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जो चाहो विश्वास से मांगों और वो मिल जाएगा

 

जो चाहो विश्वास से मांगों और वो मिल जाएगा (मरकुस 11:24)

    यीशु ने अपने चेलों से कहा कि “जो कुछ तुम प्रार्थना में मांगते हो विश्वास करो कि पा चुके हो, और वो तुम्हें मिल जाएगा।”

    इस पद के आधार पर कई लोग यह सोचते हैं कि उन्हे “जो कुछ” चाहिए उसे वो विश्वास के साथ मांग सकते हैं और उन्हे वो मिल जाएगा। कई प्रचारक इसे “जो भी चाहिए उसे प्रार्थना में नाम लेकर अधिकार सहित दावा करना या मांगना” कहते हैं। उनका मानना यह है कि अगर हम वास्तव में विश्वास करते हैं, तो परमेश्वर हमारी सभी मांगों को पूरी करेगा। तो क्या वास्तव में हम अपनी प्रार्थना में विश्वास के साथ जो चाहे मांग सकते हैं?

सर्वप्रथम, हमें यह समझना है कि जब भी हम ऐसे चुनौतीपूर्ण या कठिन खंड को पढ़ते हैं, तो हमें उसके तात्कालिक और वृहद या आस पास के संदर्भ पर ध्यान देना चाहिए। उसके अनुसार हम यह देख सकते हैं कि पद 23 में एक पर्बत के उखाड़े जाने और समुद्र में जा पड़ने की बात को कहते हुए यीशु ने कहा (पद 24) कि “जो कुछ तुम प्रार्थना में मांगते हो विश्वास करो कि पा चुके हो, और वो तुम्हें मिल जाएगा।”

    एक पर्बत के उखाड़े जाने और समुद्र में जा पड़ने का कहना उस समय के एक सामान्य रूपक का प्रयोग था। किसी कठिन समस्या या परिस्थिति के समाधान या उसे हटाए जाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था। यहां एक प्रश्न यह भी है कि यीशु किस पर्बत कि बात कर रहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि यह कोई ऐसा पर्बत है जिसे लोग जानते थे और उस समय भली भांति समझ भी रहे थे क्योंकि पद 23 में “इस पर्बत” लिखा गया है।

जब हम इस घटना के वृहद संदर्भ पर ध्यान देते हैं तो कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं। मरकुस 11 अध्याय का आरम्भ यरूशलेम में यीशु के विजयी प्रवेश के साथ होता है। अगले दिन जब यीशु यरूशलेम के मंदिर में जाता है तो वहां पर उसे दुर्व्यवस्था दिखाई देती है। वह कहता है कि लोगों ने इस प्रार्थना के भवन को डाकुओं की अड्डा बना दिया है। उस मंदिर में यीशु ने आत्मिक ढोंग और पाखंडपन को देखा। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यह स्थान एक पर्बत था अर्थात यरूशलेम का मंदिर एक पर्बत के ऊपर बनाया गया था।

वृहद संदर्भ में हम यह भी पाते हैं कि यीशु ने अंजीर के एक हरे पेड़ को उसमें फल ना होने के कारण शाप दिया था और वो सुख गया था। बाइबल में अंजीर का पेड़ इस्राइल को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता है। उस पेड़ का फ़लरहित होना इस्राइल के आत्मिक स्थिति को दर्शाता है। उस पेड़ में फल ना होने के कारण वो यीशु के लिए किसी काम का ना था और वैसे ही इस्राइल के लोगों का जीवन परमेश्वर के सन्मुख ग्रहणयोग्य नहीं था। यरूशलेम के मंदिर का डाकुओं का अड्डा बन जाना यही दर्शाता है कि वो आत्मिक रीति से फ़लरहि थे।

    इसलिए, जब चेलों ने देखा कि अंजीर का पेड़ सुख गया है और उसे देखकर चेले आश्चर्य करने लगे, तो यीशु ने पर्बत के उखाड़े जाने और समुद्र में जा पड़ने के रुपक को देते हुए न्याय की बात कर रहा था। अर्थात, यरूशलेम पर्बत पर स्थित उस मंदिर की धर्मिव्यवस्था जिसे वहां के धर्मगुरुओं ने रूढ़िवादी बना दिया था, एक ठोस और मजबूत धर्मिव्यवस्था बना दिया था, नियमों पर आधारित बना दिया था, जिसके द्वारा लोगों का आत्मिक शोषण हो रहा था, उस व्यवस्था के ऊपर अब परमेश्वर का न्याय होने पर था। इस धर्मिव्यवस्था का आधार व्यवस्था के पालन के द्वारा / अपने कामों और प्रयासों के द्वारा धार्मिकता प्राप्त करना था। यहूदी धर्मगुरु इसी बात का लाभ उठाकर लोगों पर आत्मिक शोषण कर रहे थे। इसलिए, मंदिर में व्यापार और लेन - देन हो रहा था जिसे देखकर यीशु ने कहा कि यह डाकुओं का अड्डा बन गया है।

    परन्तु, यीशु इस संसार में परमेश्वर के राज्य को स्थापित करने आया था। वो लोगों को उद्धार देने आया था जो लोगों के कार्यों, व्यवस्था पालन या लोगों के स्व-धार्मिकता पर नहीं परन्तु यीशु के कार्यों पर आधारित था। उसने संसार में आकार हमारे बदले में एक सिद्ध जीवन जिया, क्रूस पर परमेश्वर के कोप को शांत किया और हमारा प्रायश्चित बना। क्रूस पर एक महान अदला बदली हुई जिसके फलस्वरूप हमारे सारे अपराधों को उसने उठा लिया और उसने अपनी धार्मिकता हमें दे दी। अब उसके ऊपर विश्वास करने के द्वारा हम धर्मी ठहराए गए हैं। इसलिए, वो पर्बत अर्थात यरूशलेम पर्बत पर स्थित उस मंदिर की धर्मिव्यवस्था को हटा दिया जाएगा और एक ऐसी धर्मिव्यवस्था स्थापित की जाएगी जो यीशु के कार्य पर आधारित होगी क्योंकि उसने क्रूस पर हमारे स्थान पर अपने प्राण को देकर हमारा मेल परमेश्वर के साथ करा दिया।

इसलिए यीशु के इस कार्य पर विश्वास करके हम जो कुछ मांगेंगे वो हमे दे दिया जाएगा। तो यीशु के इस कार्य पर विश्वास करते हुए हम प्रार्थना में क्या मांग सकते हैं? हमें क्या मांगना चाहिए? “जो चाहो विश्वास से मांगों” का हवाला देकर क्या हम धन, समृद्धि, वैभव इत्यादि मांगेंगे? क्या हम स्वस्थ, संपन्नता, बढ़िया नौकरी, विदेश यात्रा का अवसर, और सांसारिक उन्नति मांगेंगे? नहीं, हम यह मांगेंगे कि हम एक फ़लरहित अंजीर का पेड़ ना बने। हम वो सब कुछ मांगेंगे जो हमें एक फ़लदायक अंजीर का पेड़ बनाएगी। वो सब कुछ मांगेंगे जो हमें एक ऐसा जीवन जीने के लिए आवश्यक है जिससे यीशु प्रसन्न होगा। हम यह मांगेंगे कि हमारी दृष्टि यीशु की सिद्ध धार्मिकता पर बनी रहे और उन हर एक बातों से हटती जाए जो हमारे भीतर स्वधार्मिकता के घमंड को ला सकती है। जब हम ये सब कुछ मांगेंगे, तो ऐसी प्रार्थना का उत्तर निश्चित रूप से हमें मिलेगा।

~by Monish Mitra
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अगर परमेश्वर भला है, तो बुराई क्यों है?

अगर परमेश्वर भला है, तो बुराई क्यों है?

    बहुत से लोग इस सोच से जूझते हैं - यदि परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिशाली, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है, तो वह अपनी सृष्टि में बुराई को आने नहीं देगा। जब लोग इस सृष्टि में बुराई को देखते हैं तो उनके मन में यह सवाल उठता है कि "परमेश्वर कैसे भला हो सकते है?" अगर परमेश्वर की इच्छा और मर्जी में होकर संसार में हर एक बुराई होती है, तो फिर परमेश्वर को कैसे "भला" कहा जा सकता है ? यद्यपि परमेश्वर ने हमें बुराई और पीड़ा की समस्या को लेके एक संपूर्ण और पर्याप्त उत्तर नहीं दिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि परमेश्वर इस विषय पर संपूर्ण तरीके से शांत और चुप है।

सबसे पहले हमे यह समझना है कि बुराई अपने आप में कोई "पदार्थ, धातु या वस्तु" नहीं है। बुराई को हम तीन वर्ग में विभाजित कर सकते हैं।
  • प्राकृतिक - तूफान, भूकंप, बीमारी, प्राकृतिक आपदाएं इत्यादि।
  • नैतिक - मनुष्यों के द्वारा बुरा चुनाव और बुरी क्रिया।
  • तात्त्विक - त्रुटिपूर्ण स्वभाव से भरा होना।
    तो एक साधारण परिभाषा के अनुसार यह कहा जा सकता है कि बुराई वह कार्य, चरित्र, गुण, स्वभाव और प्रकृति है जो न केवल भलाई के मापदंड और पैमाने के विपरीत है बल्कि उसकी बराबरी करने में विफल भी हैं। भलाई के तुलना में बुराई बहुत मायनों में प्रतिवाद है (विरोधाभास / विपरीत है) और कई मायनों में भलाई के तुलना में एक अभाव / कमी को दर्शाता है। इस कारण बुराई की सही समझ इस बात पर निर्भर करती है कि हम सर्वप्रथम भलाई के बारे में एक सही समझ को रखें; अर्थात बिना भलाई को जाने और भलाई के अस्तित्व के न तो बुराई की परिभाषा है और न ही उसके अस्थित्व को समझा जा सकता है। परमेश्वर के बिना भलाई का कोई आधारभूत और बुनियादी मानक नहीं है क्यूंकि भलाई की आधारभूत और बुनियादी मानक स्वयं परमेश्वर है।

इसलिए हमें कुछ बुनियादी बातों को ध्यान देने की आवश्यकता है :-

पहली बात - परमेश्वर का अस्तित्व है और बुराई का भी अस्तित्व हैं। वास्तव में परमेश्वर की सिद्ध भलाई ही वह मानक है जिसके आधार पे हम किसी चीज़ को बुरा कहते हैं क्यूंकि बिना कोई मानक के किसी चीज़ को कैसे और किस आधार पे बुरा कहा जा सकता है? बिना किसी पूर्ण मानक के भलाई और बुराई के विषय में हम सबके अलग अलग नज़रिये होंगे; फिर तो किसी के लिए हत्या और व्यभिचार बुरी बातें होंगी और किसी को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आएगी।

