कि यह क्या घटना थी? 

अब हम 13,14 और 15 पद को पढेंगे। 
"शमूएल शाऊल के पास पहुँचा, तब शाऊल ने उससे कहा, तू यहोवा की ओर से धन्य हैं मैंने यहोवा की आज्ञा पूरी की है़। परन्तु शमूएल ने कहा फिर मेरे कानों में भेड़-बकरियों का, मेम्नों का मिमियाना और गाय-बैलों का रम्भाना क्यों सुनाई पड़ रहा हैं? शाऊल ने कहा, वे उन्हें अमालेकियों के पास ले आए है क्योंकि लोग अच्छे से अच्छी भेड़-बकरियों और गाय-बैलों को बचा लाए है कि उन्हें तेरे परमेश्वर यहोवा के लिए बलि चढ़ाए परन्तु विशेष को हमने समूल नष्ट कर दिया है़। परमेश्वर ने शाऊल राजा को आज्ञा दी थी कि जो कुछ अमालेकियों का है़, यहाँ तक कि अमालेकियों का राजा अगाग उसको भी खत्म कर दों। लेकिन राजा शाऊल कुछ जानवर, समान और राजा अगाग को नाश नहीं कर सका बल्कि बड़ी चतुराई से कहता है़, कि यह सब समान परमेश्वर को बलि चढ़ाने के लिए रखा हैं।"

 लेकिन जब हम 22 पद में पढ़ते हैं, तो वहाँ पर शमूएल नबी क्या कहता हैं? 1शमूएल 15:22
"क्या यहोवा होमबलि और बलिदानों से उतना प्रसन्न होता है़, जितना कि अपनी आज्ञाओं के माने जाने से? 
सुन, आज्ञा पालन बलिदान से बढ़कर और ध्यान देना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है़।" 

हम यहाँ पर क्या सीखते हैं? परमेश्वर को राजा शाऊल के द्वारा इस प्रकार का बलिदान नहीं देना चाहिए था, परन्तु परमेश्वर चाहते थे जो कहा गया था उस आज्ञा का पालन करना। 

जब भी परमेश्वर हमारे खराब परिस्थिति में हम से कुछ करने को कहते हैं तो हम राजा शाऊल की तरह उस रीति से न करके अपने तरीके खोजते हैं, समस्याओं को हल करने के लिए। बहुत जरूरी है़ कि इन घटनाओं से जो इतिहास में हुए हम कुछ सीखें, क्योंकि यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारे लिए कुछ करें तो जरूरी है़ कि हम भी परमेश्वर के नियम अनुसार कार्य को करें, उसके बताए हुए तरीके से कार्य करें। 

परमेश्वर अपने वचन के अनुसार आप से अपेक्षा रखता है़। वह अपने वचन के बाहर और अपने चरित्र के बाहर आपको कार्य करने के लिए नहीं बोलता, परमेश्वर ने स्वयं हमारी सामने में अपना उदाहरण प्रस्तुत किया। उसने लोगों से प्रेम किया, लोगों को क्षमा किया, परमेश्वर पिता की इच्छा को क्रूस पर पूरा किया वही परमेश्वर आप से और हम से यह उम्मीद करता है़ कि हम उसके बनाए हुए नियमों के अनुसार कार्य करें न कि अपने तरीके से।

प्रिय बहनों, जब इस ऑडियो के शुरू होने के बारे में आपको पता चला तो आपके मन में खुशी होगी कि हमारी समस्याओं के बारे में बात होगी। लेकिन ऑडियो में जब आप ही के बदलने की बात की गई तब हो सकता है़ मन निराश हुआ होगा और ऐसा मन में आया हो कि हम तो कितनी समस्याओं में पहले से ही हैं और हमें ही बदलने की बात की जा रही हैं। 

प्रिय बहनों, आप निराश न हो प्रभु आपको सामर्थ्य से बाहर कार्य करने को नहीं कहेंगे, कई बार हम परमेश्वर की दूरगामी सोच को समझ नहीं पाते। जब यहूदी लोग रोमी सरकार के अत्याचार से, परेशान होकर रात दिन मसीहा के आने का इंतजार कर रहे थे और सोच रहे थे कि मसीहा आएगा और हमें इस रोमी सरकार से छुड़ाएगा। 

यीशु मसीह जब यहूदियों के बीच में आए तो बहुत चमत्कारों को दिखाया और लोग उन चमत्कारों के गवाह थे कि उसने कैसे बड़े-बड़े काम किए : अंधों को आँखें दी, लंगड़ों को पाव दिया, मुर्दों को जिला दिया इतने बड़े और आश्चर्यकर्म करने वाला यीशु मसीहा उनके साथ था। उन्हें आशा थी कि वह अपने सामर्थ्य से रोमी सरकार को तहस नहस कर देगा इसलिए यहूदी उसे अपना राजा बनाना चाहते थे। लेकिन जब यीशु क्रूस पर चढ़ाए गए तो वे सभी निराश हो गए पूरी तरह से टूट गए यहाँ तक कि यीशु मसीह के चेले भी छोड़कर भाग गए और डर गए। वे सब परमेश्वर की बड़ी योजना को समझ ही नहीं पाए कि परमेश्वर उन्हें पाप से छुड़ाने आया था। रोमी सरकार से छूटने के बाद क्या कोई दूसरा देश उन पर चढ़ाई नहीं करता? सब यहूदी बस कुछ देर की आजा़दी बारे में सोच रहे थे। 

परमेश्वर उन्हें आजा़द करना चाहते थे पाप से, जब यीशु मसीह तीसरे दिन जिंदा हो उठें तो शैतान और उसकी हर योजना को जो उसने मनुष्य के विरोध में सोच थी, अपने पैरों तले कुचल दिया।

आइए, हम एक और व्यक्ति के बारे में जानें, जिसके बारे में हमें 2 राजा 5:1 पद में मिलेगा। 

अरामिया के राजा की सेना का नामान नाम एक सेनापति था वह राजा के दृष्टि में महान और प्रतिष्ठित था क्योंकि उसके द्वारा यहोवा ने अरामिया को विजय दी थी वह बड़ा शूरवीर भी था परन्तु कोढ़ी था। "नामान प्रतिष्ठित सेनापति था परन्तु कोढ़ी था" नामान के घर में इस्त्राएली लड़की थी जो बन्दुवाई में उसके घर में काम किया करती थी। उसी लड़की के द्वारा एलीशा नबी के बारे में नामान को पता चला और नामान अपनी पूरी तैयारी के साथ एलीशा नबी के घर पहुँचा परन्तु एलीशा ने नामान को कुछ करने के लिए कहा, इसको हम 10, 11 और 12 पदों में देख सकते है़, "तब एलीशा ने एक दूत से सन्देश भेजा, जा यरदन में सात बार स्नान कर तब तेरा शरीर चंगा हो जाएगा और तू शुद्ध हो जाएगा परन्तु नामान अत्यंत क्रोधित हुआ और यह कहते हुए चला गया देखों, मैंने तो सोचा था वह निश्चय मेरे पास बाहर आएगा और खड़े होकर यहोवा अपने परमेश्वर से प्रार्थना करेगा और कोढ़ की स्थान पर अपना हाथ फेरकर मेरा कोढ़ दूर कर देगा। क्या दमिश्क की अबाना और पर्पर नदियाँ इस्त्राएल के सारे जलाशयों से उत्तम नहीं? क्या मैं उन में स्नान करके शुद्ध नहीं हो सकता? सो, वह क्रोधित होकर लौट गया।"

यहाँ पर नामान कुछ सोचकर आया था कि इस रीति से उसके चंगाई होगी लेकिन जो उसको बोला जा रहा था वह उस पर नामान क्रोधित हो जाता हैं और उस कार्य को करने बजाय क्रोधित होकर चला जाता है़। 

13 पद में उसके सेवक उसको क्या बोलते हैं? आइए उसे पढ़ते है़, "तब उसके सेवकों ने पास आकर उससे कहा, हे हमारे पिता यदि नबी तुझे कोई कठिन कार्य करने को कहता तो क्या तू न करता? तो जब वह कहता है़ कि स्नान करके शुद्ध हो जा तो इसे कितना और न मानना चाहिए?"