दूसरी बात - संसार में बुराई के अस्तित्व के पीछे परमेश्वर का एक उद्देश्य होता है। परमेश्वर कोई कार्य बेवजह और उद्देश्यरहित नहीं करता है और न ही होने की अनुमति देता है। यह हमारे लिए हर वक़्त संभव नहीं होगा कि किसी जगह या फिर किसी के साथ होने वाली बुराई का कारण हम जान जाएँ या समझ जाएँ। पवित्र शास्त्र यह सिखाती है कि परमेश्वर बुरा नहीं कर सकता है (याकूब 1:13), वह चाहे तो हर बुराई को रोक सकता है क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है (उत्पत्ति 18:14a, मरकुस 10:27), परमेश्वर अपनी योजना को पूरी करने के लिए बुराई का उपयोग भी कर सकता है (1 राजा 22:23, भजन 105:23-25)। हमें यह नहीं भूलना है कि बुराई कभी भी परमेश्वर का अंतिम उद्देश्य या लक्ष्य नहीं है; पर वह इसे एक बड़े भले उद्देश्य के लिए ठहराता है और वह बड़ा भला उद्देश्य हमारी भलाई और से भी बढ़कर परमेश्वर की महिमा है (रोमियों 8:28, याकूब 1:2-4)। उत्पत्ति 50:20 यूसुफ अपने भाइयों से कहता है यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिए बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उस बात में भलाई का विचार किया, जिससे वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं। उस बुराई के पीछे परमेश्वर के उद्देश्य को न केवल हम वहां पढ़ते हैं पर हमारे जीवन में उसका लागूकरण यूँ होता है कि परमेश्वर ने उस बुराई को इस्तेमाल करके उस वंशावली को अकाल के समय नाश होने न दिया और आगे चलके उसी वंशावली में येशु पैदा हुआ और हमे पाप में से छुड़ाया। मसीह की मृत्यु में हमे बुराई का सबसे विशाल रूप दिखता है; एक ऐसी बुराई जिसको परमेश्वर ने खुद ठहराया पर जिसके लिए परमेश्वर खुद नैतिक रूप से ज़िम्मेदार नहीं था (प्रेरितों 2:23)। इस विशाल बुराई के माध्यम से परमेश्वर ने एक महान भलाई को नियुक्त किया और वह था हमारा उद्धार। परमेश्वर के पास यह क्षमता है कि वह नैतिक रूप से ज़िम्मेदार न होते हुए भी बुराई को ठहरता है; यह उसकी महानता को साबित करता है। परमेश्वर अपने चरित्र का समझौता किये बिना ही बुराई को ठहरा सकता है।

तीसरी बात - बुराई के साथ सब कुछ समाप्त नहीं होता है। पवित्र शास्त्र कभी भी बुराई के अस्तित्व का इंकार नहीं करती है पर यह भी स्वीकार नहीं करती है की बुराई की शक्ति परमेश्वर के तुल्य या उससे अधिक है। विजय के रूप में परमेश्वर बुराई के ऊपर अपनी अंतिम घोषणा को ठहरता है। अपने अंतिम छुटकारे के लिए सृष्टि करहाती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है (रोमियों 8:22)। सारी सृष्टि के ऊपर मसीह पुनर्जीवित होके, जयवंत होके खड़ा है और सब कुछ नया करने वाला है।

तो फिर क्या कहा जाए ?
    एक बात हम निश्चित रूप से जानते हैं कि बुराई का अस्तित्व है। उसका अस्तित्व तो है; अगर कहीं और नहीं तो हमारे चरित्र में, व्यवहार और क्रियाओं में तो निश्चित रूप से है। हम यह भी जानते हैं कि बुराई संसार में दुःख, तकलीफ और वेदना लेके आता है, पर हम इस बात से निश्चित हैं कि परमेश्वर की संप्रभुता सब पर है और वह अपनी संप्रभुता में बुराई के ऊपर अपना अंतिम फैसला दे चुका है। वह बुराई के हाथ में उस अंतिम जीत को नहीं सौंपेगा। सदैव ही से बुराई परमेश्वर की जीत के हित में ही काम करती है भले ही हम अपने सीमित विचार शक्ति में उसे समझ न सके। संसार में इन बुराई के मध्य हम परमेश्वर के उस अंतिम जय और छुटकारे में प्रवेश करने की आशा में आनंद और विश्राम को पा सकते हैं; लेकिन जब तक हम उसमे प्रवेश नहीं करते तब तक हमे इस संसार में रहना है जो पाप से ग्रसित हैं। भले ही वर्तमान में कैसी भी बुराई को हम देखते हैं परन्तु पवित्रशास्त्र हमे उस भले भविष्य के बारे में बताती है जिसको परमेश्वर ने हमारे लिए रखा है (प्रकाशित वाक्य 21: 3-4)।

~Article by Monish Mitra

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विश्वास से भटकने के चार कारण


परिचय

स्थानीय कलीसिया में एक रखवाले / उपदेशक / प्राचीन की भूमिका में सुसमाचार का प्रचार करना और पवित्र शास्त्र से शिक्ष्या देना एक बड़ी ज़िम्मेदारी होती है। इस सेवकाई के फलस्वरूप जब हम यह गवाही सुनते हैं की किस प्रकार सुसमाचार के प्रचार के द्वारा लोगों ने अनंत जीवन को पाया तो यह एक बहुत आनंद का विषय होता है। पर एक सच्चाई यह भी है की कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो विश्वास से पीछे हट जाते हैं जब उनके जीवन में दुःख, तकलीफ और परीक्षा आती हैं। वह मसीह संगति त्याग देते हैं और अपने पुराने जीवन में लौट जाते हैं। मत्ती 16:13-15 में हम यह पाते हैं की केसरिया फिलिप्पी के देश में लोग यीशु के बारे में अलग-अलग विचार रखते थे। कितने तो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला कहते थे और कितने एलिय्याह, और कितने यिर्मयाह या भविष्यवक्ताओं में से कोई एक कहते थे। पर यीशु ने अपने चेलों से कहा; "परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?"

यीशु कौन है? - जब तक हम इसकी सही समझ के आधार पर अपने विश्वास का अंगीकार नहीं करते, हम विश्वास से भटक जाएंगे। सामान्य तौर पे, लोगों का यीशु के बारे में चार भ्रम / गलतफ़हमी होता है भले ही वह अपने आप को विश्वासी कहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे अपने जीवन में क्लेश, परीक्षा और कठिन समय में विश्वास से भटक जाते हैं। इस लेख के माध्यम से हम उन चार बातों पर विचार करेंगे।

1. यीशु, परमेश्वर तक पहुँचने के अनेक रास्तों में से एक है या स्वर्ग तक पहुँचने के अनेक तरीकों में से एक है।
इस संसार में बहुत सारे लोग धार्मिक बहुलवाद / अनेकवाद विचारधारा रखते हैं। आस्था वादी होने के कारण वह स्वर्ग भी जाना चाहते हैं। धार्मिक बहुलवाद / अनेकवाद विचारधारा रखने वाले यह आस्था वादी लोग ईसाई धर्म को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। अनेक धर्मगुरुओं में से वह यीशु को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। शायद वह यीशु की नम्रता या सादगी या निष्कपटता से बहुत प्रभावित हुए हैं। इसलिए वे यीशु का अनुसरण करना चाहते हैं और उसपर विश्वास करते हैं। उन्होंने कभी भी यीशु के उन विशिष्ट दावों पर भरोसा नहीं किया जिसका उल्लेख यीशु ने यूहन्ना 6:48, 8:12, 10:9,11, 11:25, 14:6, 15:1 में किया था। वे प्रेरितों की शिक्षाओं पर भरोसा नहीं करते हैं जिन्होंने लिखा है कि स्वर्ग के नीचे कोई दूसरा नाम नहीं है जिसके द्वारा मनुष्य उद्धार पा सकता है (प्रेरितों के काम 4:12), परमेश्वर और मनुष्य के बीच केवल एक बिचवई है (1 तीमुथियुस 2:5)। इन बातों को गंभीरता से न लेने के कारण ऐसे लोग जीवन में क्लेश, परीक्षा और कठिन समय में विश्वास से भटक जाते हैं। जब तक किसी व्यक्ति का यीशु के प्रति समझ, उस पर विश्वास और अंगीकार यीशु के विशिष्ट दावों पर आधारित नहीं है, तब तक उनका विश्वास और अंगीकार केवल सतही है और वह अंततः विश्वास से भटक जाएंगे।

2. यीशु के पीछे चलने से हमें पृथ्वी पर एक आरामदायक और अच्छा जीवन मिलेगा।
बहुत से ऐसे लोग हैं जो पृथ्वी पर एक आरामदायक जीवन की तलाश में हैं। वे किसी ऐसे अगुवा की तलाश में हैं जो उन्हें इस धरती पर एक आरामदायक जीवन दे सके। हो सकता है कि इस वजह से वे उन चंगाई, चिन्हों और चमत्कारों से आकर्षित भो गए जो यीशु ने पृथ्वी पर रहते हुए लोगों के मध्य किया था। इसके आधार पर वे मानते हैं कि यदि वे यीशु को अपने जीवन में स्वीकार करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं तो यीशु भी उनके जीवन में ऐसे चंगाई, चिन्ह और चमत्कार करेंगे और उन्हें भौतिक आशीष प्रदान करेंगे जिनकी उन्हें आवश्यकता है। वे जीवन के बारे में चिंतित हैं और चाहते हैं कि यीशु उन्हें चिंताओं से मुक्त जीवन देंगे जहाँ आराम और शांति होगी। वे यह देखने में विफल जो जाते हैं कि यीशु ने हमें चिंता करने के बजाय अपने जीवन की आवश्यकताओं के लिए नियमित रूप से उस पर भरोसा और निर्भर रहने के लिया कहा है (मत्ती 6:11, 25-34)। ऐसा न करने के कारण वह जीवन के क्लेश, परीक्षा और कठिन समय में विश्वास से भटक जाते हैं। यीशु के जीवन को देखें तो हम पाते हैं की यीशु ने विलासमय जीवन नहीं जिया परन्तु वह स्वर्ग से उतरकर आया और परमेश्वर पिता की योजना को पूरा करने के लिए संपूर्ण आज्ञाकारिता और पिता परमेश्वर की निर्भरता में रहा (फिलिप्पियों 2:7-8)। यदि कोई व्यक्ति केवल चिंता मुक्त जीवन का आनंद लेने के लिए यीशु पर अपना भरोसा रखना चाहता है पर वह यीशु पर दैनिक रूप से निर्भर होकर जीना नहीं चाहता है, वह अंततः विश्वास से भटक जाएंगे।