यहाँ पर उसके सेवक नामान से विनती करते है़ जैसा एलीशा नबी कह रहा हैं वैसा किजिए, भले ही तरीका आपको पसंद नहीं लेकिन आज्ञा मानिए और फिर 14 पद में लिखा है़, "अतः उसने जाकर परमेश्वर के जन के वचन के अनुसार यरदन में सात बार डुबकी लगाई और उसके देह छोटे बच्चें के देह समान हो गई और वह शुद्ध हो गया। 

मान लीजिए, नामान आज्ञा मानता ही नहीं? क्या वह शुद्ध हो पाता? ऐसी गम्भीर बीमारी से? जिस समय पुराने समयों में किसी को कोढ़ हो जाता था तो उसको शहर के बाहर कर देते थे, मृत्यु तक जब तक उसकी मृत्यु नहीं हो जाती थी।

यहाँ पर उसके आज्ञा पालन करते ही नामान अपने बीमारी से छूट गया। तरीका भले ही नामान को पसंद नहीं था लेकिन वही से रास्ता निकला।

यदि आप और मैं अपनी समस्याओं से छुटकारा पाना चाहते हैं तो प्रभु का नियम अपनाइए, लोगों की दृष्टि में, संसार की दृष्टि में यहाँ तक कि आपकी और हमारी दृष्टि में यह मूर्खता लगें। लेकिन फिर भी प्रभु के नियम को और उसके तरीकों को महत्त्व दिजिए। 

1कुरिन्थियों 1:25 पद में क्या लिखा है़? 
"क्योंकि परमेश्वर की मूर्खता मनुष्यों के ज्ञान से अधिक ज्ञानवान है़, और परमेश्वर की निर्बलता मनुष्यों के बल से अधिक बलवान है।" 

"क्योंकि क्रूस की कथा नाश होनेवालों के लिए मूर्खता है़, परन्तु हम उद्धार पानेवालों के लिए परमेश्वर का सामर्थ्य है़" (1कुरिन्थियों 1:18)।

परमेश्वर ने आपको इस संसार में अकेला परेशान होने के लिए नहीं छोड़ दिया वह सदा सर्वदा आपकी बारे में सोचते हैं आपके लिए उत्तम करना चाहते है़। लेकिन हम उसकी आज्ञाओं को न मानकर परमेश्वर के बड़े-बड़े कामों को अपने जीवन में होने से रोक देते है़।

अभी भी समय है़, हम परमेश्वर को अपने जीवन में प्रथम स्थान पर रखें और परमेश्वर को स्वामी जानकर उसकी आज्ञा पालन करें, उसके तरीकों को अपनाए।

प्रभु आप सभी को आशीष करें!

समस्याओं की वास्तविकता - भाग 5

प्रिय बहनों, इस ऑडियो सीरीज में मैं फिर से एक बार आपका स्वागत करती हूँ, हम कारण नंबर पाँच पर आ चुकें है़। 

कारण नंबर पाँच है़ : धीरज न धरना, धैर्य न रखना।

इस भाग दौड़ की जिंदगी में धीरज जैसे शब्द खो गया है़, ट्राफिक में फंसे लोग जल्दी से अपने मंजिल पर पहुँचना चाहते हैं। कहीं पर लाइन लगी हुई तो हमारा नंबर कब आएगा? ऐसा उस लाइन में खड़े लोग सोच रहे होते हैं। 

आप ने टी.व्ही ऐड्स देखें हुए होंगे, जिसमें दिखाते है़ कि दो मिनिट में नूडल्स तैयार, हर चीज फटाफट, किसी भी काम में धैर्य रखने की आवश्यकता नहीं है़। सब कार्य जल्दी जल्दी हमारे जीवन में हो जाए ऐसा हम सोचते है़ परन्तु मसीही जीवन में इस रीति से नहीं होता; धीरज की सही अर्थ को हम केवल बाइबल में ही पढ़ और सिख सकते हैं। 

यहाँ पर इस प्रकार लिखा है़, "तब यहोवा ने अब्राहम से कहा, अपने देश, अपने कुटुम्बियों, तथा अपने पिता के घर से उस देश को चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा। मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा और मैं तुझे आशीष दूँगा और तेरा नाम महान करूँगा इसलिए तू आशीष का कारण होगा। जो तुझे आशीर्वाद देंगे मैं उन्हें आशीष दूँगा तथा जो श्राप दें, मैं उसे श्राप दूँगा और पृथ्वी के सब घराने तुझ में आशीष पाएंगे यहोवा के इस वचन के अनुसार अब्राहम चल पड़ा और लूत भी उसके साथ गया। अब्राहम तो पचहत्तर वर्ष का था जब उसने हारन से कूच किया।" 

4 पद में हम पढ़ते है़, "जब अब्राहम यहोवा परमेश्वर के आज्ञा अनुसार अपने देश को, अपने रिश्तेदारों को और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश की ओर चल पड़ा जिसके लिए परमेश्वर ने उसे देने की प्रतिज्ञा की थी। साथ ही उससे बड़ी जाति बनाऊँगा ऐसे प्रतिज्ञा भी की; जिस वक्त यहोवा परमेश्वर ने यह सारे वादे किए उस समय अब्राहम के उम्र पचहत्तर वर्ष की थी" (उत्पत्ति 12:1-4)।

यदि हम उत्पत्ति 16 अध्याय पढ़ें तो पाते है़ कि परमेश्वर की ओर से जब बच्चा देने में देरी हुईं तो अब्राहम और सारा ने अपना तरीका ढूँढ लिया बच्चें की आशीष को पाने का; यह बात सत्य है़ कि पचहत्तर वर्ष में जो वादा परमेश्वर ने कहा था उसके पूर्ति होने में देरी हो रही थी और हम देखते है़ कि उनके धैर्य न रखने से सारा और उसका मिस्त्री दासी के बीच सम्बन्ध खराब हो गया।

उत्पत्ति  के 21:5 पद में हम पढ़ते हैं, कि "अब्राहम सौं वर्ष का था जब वह इसहाक का पिता बना इससे पहले अब्राहम इश्माएल का पिता बन चुका था जो कि मिस्त्री दासी हाजिरा से उत्पन्न हुआ।"

इसी अध्याय 21: 9, 10 और 14 पद में हम क्या देखते है़? आइए, हम पढ़ते है़, "तब सारा ने मिस्त्री हाजिरा के पुत्र को जो इब्राहिम से उसको उत्पन्न हुआ था वह उपहास करते देखा, अतः वह इब्राहिम से बोली, इस दासी को उसके पुत्र सहेत निकाल दें क्योंकि इस दासी का पुत्र मेरे पुत्र इसहाक के साथ उतरा अधिकारी न होगा। अतः इब्राहिम ने बड़े सबेरे उठकर पानी से भरी चमड़ी की थैली और रोटी ली और हाजिरा को देकर उसके कन्धे पर रखी और उसका लड़का उससे देकर विदा किया वह विदा होकर चली गई और बेर्शबा के जंगल में भटकती फिरी। 

यहाँ पर हम क्या देखते है़? यहाँ पर हम देखते हैं कि हाजिरा और उसका पुत्र इश्माएल को अब्राहम अपने परिवार से बाहर कर देता है़। यहाँ पर धीरज न रखने के कारण अब्राहम और सारा को अनावश्यक परेशानी होती हैं और उनको अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ता है़।

आइए हम एक और घटना को बाइबल से देखेंगे और यह हमें मिलेगा 1शमूएल 13 अध्याय में पढ़ते है़ कि शाऊल राजा अपनी सेना के साथ गिलगाल जगह पर ठहरा हुआ था और शमूएल नबी की आज्ञा अनुसार पलिश्तियों पर आक्रमण करने के लिए ठहरा हुआ था। लेकिन जब शमूएल के आने में देरी हुईं और पलिश्ती लोग इस्त्राएलियों से युद्ध करने के लिए अपनी सेना के साथ मिकमाश में छावनी डाली, तब इस्त्राएली लोग डर गए। 