3. यीशु जो भला और प्रेमी है, मेरे जीवन में पीड़ा या बुराई को होने नहीं देगा।
कुछ ऐसे लोगों का समूह भी है जो इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकते कि मसीह जीवन में दुख भी शामिल होता है। हो सकता है कि वे सोचते हों कि चूंकि यीशु ने हमारे लिए क्रूस पर दुख उठाया है, इसलिए हमें इस जीवन में न तो दुखों को सहना है और न ही दुखों का सामना करना है। वे दुखों से भयभीत हो जाते हैं और मसीह के लिए कष्ट सहने से हिचकिचाते हैं। वे मानते हैं कि बाइबिल में दिए गए कुछ वचनों का दावा और घोषणा करना उन्हें दुखों और बुराई से प्रतिरक्षा करता है। वे यीशु द्वारा निर्धारित शिष्यता की माँगो को अनदेखा करते हैं जहाँ यीशु स्पष्ट करता है कि जब हम प्रतिदिन क्रूस उठाकर चलेंगे और उसका अनुसरण करेंगे, तो लोग हमें घृणा करेंगे, उसके लिए हम सताए जाएंगे (लूका 14:27, मत्ती 5:11, यूहन्ना 17:18,20)। वे प्रेरितों के उन शिक्षाओं को भी नज़रअंदाज़ करते हैं जहाँ प्रेरितों ने यह स्पष्ट कर दिया कि दुख और कष्ट हमारे विश्वास का एक हिस्सा है जिसे हमें सहना है और इन कष्टों और दुखों के पीछे परमेश्वर का एक उद्देश्य है जैसा कि 1 पतरस 1:6-7, 4:1, 5:10, 2 तीमुथियुस 3:12, याकूब 1: 2-4, 12, रोमियों 5:3-5, 2 कुरिन्थियों 1:3-4 में लिखा गया है। यदि कोई व्यक्ति यीशु के लिए कष्ट सहना नहीं चाहता है, एक स्वार्थी रवैया रखता है और दुःख-पीड़ा रहित मसीह जीवन जीना चाहता है वह अंततः विश्वास से भटक जाएगा।

4. यीशु हमें अपनी इच्छानुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है क्योंकि अब हम व्यवस्था के अधीन नहीं हैं परन्तु अनुग्रह के अधीन हैं।
कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मसीह का अनुसरण करना चाहते तो हैं, लेकिन वे जवाबदेह नहीं ठहराया जाना चाहते हैं। वे नहीं चाहते हैं की उन्हें कोई सुधारे, अनुशासित करें और न ही कोई उन्हें कुछ सिखाए। वे इस धारणा रखते हैं कि उन्हें मसीह ने स्वतंत्र ठहरा दिया है। इसलिए उनसे बिना कोई पूछताछ और जवाबदेही के अपनी स्वतंत्रता का आनंद लेने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि वे अनुग्रह के अधीन हैं। हाँ, यह सच है कि हम मसीह के द्वारा स्वतंत्र किए गए हैं, परन्तु यह लोग इस तथ्य को पसंद नहीं करते कि अब हम मसीह में धार्मिकता के दास बन गए हैं (रोमियों 6:18)। वे इस सच्चाई को पसंद नहीं करते हैं कि अनुग्रह के अधीन होने का मतलब यह नहीं है कि अब हम एक अनियंत्रित जीवन, जवाबदेह रहित जीवन जी सकते हैं और जो चाहे वह कर सकते हैं। हम अनुग्रह के अधीन हैं और हम मसीह की देह (स्थानीय कलीसिया) का भी भाग हैं जहाँ हम संगी विश्वासियों के साथ जुड़ते हैं और आत्मा के द्वारा परमेश्वर का निवास स्थान होने के लिये एक साथ बनाए जाते हैं (इफिसियों 2:19-22)। पवित्र शास्त्र के द्वारा उपदेश पाना, समझ प्राप्त करना, सुधार प्राप्त करना, और धर्म की शिक्षा पाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए (2 तीमुथियुस 3:16-7)। वास्तव में अनुग्रह के अधीन होना हमें मसीह में हमारे चाल चलन के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाता है। हमें अपने जीवन में पवित्रीकरण और पवित्रता का अनुसरण करना चाहिए (रोमियों 12:1, 1 कुरिन्थियों 6:19, 2 कुरिन्थियों 7:1, इफिसियों 5:3, 27, 1 थिस्सलुनीकियों 4:7, 1 पतरस 1:15-16)। यह तब नहीं हो सकता जब तक हम अनुग्रह के बहाने एक मनमर्जी का जीवन जीने की स्वतंत्रता चाहते हैं। यदि कोई व्यक्ति पूर्ण स्वतंत्रता चाहता है, उसके पास सीखने की प्रवृत्ति नहीं है, उसे अधीनता, जवाबदेही पसंद नहीं है पर वह मसीह का अनुसरण करना चाहता है, वह अंततः विश्वास से भटक जाएगा।

निष्कर्ष
भाइयों और बहनों, हमें यह याद रखना होगा कि एक व्यक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण और जरूरी है कि वह मसीह के बारे में क्या सोचता है, समझता है और स्वीकारता है। यदि उसका अंगीकार मसीह के बारे में एक ऐसी सतही समझ पर आधारित है जो उसके अनुकूल है, उन्हें लाभ और फ़ायदा पहुँचाता है, उनके लिए सहज और आसान जान पड़ता है, वह अंततः विश्वास से भटक जाएंगे। जब भी हम सुसमाचार को बताते हैं, आइए इसे बहुत स्पष्ट करें और लोगों को समझाएं कि यीशु कौन हैं, उसके विशिष्ट और अनोखे दावे क्या हैं और शिष्यता के जीवन में हमसे यीशु का क्या मांग है। यह सच है कि क्रूस का संदेश लोगों को असहज करेगा, लोग इस सुसमाचार को पसंद और प्रेम नहीं करेंगे। यह बहुतों के लिए ठोकर का कारण होगा, जिसे बहुतों ने ठुकरा दिया है, लेकिन सच्चाई तो यह है की हर एक विश्वास करने वाले के लिये यह उद्धार के निमित परमेश्वर की सामर्थ है।

Ps Monish Mitra

पुराने नियम के कठिन भागों को पढ़ते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

परिचय 

अकसर मसीह लोग जब पुराने नियम को पढ़ते हैं तो पुराने नियम के कुछ कठिन भागों / खण्डों / बातों को लेकर काफी असहज महसूस करते हैं। उन्हें बहुत सी बातें ठीक नहीं लगती हैं और वह इस विचार से जूझते हैं की पुराने नियम में / बाइबिल में यह सब बातें क्यों लिखी गयी हैं। अगर कुछ गैर मसीह लोगों की बात करें तो वह इन विषयों को लेकर बाइबिल, परमेश्वर, यीशु मसीह और ईसाई धर्म के बारे में अपशब्द, बुराई, ठट्टा, मज़ाक इत्यादि करने का खूब फ़ायदा उठाते हैं। नामधारी ईसाई और नास्तिक लोग इन बातों का हवाला देकर परमेश्वर के अस्तित्व पर सवाल भी उठाते हैं। हम पुराने नियम के कुछ कठिन भागों / खण्डों / बातों का सामना कैसे करें ? 

इन्हें पढ़ते समय अगर हम कुछ बातों का / नियमों का ध्यान रखें तो हम इन कठिन भागों / खण्डों / बातों को आसानी से समझ सकेंगे और दूसरों को भी समझा पाएंगे। दो मुख्य मुद्दों को हम देखेंगे जिसपर हमारी समझ सही होनी चाहिए अगर हम पुराने नियम को ठीक से अध्ययन करना चाहते हैं। 

- पुराने नियम में कठिन और असहज बातें और संदेहवादी सोच 

- परमेश्वर का अपनी महिमा को लेकर स्व-केंद्रित होना 


पुराने नियम में कठिन और असहज बातें और संदेहवादी सोच

1. सबसे पहले तो हम यह याद रखें की पुराने नियम के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को नज़रअंदाज़ करके हम उसके कठिन भागों को समझ नहीं सकते हैं। हमें यह याद रखना होगा की उस समय का प्राचीन पूर्वी क्षेत्र समाज जहाँ उस समय के लोग रहते थे और आज का आधुनिक समाज जहाँ हम रहते हैं, दोनों अलग अलग हैं। मौलिक आधार पर (on fundamental level) उस समय के लोगों के विचार, सोच, प्राथमिकता इत्यादि बहुत अलग थे। इसीलिए हमें आज के आधुनिक समाज के संदर्भ की समझ के पृष्ठभूमि पर आधारित विचारों को, सोच को, प्राथमिकताओं को उनपर थोपना नहीं चाहिए और अर्थ को निकलना नहीं चाहिए। यहाँ पर हम यह नहीं कह रहे हैं की वह सिद्ध थे, सही थे पर हम यह कह रहे हैं की हमें उस इतिहास को स्वीकारना होगा जैसा की वह था और जिसका हिस्सा वह लोग थे। 

2. इसराइली संस्कृति / प्रथा / रहन-सहन / के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के मध्य में, उनके मनुषत्व की कमज़ोरियों के बावजूद, परमेश्वर उनका चुनाव करता है और अपने  कार्य को उनके मध्य शुरू करता है। तो हम देखते हैं की इसराइली समाज में जो एक प्राचीन समाज था, परमेश्वर अपने आप को प्रकट करता है। परमेश्वर उनके कमजोरिओं से वाक़िफ़ है, परमेश्वर उनकी कमियों को जानता है। आज के आधुनिक समाज के साथ तुलना की जाए तो बहुत सी असहज बातों को हम पाएंगे। युद्ध, बंधक बनाकर लोगों को रखना, पुरुष वर्चस्व (male domination) जैसी बातें उस समय के समाज में देखा जाता था। ऐसी बातों को पढ़कर हमें लगता है की यह सब कितनी गलत बातें हैं, उनकी विचारधारा तो लोकतंत्रीय नहीं है, वह तो रूढ़िवादी हैं और हमें असहज महसूस होगा। लेकिन सच्चाई यह है की यह सब उस समय के प्राचीन समाज में प्रचलित बातें थी। हमें इस बात को स्वीकारना होगा की प्राचीन इसराइली जिन सामाजिक संरचना के अनुसार चलते थे वह आज के आधुनिक सामाजिक संरचना से भिन्न थी।

3. यह हमारे लिए एक उपयोगी और लाभदायक विचार होगा जब हम यह समझ लेंगे की पुराने नियम में इसराइली लोगों को दी गयी हर विधियां परमेश्वर के आदर्श पूर्ण चरित्र का प्रतिनिधित्व नहीं है। इसराइली लोगों के मन की कठोरता के कारण उन्हें कुछ बातों की अनुमति दी गयी थीं, परन्तु आरम्भ में ऐसा नहीं था (व्यवस्था विवरण 24:1 / मत्ती 19:8)। परमेश्वर का आदर्श पूर्ण स्वभाव तो यह है की पुरुष अपने माता पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे एक तन बने रहेंगे (उत्पत्ति 2:24)। पुराने नियम की कुछ आज्ञाएं जैसे की परमेश्वर को अपने सारे ह्रदय से प्रेम करना, परमेश्वर को पवित्र जानना, उसकी आराधना करना इत्यादि परमेश्वर के आदर्श पूर्ण चरित्र का प्रतिनिधित्व करती हैं क्योंकि वह उसके योग्य है। लेकिन हम कुछ ऐसी विधिओं को भी देखते है जिसे परमेश्वर में अपने नियम में उस समय के सामाजिक पृष्ठभूमि को देखते हुए दिया था।

4. इसराइली लोगों के वास्तविक अवस्था में परमेश्वर उन्हें चुनता है और उन्हें एक छुटकारे की दिशा में लेकर चलता है जिसका एक गहरा आत्मिक तात्पर्य है। अपने विधिओं में परमेश्वर कुछ प्राथमिकताओं को नियुक्त करता है जो उन्हें उस छुटकारे के मार्ग में चलने और बने रहने के लिए मददगार होगा। परमेश्वर यह भी जानता है की यह लोग तो मनुष्य ही हैं, उनमें कमज़ोरियाँ भी हैं, वह पाप करेंगे। इस सच्चाई को भी ध्यान में रखते हुए परमेश्वर इन लोगों के जीवन में अपने कार्य को निरंतर करता रहता है। 

5. पुराने नियम में दिए गए विवरण (descriptive) की हर बातें निर्धारण (prescriptive) की बातें नहीं हैं। तो जब हम पुराने नियम में कुछ कठिन, असहज विवरणों को पढ़ते हैं यह हमें उसका अनुकरण करने के लिए नहीं सिखाता है पर हमारे लिए दो मकसद प्रस्तुत करता है। पहला यह है की मनुष्य के पापमय स्वभाव को पवित्र परमेश्वर इतिहास में छुपाता नहीं है पर उजागर करता है। दूसरा यह की अकसर विवरण की बातें हमारे लिये दृष्टान्त होती हैं, कि जैसे उन्होंने लालच किया, वैसे हम बुरी वस्तुओं का लालच न करें (1 कुरिन्थियों 10:6)।


परमेश्वर का अपनी महिमा को लेकर स्व-केंद्रित होना

1. पुराने नियम में हम देखते हैं की परमेश्वर सिर्फ अपनी महिमा की बात करता है, हर चीज़ को अपनी महिमा से जोड़ता है, लोगों को आज्ञा देता है की मनुष्य परमेश्वर को महिमा दे। अगर परमेश्वर स्व महिमा केंद्रित है तो वह कैसे मनुष्य की चिंता कर सकता है? वह कैसे मनुष्य के हित में कुछ कर सकता है? 

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर हमें यह समझना होगा की प्राचीन पूर्वी क्षेत्र में सम्मान, आदर, इज़्ज़त, प्रतिष्ठा को दर्शाने और स्थापित करने की धारणा एक मुख्य धारणा थी। इसका अर्थ यह नहीं की परमेश्वर को इन बातों की आवश्यकता है। हमें यह समझना है की परमेश्वर का स्तर मनुष्य से ऊपर है और मनुष्य की सोच के अनुसार वह महिमा, प्रतिष्ठा, आदर, सामान के बारे में नहीं सोचता है और न उन बातों की लालसा रखता है।  अगर परमेश्वर ही सर्वशक्तिमान और सृष्टिकर्ता है, तो फिर परमेश्वर का प्राचीन पूर्वी क्षेत्र के लोगों के मध्य अपनी प्रतिष्ठा को दर्शाने के लिए अपनी महिमा की बात करना एक वाजिब बात थी। वह एक स्व केंद्रित व्यवहार या विचारधारा नहीं था पर यह उस समय के लोगों का प्रतिष्ठा को दर्शाने और स्थापित करने की मानसिकता के बिलकुल अनुरूप था। अगर वह सर्वशक्तिमान और सृष्टि कर्ता है तो यह कैसे संभव था की वह अपनी महिमा की बात न करता ?

3. सर्वशक्तिमान और सृष्टिकर्ता परमेश्वर को अपने जीवन के केंद्र में न रखना लोगों के लिए एक भयानक बात होती क्योंकि परमेश्वर को यह नहीं भाता है। परमेश्वर को त्यागकर जब मनुष्य दूसरी बातों में, चीज़ों में, झूठे ईश्वर में अपनी पहचान को ढूंढ़ता है यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रति एक अपमान है।  परमेश्वर के अनुसार लोगों का सच्चे परमेश्वर को त्यागकर झूठे ईश्वर के पीछे चलना एक बुराई थी। यिर्मयाह 2:13 में परमेश्वर कहते हैं की "क्योंकि मेरी प्रजा ने दो बुराइयां की हैं: उन्होंने मुझ बहते जल के सोते को त्याग दिया है, और, उन्होंने हौद बना लिए, वरन ऐसे हौद जो टूट गए हैं, और जिन में जल नहीं रह सकता।" इन बातों के द्वारा परमेश्वर यह चाहता है की मनुष्य की संतुष्टि केवल परमेश्वर में ही है। 


निष्कर्ष
आज हमारे समाज में बाइबिल, परमेश्वर, यीशु मसीह और मसीहत के ऊपर बहुत सवाल उठाये जा रहे हैं। हमें इसका सामना करने के लिए बाइबिल को लेकर अपने अध्ययन को मजबूत करने कि आवश्यकता है। यह सच है की यीशु ने यह कहा की लोग हमें यीशु के नाम के कारण घृणा करेंगे। पर हमें इस बात को एक बहना बनाकर बाइबिल, परमेश्वर, यीशु मसीह और मसीहत के विरुद्ध उठते हुए सवालों से भागना नहीं चाहिए। हमें प्रेरित पतरस की बातों को स्मरण करना चाहिए जो उन्होंने 1 पतरस 3:15 में कहा था और  उसके अनुसार अपनी तैयारी करने की आवश्यकता है। प्रभु यीशु हमारी सहायता करें की हम उसके राज्य के लिए अपनी ज़िम्मेदारी को विश्वास योग्यता के साथ निभाते रहें।

आमीन !

Ps. Monish Mitra

यदि यीशु खुदा है, तो खुदा की परीक्षा कैसे हो सकती है?

यदि यीशु खुदा है, तो खुदा की परीक्षा कैसे हो सकती है?

जय मसीह की त्रिज्ञा परमेश्वर के नाम से आप सब का स्वागत है और यह विडीयों सिरीज़ हम जारी रखेंगे जहाँ पर हम ऐसे सवालों को, हम जवाब देगें जो यीशु मसीह के दैविक्ता के विरुद्ध और बाइबल के विरुद्ध उठाई जाती हैं। बहुत सारे हमारे मुसलमान दोस्त याकूब की किताब 1:13 वचन के अनुसार यह कहते हैं, कि परमेश्वर की परीक्षा नहीं होती। लेकिन मत्ती की किताब में 4 अध्याय में हम देखते हैं; कि यीशु मसीह की परीक्षा रेगिस्तान में और उस जंगल में होती हैं शैतान द्वारा,

तो उनका तर्क और प्रश्न यह है, यदि यीशु खुदा हैं तो उनकी परीक्षा कैसे हो सकती है? लेकिन यहाँ पर मत्ती 4 अध्याय में यीशु मसीह की परीक्षा होती है। तो इससे यह साबित होता है कि यीशु मसीह खुदा नहीं।

जवाब देखने से पहले हमें यह जानना जरूरी है, कि यह जो शब्द “परीक्षा” है यह सन्दर्भ के अनुसार इसके अर्थ अलग-अलग हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर पुराने नियम में व्यवस्थाविवरण 6:16 वा वचन में हम पढ़ते हैं। "तुम अपने परमेश्वर यहोवा की परीक्षा न करना, जैसे कि तुमने मस्सा में उसकी परीक्षा की थी।" तो पुराने नियम में क्या परमेश्वर की परीक्षा हुई थी? जी “हाँ” वही चीज हम (निर्गमन17:1-2; मलाकी 3:15; भजन संहिता 106:14) वचन में पढ़ते हैं। पुराने नियम में परमेश्वर की परीक्षा हुई; तो क्या इसका मतलब यह है, याकूब 1:13 के अनुसार यहोवा पुराने नियम के परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उनकी परीक्षा हुई थी। बिल्कुल “नहीं” हमें यह समझना जरूरी है, कि कौन से सन्दर्भ में याकूब ने यह कहा कि परमेश्वर की परीक्षा नहीं हो सकती।

सन्दर्भ जानने के लिए हम याकूब 1:13 वा वचन को पढ़ेंगे, "जब किसी की परीक्षा हो, तो कोई यह न कहें कि मेरी परीक्षा परमेश्वर की ओर से होती है; क्योंकि न तो बुरी बातों से परमेश्वर की परीक्षा हो सकती है...। "बुरी बातों से परमेश्वर की परीक्षा नहीं हो सकती।"

तो यह पंक्ति जो है, स्पष्ट तरीके से हमें अर्थ समझा देता हैं कि याकूब कहना क्या चाहतें है। 

दो प्रकार की परीक्षाएँ होती हैं।

पहला : एक परीक्षा जो अंदुरूनी रूप से इंसान के अन्दर से पाप करने की लालसा, बुराई करने की लालसा होती है और दुसरा : जो परीक्षा का अर्थ यह हो सकता हैं, जाँचना तो याकूब यहाँ पर यह कहते हैं कि परमेश्वर कभी भी ऐसे परीक्षा में नहीं पड़ता है; जिससे वह कोई बुरा काम करें यानी कि परमेश्वर के अन्दर से बुराई करने जैसा या फिर पाप को पुरा करने जैसा लालसा  वाला कोई भी परीक्षा नहीं आता है। यह जो दुसरा प्रकार का परीक्षा है, उसे हम कहते हैं "जाँचना" जब पुराने नियम मे हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर की परीक्षा हुई हैं। तो इसका मतलब है कि परमेश्वर की परीक्षा ली गई, दूसरों के द्वारा इस्राएली लोगों के द्वारा, पापी लोगों के द्वारा न कि परमेश्वर के अन्दर से!