इस घटना को हम 1शमूएल 13:5-7 पद में पढ़ते है़।

आइए हम इसी अध्याय के 8 -14 पद तक पढेंगे।
शमूएल के ठहराए हुए समय के अनुसार शाऊल सात दिन ठहरा रहा; परन्तु शमूएल गिलगाल में नहीं आया और लोग उसके पास से तितर-बितर होने लगे। तब शाऊल ने कहा, होमबलि और मेलबलि मेरे पास ले आओ और उसने होमबलि चढ़ाई और उसने ज्योंही होमबलि चढ़ाई, तो क्या देखा कि शमूएल वहाँ आ पहुँचा। अतः शाऊल उससे मिलने तथा उसका अभिवादन करने गया था तब शमूएल ने कहा, तूने यह क्या किया? शाऊल ने उत्तर दिया मैंने देखा कि लोग मुझे छोड़कर तितर-बितर हो रहे हैं और तू भी अपने नियुक्त समय पर नहीं आया और पलिश्ती भी मिकमाश में एकत्रित हो रहे थे इसलिए मैंने कहा, अब तो पलिश्ती गिलगाल में मुझ पर आक्रमण कर देंगे और मैंने यहोवा के अनुग्रह के लिए प्रार्थना भी नहीं की है़। अतः मैंने विवश होकर होमबलि चढ़ा दी, शमूएल ने शाऊल से कहा, तूने मूर्खता काम किया है़ तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे जो आज्ञा दी थी उसका पालन तूने नहीं किया। अब तक तो यहोवा ने इस्त्राएल पर तेरा राज्य सर्वदा के लिए स्थापित कर दिया होता पर अब तेरा राज्य बना नहीं रहेगा। यहोवा ने अपने लिए, अपने मन के अनुसार एक व्यक्ति को खोज लिया है़ तथा उसको अपने प्रजा पर राज्य करने के लिए नियुक्त भी कर दिया है़। क्योंकि तू ने उस आज्ञा का पालन नहीं किया जो उसने तुझे दी थी।  

इन पदों को पढ़ने से हमें क्या पता चलता है़? शमूएल के आने में देरी होने से शाऊल राजा ने घबराहट में वह कार्य किया जो सिर्फ केवल शमूएल नबी को करना था। घबराहट में लिया हुआ फैसला शाऊल राजा के लिए हानिकारक साबित हुआ, शाऊल राजा धीरज तो धरा पर वहाँ तक नहीं जहाँ तक परमेश्वर चाहता था।

कईं बार जब हमारी समस्या का समय लम्बा होने लगता है़ तो घबराहट में हम उन निर्णय को ले लेते हैं जो हमारे लिए हानिकारक होते हैं। परमेश्वर कभी भी गलती नहीं करते हैं यदि उनके उत्तर देते समय देरी हो रही हो तो यह मत सोचें कि वह हमारे चिन्ता नहीं करते या हमारी प्रार्थनाएँ उस तक नहीं पहुँच रहीं। परमेश्वर ने इस संसार की नीव रखते वक्त हम से नहीं पूछा था उसने अपने बुद्धि से संसार को बनाया। क्या संसार को देखकर और उसकी बनाई हुईं हर चीज को देखकर क्या हम उसमें कोई बुराई निकाल सकते हैं? कभी भी नहीं परमेश्वर सिद्ध हैं, और उनके हर एक कार्य सिद्ध हैं; हम उसमें दोष नहीं निकाल सकते।

आप अपनी समस्याओं के समाधान के लिए परमेश्वर में धीरज बनाए रखें, परमेश्वर से प्रार्थना में बने रहिए हैं, उसका इंतजार करिए वह आपको निराश नहीं करेंगे। परमेश्वर धीरज रखने के लिए क्यों कहते हैं? क्या आप ने किसान को देखा हैं? वह अपने खेतों को तैयार करता है़, बीज बोता है़, पानी देता है़ और फिर इंतजार करता है़ फसल आने के लिए और इसी किसान की तरह हम भी धीरज के साथ रहते है़ कि हमारी समस्याओं का अन्त हो। 

"धीरज धरना कोई कमजोरी नहीं" परन्तु एक ऐसा हथियार है़ जो आपको गलत कार्य करने से रोकता है़। समय देता है़ कि आप सही और गलत में फर्क कर सकें। क्योंकि कई बार लोगों के व्यवहार के कारण परिस्थितियों के कारण मन में कड़वाहट भर जाती है़ और मन में क्रोध के कारण हर तरह के विचार आने लगते है़। जो हमें एक गलत दिशा में ले जा सकते हैं, परमेश्वर के आत्मा के फल में से "धीरज" भी एक फल हैं। जिसको हम गलातियों 5:22-23 पद में पढ़ सकते हैं, "परन्तु पवित्र आत्मा का फल : प्रेम, आनन्द, शान्ति, "धीरज", दयालुता, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं।" ऐसे-ऐसे कार्यों के विरोध कोई व्यवस्था नहीं हैं। 

प्रिय बहनों, निराश मत होइए परन्तु धीरज को अपना कार्य करने दीजिए ताकि वह अपने समय में आपके लिए फलों को ला सकें।

प्रभु आप सब को आशीष दें!