तो उसी प्रकार मत्ती 4 अध्याय में हम मानते हैं, कि यीशु मसीह की परीक्षा हुई। लेकिन यह परीक्षा यीशु मसीह  के अन्दर से लालसा को पुरी करने के लिए, पाप को पूरी करने के लिए आई हुई, आशायें और लालसाएँ नहीं है बल्कि बाहरी रूप से शैतान के द्वारा यीशु को जाँचने के लिए आया गया परीक्षा हैं।

भजन संहिता 106:14 वा वचन में हम देखते हैं, लोगों ने जंगल में परमेश्वर की परीक्षा ली और उसी प्रकार मत्ती 4 अध्याय में शैतान ने उसी रेगिस्तान जंगल में  यीशु मसीह की परीक्षा ली। पुराने नियम के परमेश्वर उस परीक्षा से विजय हुए, और क्योंकि वह परीक्षा अन्दर से नहीं बल्कि बाहर से आया। वैसे ही यीशु मसीह भी उस परीक्षा में विजय हुए, क्योंकि वह अन्दर से नहीं बल्कि बाहर से आया। तो यह जो वचन है परमेश्वर के दैविक्ता के ऊपर कोई भी नहीं सवाल उठाता है; यह बस पढ़ने वालों की गलती है हमें जानना जरूरी है कि वह परीक्षा सन्दर्भ में क्या अर्थ लाता है। यदि आप सच्चाई से सत्य को ढूँढते है आप बाइबल पढ़ते समय उस शब्द का अर्थ सन्दर्भ में पढ़े, तो आपको पता चल जायेगा कि वाकई में वह वचन यीशु के दैविक्ता के विरुद्ध जा रही है या फिर दैविक्ता के लिए वह बहुत बड़ा मजबूत सबुत बनते जा रहा है।

प्रभु यीशु आपको आशीष करें!

Transcription by Nini Pandit

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क्या यीशु सिर्फ इस्राएल के लिए भेजे गए? (डॉ. जाकिर नाइक को जवाब)




 क्या यीशु सिर्फ इस्राएल के लिए भेजे गए? (डॉ. जाकिर नाइक को जवाब)

डॉक्टर ज़ाकिर नाइक : लेकिन जितने भी पैगम्बर, आखरी पैगम्बर मोहम्मद सल्लोहशलूम के पहले आए। वह सिर्फ अपनी कोम के लिए भेजे गये थे और उनका पैगाम मुक्कमल तौर पर सिर्फ एक दौड़ के लिए था, मिसाइल के तौर पर कुरान में जिक्र आता है कि ईसा अलैहिस्सलाम सिर्फ बनी इस्राएल के लिए भेजे गए थे।  अल्लाह ताला फरमाते सुराह नं 3:49 में हमनें ईसा अलैहिस्सलाम को भेजा पैगम्बर बनी इस्राएल के लिए, जब हम बाइबल पढ़ते हैं, बाइबल में भी यह पैगाम लिखा गया है कि ईसा अलैहिस्सलाम सिर्फ बनी इस्राएल के लिए भेजे गए थे कई जगह लिखा है, मत्ती की सुसमाचार 10:5-6 में भी लिखा है, ईसा अलैहिस्सलाम फरमाते हैं अपने साथियों से कहते हैं, (Go in not in to way of the Gentiles) अन्यजातियों के पास मत जाइए, अन्यजाति वह लोग हैं जो ग़ैर यहूदी हैं। अगर कोई इंसान गैर यहूदी हैं उसे कहते है "अन्यजाति" ईसा अलैहिस्सलाम फरमाते हैं आप मत जाइए गैर यहूदी के पास (Enter not into the city of the Samaritians) आप सामरी के शहर में मत जाइए। लेकिन आप जाइए उन भटके हुए बनी इस्राएल के पास भटके हुए यहुदी के पास ईसा अलैहिस्सलाम फरमाते हैं सुसामाचार मत्ती में अध्याय 15:24 में, मैं नहीं भेजा गया हूँ। लेकिन सिर्फ भटके हुए बनी इस्राएल के लिए, मैं सिर्फ यहूदियों के लिए भेजा गया हूँ। लेकिन जैसे मैंने कहा कि जितने भी पैगम्बर मोहम्मद सल्लोहशलूम के पहले आए वह सिर्फ अपनी कोम अपनी उम्मद के लिए भेजे गए थे.....…।

फ्रांसिस : जैसे कि आपने इस विडीयों क्लीप में देखा, डॉक्टर ज़ाकिर नाइक बाइबल से प्रमाण करते हैं कि यीशु जो है केवल एक कोम के लिये यानी कि एक ग्रुप, एक जाति इस्राएल के लिए भेजें गए हैं और केवल यहूदियों के लिए भेजें गए हैं। अरे नहीं! यह तो बुरा खबर है! तो यीशु हमारे लिए नहीं भेजें गए? यीशु केवल इस्राएल के लिए भेजे गए? तो हमारा विश्वास का क्या? तो क्या हम ईसाइयत छोड़ दें? 

निर्णय लेने से पहले आप इन बातों को थोड़ा बारीकी से, थोड़ा नजदीकी से सोचकर, जांचकर देखिए। क्या है करके? इनके जैसे, डॉक्टर ज़ाकिर नाइक जैसे और भी बहुत सारे मुस्लिमस है वह यह दावा करते हैं कि बाइबल के अनुसार हम प्रमाण कर सकते हैं कि यीशु केवल इस्राएल के लिए भेजे गए हैं और पूरे दुनिया के लिए नहीं? यह वादविवाद को लेकर वह ईसाई को समझाएंगे कि मोहम्मद कुरान में लिखा है, कि वह आखरी नबी हैं। तो आखरी नबी होने के कारण उनको अनुसरण करना चाहिए, उनके पीछे चलना चाहिए और उनके शिक्षा को पालन करना चाहिए। 

लेकिन बाइबल जब हम खोलते हैं, पुरा कहानी बदल जाएगा; जैसे मैंने आपको पहले भी कहा और यह दावा को, यह वादविवाद को सामने रखते हुए, मुस्लिमस जो दो बाइबल के वचन संकेत करते हैं कि जैसे हमेशा की तरह डॉ.ज़ाकिर नाइक ने भी जो याद करके, मनन कर के आए थे। 

वह है मत्ती की पुस्तक 10:5-6 वचन मैं आपको यह पढ़कर दिखाना चाहूँगा।

"यीशु ने इन बारहों को बाहर भेजते हुए आज्ञा दी। गैर यहूदियों के क्षेत्र में मत जाओ; तथा किसी भी सामरी नगर में प्रवेश मत करो, बल्कि इस्राएल के परिवार की खोई हुईं भेड़ो के पास ही जाओ।"

दूसरा वह संकेत करते हैं। (मत्ती की पुस्तक 15:24) "यीशु ने उत्तर दिया, मुझे केवल इस्राएल के लिए, इस्राएल के लोगों के लिए भेजा गया है और खोई हुई भेड़ो के अलावा मैं भेजा नहीं गया हूँ।"

तो डॉक्टर ज़ाकिर नाइक ने भी यह वचन पढ़कर दिखाया हमारे लिए, सब से पहले हमें यह जानना जरूरी है कि यीशु का जन्म जो हैं, अब्राहम, इसहाक, याकूब, यह पंक्ति से हुआ है यानी कि यह पीढ़ी से हुआ है और यीशु जो हैं, एक प्रतिज्ञा या वादा का परिपूर्णता है, "(Jesus Christ is the Fullfillment of the Promise given to Abraham) अब्राहम को जो वादा परमेश्वर ने किया उसके परिपूर्णता के एक बालक हैं।" अब अब्राहम ने परमेश्वर का आज्ञा पालन किया जो कि हम अच्छे से जानते है। जिस कारण परमेश्वर उनसे प्रसन्न होकर उनको दो भागी आशीष दिया।

पहिला : उनका आशीष यह था कि मैं तुम्हारी इस्राएल की जाति को जो है, इस दुनिया में सबसे ज्यादा आशीष करुँगा। (I will bless the Nation of Israel)।

दूसरा : भाग का आशीष यह था, वादा यह था कि इस इस्राएल के द्वारा मैं पूरे राष्ट्र को, पूरे देशों को, पूरे दुनिया को जो हैं; मैं आशीष करुँगा और यह वादा जो परमेश्वर ने सदियों पहले अब्राहम से की थी। वह यीशु मसीह के जन्म में पुरा हुआ।" 

जब यीशु मसीह का जन्म हुआ यीशु को लेकर यीशु के माता ने उनको अपने भवन में लेकर गए समर्पण के लिए उस समय उस भवन में एक बुजुर्ग जो बहुत ही समर्पित यानी कि जो भक्तिमान आदमी थे। उन्होंने यीशु मसीह को अपने हाथ में लिया यीशु बालक को हाथ में लेकर उन्होंने आत्मा में भरकर, आत्मा में होकर उन्होंने कहा और उसका अभिलेख हम बाइबल में पढ़ सकते हैं। 

लूका की पुस्तक 2:30-32 तक मैं पढ़ता हूँ, आपके लिए: "क्योंकि मैं अपनी आँखों से तेरी उस उद्धार का दर्शन कर चुका हूँ; जिसे तू ने सभी लोगों के लिए सभी लोगों के सामने तैयार किया है। यह बालक, कौन सा बालक? "यीशु" जो वह समर्पित आदमी ने अपने हाथ में रखा है; वह बालक यीशु गैर यहूदी के लिए, ध्यान से सुना आपने... गैर यहूदी के लिए टेढ़े मार्ग किसके? परमेश्वर के मार्ग को उजागर करने के हेतू प्रकाश का स्त्रोत है और तेरे अपने इस्राएल के लोगों के लिए यह महिमा है।"

तो यह देखिए, अब्राहम को जो वादा परमेश्वर ने किया सदियों पहले वह यीशु मसीह के जन्म के बाद पूरा हो रहा है और यह वचन हमें सफाई बताता है कि यीशु मसीह का सेवा भी यह दुनिया में दो भागी है। जैसे कि अब्राहम का आशीष दो भागी था कि मैं तुम्हें और तुम्हारे जाति को पीढ़ी को आशीष करुँगा और दूसरा तुम्हारी पीढ़ी को लेकर पूरे देश को आशीष करुँगा। 

वैसे ही यीशु मसीह का जो सेवा है। वैसे ही इस दुनिया में दो भागी है; उनका पहला मकसद इस्राइलियों के पास जाकर अपने आप को प्रस्तुत करके परमेश्वर को प्रकट करना था। क्योंकि वह उसी कोम से थे, वह उसी यहूदी जाति से थे और यह यहूदी जाति जो है; मेरे दोस्तों, परमेश्वर के द्वारा विशेष तौर पर, विशेष कार्य के लिए चुनें गए लोग हैं और मैं यह केवल बाइबल से नहीं कहूँगा कुरान से भी मैं कह सकता हूँ। यह यहूदी लोग इस्राएली लोग अल्लाह के द्वारा यानी कि परमेश्वर के द्वारा चुने गए लोग हैं, कहाँ पर पढ़ता हूँ, सुराह 7,38:45-46 आयात में पढ़ता हूँ, और इस की पुष्टीकरण आप पढ सकते हो, सुराह अल-बकरा 2:47 आयात में लिखा है, दुर्भाग्य से यह परमेश्वर के चुने गए लोग, इस्राएली जो हैं अपने हृदय को कठिन किए और परमेश्वर को छोड़कर अपने-अपने मर्ज़ी के मार्ग को उन्होंने चुन लिया। इस कारण यीशु को जरूरी था कि इन चुनें हुए लोगों के पास जाकर उनके बीच में चमत्कार वाला, अद्भुत वाला सेवा करें; "ताकि वे लोग जान जाए कि यीशु मसीह ही वह मसीहा हैं यीशु ही वह मसीहा है।" जो यह यहूदी लोग सदियों से कई सालों से इंतजार कर रहें हैं और यीशु का सेवा शुरुआत यही से हुआ कि जाकर उनको बोले कि मेरे भाइयों, मेरे यहूदी दोस्तों, कि जिस मसीहा की तुम इतने सालों से इंतजार कर रहे थे। जो परमेश्वर ने तुम्हारे छुटकारे के लिए वादा किया था "वह मसीहा मैं हूँ" तो उनका मकसद पहला वहाँ पर था। 

लेकिन उसके बाद अगर आप लोग देखेंगे, 1तीमुथियुस 2:4-6 तक जब आप पढेंगे, "हमें यह भी जानना जरूरी है कि यीशु मसीह का जो त्याग था जो अर्पण था क्रूस पर उन्होंने अपना खून बहाकर जान दिया; वह केवल एक कोम के लिए नहीं था बल्कि पूरे मानवजाति के लिए था" 

यह आप इस वचन में पढ़ सकते हैं और यह बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यीशु ने अपना जान दिया, अपना खुन बहाया आपके लिए मुसलमान भाई आपके लिए और मेरे लिए खुन बहाया ताकि उनके इस त्याग से उनके इस बलिदान से कि हमकों अनन्त काल का जीवन परमेश्वर से पक्का है।

वचन स्पष्ट कहता है कि यीशु मसीह यहुदियों और गैर यहुदी लोगों के लिए इस दुनिया में आए। हम पढ़ते हैं कि यीशु ने अपने चेलों को कहा हम पढ़ सकते हैं।

प्रेरितों की किताब 1:8 में लिखा है, बल्कि "जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा; तुम्हें शक्ति प्राप्त होगी और यरूशलेम में समूचे यहुदी में और सामरिया में और धरती के छोरों तक, कोने-कोने तक तुम मेरा साक्षी बनों।" 

अगर यीशु मसीह केवल इस्राएल के कोम के लिए यहूदियों के लिए भेजे गए तो यह वचन में कहा कि पवित्र आत्मा तुम पर आएगा। तुम यरूशलेम से शुरुआत करते हुए; तुम यहूदी पुरे देश में सामरी में फिर पुरे दुनिया भर में गवाही रहोगे। क्या कह रहे हैं डॉक्टर ज़ाकिर नाइक? और आप पढ़ सकते हैं, 

मत्ती की पुस्तक 28:19 वचन, "जाओ और सभी देशों के लोगों को मेरा चेला बनाओ, यीशु ने यह नहीं कहा कि जाओ सभी यहूदियों को मेरा चेला बनाओ वह पहला भाग ही सेवा है।" जिसके लिए यहूदियों के बीच में सेवकों को यानी उनके चेलो को यीशु ने भेजा लेकिन उसके बाद यीशु ने कहा कि तुम जाओ सभी जाति को चेला बनाओ।" यीशु खुद कहते हैं यूहन्ना 8:12 वचन में "मैं दुनिया की ज्योति हूँ, (I am the light of the World)" और मेरे दोस्त अरबी में इसका मतलब है अनुर, अनुर किसको नाम दिया गया है। अल्लाह के 99 नाम में से एक हैं अनुर, अगर वह नाम में किसी नबी के लिए इस्तेमाल करूँ? आप मुझे मार डालोगे। लेकिन यीशु ने खुद कहा कि "मैं अनुर हूँ" यानी कि वह कह रहे हैं कि "मैं अल्लाह हूँ यीशु कहते हैं कि मैं परमेश्वर हूँ।"

सबसे दिलचस्प बात यूहन्ना की पुस्तक 3:16 वचन  "God so loved the world that he gave his only begotten son whoever believes in him shall not perish but have eternal life" यानी कि "परमेश्वर ने इस संसार से यहूदियों से नहीं, इस्राएल से नहीं, इस संसार से इतना प्रेम किया कि अपना एकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उन पर विश्वास करें वह नाश न हो परन्तु अनन्त काल का जीवन पाए।" 

यह केवल डॉक्टर ज़ाकिर नाइक वह कह रहे हैं कि यीशु मसीह केवल इस्राएल के लिए भेजे गए; एक कोम के लिए भेजे गए, डॉक्टर ज़ाकिर नाइक भाई साहब आप अपना कुरान खोलकर पढ़िये, कुरान भी कहता है, कि यीशु पुरे मानव जाति के लिए भेजा गया है। यह कहा पर मिलता है, सूरह अल-मुतमहिना जहाँ पर यीशु के बारे में और उसके माता के बारे में लिखा है, सूरह अल-मुतमहिना 19:21 (We wish to appoint him (Jesus) as sign unto man and mercy for many) अब कुछ लोग कहेंगे कि sign uinto man मतलब हाँ इस्राएल के लिए अरबी में क्या लिखा है? अरबी में लिखा है, "आयतुल लिंनसी", आयतुल लिंनसी का मतलब यह है, केवल इस्राएलियों की नहीं, पुरे मानव जाति के लिए मानवता के लिए। (अरबी में आप जाँच करके देख सकते हो)

हम देखते हैं, डॉक्टर ज़ाकिर नाइक इस वचन का क्या करने वाले हैं? इस आयत का क्या करने वाले हैं? और अगर यीशु मसीह यहाँ पर भी समस्या हैं; मेरे दोस्तों सबसे पहली बात आप अस्वीकार कर रहे थे कि यीशु मसीह एक कोम के लिए भेजे गए थे। सबूत प्रदान करने के बाद हाँ ठीक है फ्रांसिस! तुमने बाइबल से भी दे दिया और कुरान से भी दे दिया। 

यीशु मसीह सारे मानवजाति के लिए भेजें गए, आप स्वीकार करोगे भी तो समस्या है क्या वह समस्या हैं? वह समस्या यह है कि अगर यीशु मसीह इस सारे मानवजाति के लिए भेजे गए; तो दूसरा नबी की क्या जरूरत था। जब एक व्यक्ति पहले से सभी मानवजाति के लिए भेजा गया है। तो आप यह कहना चाहते हो कि यीशु मसीह उतने सर्वसामर्थी नहीं थे? उतने कार्यक्षम नहीं थे? उनके अन्दर उतनी खुबी नहीं थी वह हार गए जिसके वजह से मोहम्मद को आकर काम पूरा करना पड़ेगा। कुरान में तो यह नहीं सिखाया है कुरान में तो यह दिखाता है कि "यीशु बहुत उत्तम है" लेकिन जब हम ऐसे व्यक्ति बात सुनेगें डॉक्टर ज़ाकिर नाइक का वह खुद भी उलझन में है और दूसरों को भी उलझन में डालेंगे। तो अगर आप बाइबल खोलकर, कुरान खोलकर स्पष्ट प्रमाण हमें मिलता है। 

"यीशु मसीह एक मात्र कोम के लिए नहीं, बल्कि पुरे मानवजाति के लिए भेजे गए थे।"

Transcription by Nini Pandit

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मत्ती 10:34-36 का अर्थ क्या है?


 मत्ती 10:34-36 का अर्थ क्या है?

क्या मत्ती 10:34-36 में यीशु मसीह लोगों को भड़का रहे हैं? क्या यीशु मसीह तलवार और क़त्ल करने की शिक्षा दे रहें हैं?

जवाब जानिए!

कुछ लोग हैं जो यीशु मसीह से बहुत नफरत करते है और बाइबल को भी नफरत करते हैं और हमेशा यही कोशिश में रहते है कि किसी भी हालत में हम बाइबल को गलत साबित करें और यीशु मसीह को गलत साबित करें। यह वह लोग हैं, जो कभी खुद अपने हाथों से बाइबल को निकालकर, ईसाइयत क्या हैं?, यीशु कौन है? और बाइबल क्या कहती है? कभी पढ़ते नहीं है और खुद अनुसंधान नहीं करते। यह वह लोग हैं जो सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट में आने वाली बातों को फेसबुक में आने वाली फ़ोटो को और यूट्यूब में आने वाली वीडियों के ऊपर भरोसा कर के, ईसाई लोगों के साथ तर्क करने चले जाते है, वाद विवाद करने चले जाते है। और वह उनको गलत साबित करने की कोशिश करते हैं और यह भी बताने की कोशिश करते हैं कि बाइबल गलत है, ईसाइयत गलत है, और यीशु मसीह भी गलत है।

यह वह लोग हैं, जो समय नहीं निकालना चाहते है यह जानने के लिए कि उनका बयान सही है या गलत है।

वैसे ही एक उदाहरण को हमने पिछले विडीयों में देखा। जहाँ पर एक हिंदू धर्म गुरु और एक मुस्लिम प्रचारक ने लूका की किताब 19:27 वचन को गलत तौर पर प्रस्तुत किया। हमनें उस विडीयों में बताया कि उस वचन को सन्दर्भ में कैसे समझना चाहिए। लेकिन कुछ लोग हैं जो मन में ठान रखें हैं कि हम समझेंगे नहीं, हम चाहे कितने भी सबूतों को लाकर दिखायेगें। हम अपने आँखों को बंद कर लेगें; क्योंकि वो यह लोग हैं जो यीशु मसीह से नफरत करते हैं। यह वो लोग हैं जो सच्चाई से बैर करते हैं, रोशनी से डरते हैं।

वैसे ही एक उदाहरण को आज हम लोग देखेंगे जो कि हम पढ़ सकते हैं। मत्ती की किताब 10:34-36 यह वचन को लेकर आकर कुछ लोग यह कहने की कोशिश करते हैं कि यीशु मसीह शान्ति का राज कुमार नहीं, यीशु मसीह इस दुनिया में एक दूसरे के विरुद्ध लोगों को भड़काने के लिए आया?

तो चलिए हम वह वचन को पढ़ कर देखते हैं और जानेंगे उसका अर्थ क्या है?

"यह मत सोचो कि में धरती पर शान्ति लाने आया हूँ। शान्ति नहीं बल्कि मैं तलवार का आवाहन करने आया हूँ। मैं यह करने आया हूँ: पुत्र पिता के विरोध में, पुत्री माँ के विरोध में, बहू सास के विरोध में होगें, मनुष्य के शत्रु, उसके अपने घर के ही लोग होंगे।" (मत्ती 10:34-36)

तो यह वचन में यीशु कहते हैं कि तुम यह मत सोचो कि मैं शान्ति देने के लिए आया हूँ और शान्ति लेकर आया हूँ बल्कि मैं तलवार का आवाहन करने आया हूँ, एक दुसरे के विरोध लोगों को खड़ा करने के लिए आया हूँ।

तो यह वचन का मतलब क्या है? क्या यीशु शान्ति का राज कुमार हैं? जैसे हम पुराने नियम में और नये नियम में कुछ वचन पढ़ते हैं, जिसमें लिखा है, "(Jesus Christ is the Prince of Peace) अगर यीशु मसीह शान्ति के राज कुमार हैं, वह शान्ति के दाता हैं"  दुनिया में शान्ति लायें हैं। लोगों को प्रेम सिखाने आये हैं, तो क्यों उन्होंने यह वचन में ऐसे कहा कि मैं लोगों को एक दूसरे के विरुद्ध खड़े करने आया हूँ? और यह मत सोचों शान्ति लाया हूँ बल्कि तलवार का आवाहन करने आया हूँ।

आगे बड़ने से पहले मैं एक घटना आपको याद दिलाना चाहूँगा, गतसमनी का बगीचा यह गतसमनी के बगीचे में जब यीशु मसीह को कैद करने के लिए सैनिक आते हैं। यीशु मसीह के चेलों में से जो मुख्य चेला पतरस है तुरन्त अपने चाकू को निकाल कर एक सैनिक के कान को काट देता हैं। यीशु मसीह ने वहाँ पर क्या किया। पतरस को शाबाशी दी? वाह! पतरस तुम ने मेरी रखवाली में एक सैनिक को काट दिया। बड़ीया काम किया “नहीं” यीशु मसीह ने वहाँ पर पतरस को डाँटा और यह कहा कि जो तलवार उठायेगा उसका अन्त तलवार से होगा।

तो वहाँ पर यीशु मसीह तलवार का विरोध कर रहे हैं ,पतरस को डाँट रहे हैं और यहाँ पर कह रहे कि है मैं शान्ति लाने नहीं आया हूँ बल्कि मैं तलवार का आवाहन करने आया हूँ। तो इसका मतलब क्या है? 

दोस्तों हमें यह जानना जरूरी है जैसे मैं हमेशा अपने विडीयों में कहता हूँ कि जब यीशु मसीह प्रचार करते हैं वह प्रचार का तरीका क्या है? उसका सन्दर्भ होता हैं।

यीशु मसीह का प्रचार किस तरीके से होता है, यह जानने से पहले एक आम आदमी, एक साधारण व्यक्ति जब बात करता है उसके बातों में क्या होती हैं। आपने सुना होगा जब कोई अच्छा काम बाहादुरी का काम कर देता है। तो दुसरा व्यक्ति उसको कहता है यह तो बहुत बड़ा शेर निकला; तब जब यह व्यक्ति कहता है कि यह बहुत बड़ा शेर निकला, इसका मतलब यह नहीं कहता है कि वह व्यक्ति वाकई में शेर है या फिर हम जब कलीसिया में जाते है, हम जवान है, हमे बड़े लोग देखकर कहते है, तुम कलीसिया के खम्बे हो। तो इसका मतलब यह है क्या हम वाकई में कलीसिया के खम्बे है? कितने चौड़े बड़े खम्बे हम! नहीं। जब भी लोग अपने बातों में किसी को देखकर कहते हैं कि तुम शेर निकले तुम तो खम्बे हो। तो वह शब्द का वास्तविक अर्थ नहीं माना जाता है, वह शब्द से क्या दर्शाता है वह शब्द से वह क्या कहना चाहते हैं? यह हमें जानना जरूरी है, एक इंसान के बाहादुरी को दर्शाने के लिए उसे शेर कहा जाता हैं। एक जवान को कलीसिया में खम्बा कहा जाता है, क्योंकि वह भविष्य में उस कलीसिया का एक मुख्य व्यक्ति बननेवाला है।

वैसे ही जब यीशु मसीह प्रचार करते हैं उनके भी प्रचार में बहुत सारे ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं; जो कोई बातों को समझाने के लिए वह इस्तेमाल करते है। यहाँ पर यीशु मसीह ने कहा तलवार का आवाहन, तो हमें जानना जरूरी है कि वह शब्द तलवार का मतलब क्या है? वह किस बात को दर्शाता है? जब तलवार की बात करते है तलवार किस लिए इस्तेमाल किया जाता है, काटने के लिए, अलग करने के लिए, आगे का वचन क्या लिखा है? आगे का वचन कहता है, पुत्र पिता के विरोध में, पुत्री माँ के विरोध में, बहू सास के विरोध में होगें, मनुष्य के शत्रु उसके घर के ही लोग होंगे।

तो दोस्तों! मैं आपको यह चीज बताना चाहूँगा, यदि कोई व्यक्ति कोई मुस्लिम धर्म से है या हिन्दू धर्म से है या फिर कोई भी विश्वास से है। वह अचानक यीशु को स्वीकार करता है, यीशु मसीह के प्रेम को देखकर, उनके सूली के दशा को देखकर, यीशु के बलिदान को देखकर, वह बहुत ही मोहीत होकर, बहुत ही मन में महसूस कर कर कि भैया! यीशु मसीह इतना प्यार करता है मुझ से ऐसे परमेश्वर, ऐसे मुक्ति दाता को मैं कैसे भुला सकता हूँ? कैसे छोड़ सकता हूँ? यह बोल कर जब वह व्यक्ति जब यीशु के पास आता है। तो क्या उसके घरवाले उसको पार्टी देगें? उसकी तारीफ करेंगे? यह बोलेगें वहा बेटा कि मैंने तुमको 20-25 साल से इतना खिलाया पीलाया मैंने तुमको पढ़ाया इतने साल से तुम नमाज़ पढ़ते थे, इतने साल से तुम ग्रन्थ गीता पढ़ते थे तुम आज ईसाई बन गए। वाह! ऐसे उनकी तारीफ करेंगे “नहीं” वह परिवार के लोग यह लड़के के विरोध उठेंगे यह है। यह वचन का मतलब और वह घरवालों को लगेगा कि यह लड़का इतने साल से हमारे साथ था आज खुद निर्णय लेकर हमारे विरोध खड़ा उठा है। तो यह वचन जो कहता है, कि पुत्र पिता के विरोध में यानी कि मान लो अगर पिता ने यीशु मसीह को स्वीकार किया या फिर पुत्र ने यीशु मसीह को स्वीकार कर लिया तो ऐसा हो सकता है कि पिता लगेगा कि मेरा बेटा मेरे विरोध में हो गया या फिर पुत्र को लगेगा कि मेरा पिता मेरे विरोध कर रहा है क्योंकि यीशु मसीह को स्वीकार किया।

दोस्तों हम ऐसे बहुत सारे उदाहरण को देख सकते है, जहाँ पर यीशु मसीह को स्वीकार करने के कारण परिवार वाले उस व्यक्ति का क़त्ल तक कर चुके हैं। हम ऐसे भी उदाहरण देखते हैं जो घर से भी लोग निकाल दिये जाते है।

तो यह वचन जो तलवार कहते हैं यीशु मसीह वह वास्तविक तलवार को, वास्तविक चाकू को नहीं दर्शाता है। बल्कि यह दर्शाता है कि जब हम यीशु को स्वीकार करते हैं, दुनिया हम से नफरत करेगी। तो क्या इसका मतलब यह है कि यीशु मसीह ने दुनिया में शान्ति नहीं लाया। यीशु यह दुनिया में शान्ति लायें वह कहते हैं कि यदि कोई तुम से नफरत करता है, तुम उसके लिए प्रार्थना करों, यदि कोई तुम को मारने आता है एक गाल पर तो उसको दुसरा गाल दो, यदि कोई तुमको जबरदस्ती एक मील लेके जाता हैं  तो दो मील उसके साथ जाओ। तो यीशु मसीह शान्ति से जरूर सिखाते हैं। लेकिन जब भी बाइबल में यीशु कहते हैं कि मैं शान्ति लाने आया हूँ। हमें यह जानना जरूरी है कि यीशु कौन से शान्ति के बारे में बात कर रहे है।

उत्पत्ति की किताब 1और 2 अध्याय में पाप के कारण मनुष्य जो है, परमेश्वर के शान्ति को खो देता है और रोमियों की किताब 5:1 वचन में हम यह पढ़ते हैं कि यीशु मसीह का बलिदान, यीशु मसीह के कारण उस खोए हुए परमेश्वर के रिश्ते में हम जुड़ जाते हैं और मनुष्य और परमेश्वर के बीच में एक शान्ति हो जाता हैं। तो मुख्य शान्ति की जब बात की जाती हैं तो वह परमेश्वर और इंसान के बीच में है और जब इंसान परमेश्वर के साथ शान्ति बनाता है। तो क्या होगा दोस्तों, रोशनी की लड़ाई अंधेरे से होगी, बुराई की लड़ाई अच्छाई से होगी, मानलो एक व्यक्ति बहुत बुरा था वह दोस्तों के साथ मिलकर गालियां देता था, दारू पीता था, गलत हिसाब लिखता था। अचानक से वह यीशु मसीह को स्वीकार करके बदल जायेगा; उसको वह सारी चीजें छोड़नी पड़ेंगे जो उसे पाप में लेकर जाता हैं। इसके वजह से उसके दोस्त उससे बैर करेंगे उसके विरोध उठेंगे और यह भी सोचने लगेंगे कि गलत हिसाब लिखना छोड़ दिया है, इसके वजह से हम फंसेंगे यह तो हमारे विरोध खड़ा हो गया है।

तो यह वचन उस बात को दर्शाता है कि जब हम यीशु मसीह के पास आ जायेंगे। लोग हमसे नफरत करेंगे और उनको लगेगा कि हम उनसे नफरत कर रहे हैं। लेकिन सच यह है दोस्तों कि हम यीशु मसीह के साथ शान्ति में आ रहे है तो हम में यह दुनिया में फर्क देखा  और उस फर्क को दुनिया स्वीकार नहीं कर सकती है। जैसे हम युहन्ना की किताब 1अध्याय में पढ़ते हैं कि यीशु मसीह को भी उनके लोगों ने स्वीकार नहीं किया। तो यह यीशु मसीह के आगमन से उनके और उनके परिवार के बीच में ही जो है, तलवार आ गया है।

आज एक उदाहरण देता हूँ, जब मैं 2007-2008 में यीशु मसीह को पुरी तरह मैंने स्वीकार किया, एक बार शाम को प्रार्थना करके घर पर आया। तो मेरे घरवालों ने मेरा जो कपड़ा हैं वह सब बांधकर रखा था और जैसे ही मैं दरवाजे पर आया वह कपड़े का बन्डल मेरे मुंह पर फेंक दिया कि तुम घर से चले जाओ। तो उस समय में मुझे लगा कि मेरे घरवाले मेरे विरोध खड़े हो गए और मेरे घरवालों को लगा कि इतने साल से हमनें इसको पाला लेकिन अब ये पुरी तरह यीशु मसीह को स्वीकार के उन्हीं के पीछें जा रहे हैं, प्रार्थना में लगा हुआ है, उनको लग रहा था कि मैं उनके विरोध में हो गया।

तो यीशु मसीह यह वचन से यह दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं दोस्तों वह यह नहीं कह रहे हैं कि जाओ तुम घात करों, क़त्ल करों, एक दूसरे के साथ लड़ाई करों। लेकिन यह बात याद रखिए अगर लोग आपसे नफरत करते हैं, यीशु मसीह यूहन्ना की किताब 15:18 वचन में कहते हैं, "तुम बिल्कुल निश्चित रहो और यह जान लों कि जब लोग तुमसे नफरत करते हैं, यह जान लों कि तुम से नफरत करने से पहले लोगों ने यीशु मसीह से नफरत किया है।" तो शान्ति की बात होती है परमेश्वर और मनुष्य के बीच में। तो यह वचन का सन्दर्भ यह है इस वचन का मतलब यह है, जो सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट के सहारे पर है जो सिर्फ और सिर्फ यीशु मसीह को बदनाम करने में तुले हुए हैं, वह यह सत्य को सुनेंगे तो भी वह समझने की कोशिश नहीं करेंगे टिप्पणी में फिर से गालियां लिखेंगे।

हम प्रभु यीशु मसीह के प्रेम के लिए इस दुनिया में जी रहे हैं, लेकिन उसी समय में हम इस दुनिया के साथ शान्ति नहीं बना सकते हैं, दुनिया के पाप के साथ शान्ति नहीं बना सकते हैं। जब दुनिया के साथ हम शान्ति नहीं बनायेंगे। तो उनको लगेगा कि हम उनके विरोध हो गए हैं, हमारे विरोध वह हो जायेंगे।

यह हैं, मत्ती 10:34-36 का अर्थ। तो खुशखबरी है! कि जब यीशु कहते हैं मैं तलवार लाया हूँ, वह तलवार किसके बीच में है? वह तलवार अंधेरा और रोशनी के बीच में हैं, वह तलवार बुराई और अच्छाई के बीच में है, और यह तलवार अच्छा है आप शब्द को उसके सन्दर्भ में समझिये।

प्रभु आपको आशीष करें। 

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Transcription by Nini Pandit

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मरकुस 16:17-18 का अर्थ और ज़ाकिर नाइक को जवाब

 मरकुस 16:17-18 का अर्थ और ज़ाकिर नाइक को जवाब

जय मसीह की भाईयों और बहनों आप सभी को त्रिज्ञा परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह के नाम से एक बार फिर से मैं स्वागत करता हूँ! आज इस विडीयों के द्वारा हम एक  और सवाल को देखेंगे; जो हर बार जो बाइबल को नहीं मानते हैं और यीशु खुदा है, यह बात को नहीं मानते है वह हमारे सामने लेकर आते हैं। वह सवाल जो है बाइबल से निकालते हैं वह हम पढ़ सकते है मरकुस के किताब 16:17-18, "जो मुझ में विश्वास करेंगे; उनमें यह चिह्न होंगे। वह मेरे नाम से दुष्टात्माओं को बाहर निकाल सकेंगे। वे नई-नई भाषाएँ बोलेंगे, वे अपने हाथों से साँप पकड लेगें और यदि वे विष भी पी जाए तो उनको हानि नहीं होगी, वे रोगियों पर अपने हाथ रखेंगे और वे चंगे हो जाएंगे।"

दोस्तों, यह वचन को जो है कई बार हमारे मुसलमान दोस्त और जो यीशु के दैविक्ता के ऊपर भरोसा नहीं करते है। वह एक आजमाइश के तौर पर, एक चुनौती के तौर पर हमारे सामने पेश करते हैं। अब यह चुनौती देखिए डॉ.ज़ाकिर नाइक ने भी उनके एक डिबेट में, उनके एक मुनाजरे में उन्होंने सामने लेके आया था और मुश्किल की बात यह है, कि बहुत सारे मसीही भाई जो हैं; ऐसे सवाल का जवाब कैसे देना है? वह नहीं जानने के कारण उनको लगता है कि बाइबल गलत हैं। तो आप देखिए कि डॉ. ज़ाकिर नाइक ने किस प्रकार यह  सवाल को पुछा था, उस मुनाजरे में....।

डॉ.ज़ाकिर नाइक : बाइबल में एक (Scientific) अजमाइशे है, कैसे पता चलेगा? सच्चे मानने वाले का यह जिक्र है, मरकुस की इंजील में 16:17-18 वह कहता है, कि सच्चे मानने वालों की कुछ निशानियाँ होंगी उनमें से चन्द निशानियाँ यह होंगी। यदि मेरे नाम से वह शैतान को मार भगाएंगे, वह लोग गैर मुल्क की जुवाने बोलेंगी, नई जुबानी वह अजहे काबू करेगें। अगर वह मरने वाला ज़हर भी पियेंगे। तो वह मरेंगे नहीं, अगर वह अपना हाथ बिमारों पर रखेंगे तो वह ठीक हो जाएंगे यह एक वैज्ञानिक आजमाइश है, वैज्ञानिक इस तरह में इसे किसी सच्चे और मोमिन ईसाई के परख के लिए तदिप अजमाइश कहा जाता है। मेरी जिंदगी के पिछले दस सालों में हजारों ईसाईयों के साथ मैं उठता बैठता हूँ। मेरे साथ ही तालुकात है वह मुझे अभी तक याद है। एक भी ऐसा ईसाई नहीं मिला, जो कि बाइबल कि इस तदिप करने वाली इस अजमाइश पर पुरा उतरता हो और मुझे अभी तक ऐसा एक भी इसाई नहीं मिला जिसने ज़हर पीया हो, एक भी इसाई ऐसा नहीं वह ज़हर पीये और वह मरे नहीं....।

दोस्तों! केवल डा.ज़ाकिर नाइक ही नहीं, आज बहुत सारे हमारे मुसलमान दोस्त हैं वह यही चेलेंज को  आजमाइश को लेकर हमारे पास आते हैं और कहते हैं कि यदि तुम सच्चे क्रिश्चियन हो तो तुम जेहर पीकर दिखाओ, तुम यह सारे कामों को करके दिखाओ क्योंकि यीशु ने तुमको बोला है न कि तुम यह सारे चीजें कर सकते हो।

दोस्तों दुख की बात यह कि आज बहुत सारे ऐसे अशिक्षित यानी कि बाइबल को नहीं समझने वाले  क्रिश्चियन है। यह चीजों को जो हैं वाकई में आजमा के देखते हैं और उनकी मौत भी हो जाती है। तो एक मुसलमान भाई ने जो हैं हमारे फेसबुक पेज पर एक लिंक पोस्ट किया था उसमें कोई पास्टर ने जो है अपने सभा के लोगों को जेहर पिलाया, विष पिलाया और वे लोग मर गए।

जी हाँ, दोस्तों! इतिहास में ऐसे बहुत सारे घटनाएं हुए हैं। जहाँ पर यह वचन को जो है, सचमुच बहुत सारे क्रिश्चयनस् लेकर आजमाने की कोशिश करने लगे। जैसे कि साँप को उठाना, एक पास्टर के नजरिए से शायद उन्होंने साँप को रखकर आराधना चलाया, साँप को दिखाकर बताया कि देखो मैं सच्चा विश्वासी हूँ, लेकिन एक दिन उस साँप ने उनको काट लिया और उनकी मौत हो गई।

तो दोस्तों यह वचन हमको कहना क्या चाहती हैं? बाइबल को उसके सुन्दरता में और उसके सन्दर्भ में नहीं पढ़ने के कारण हम ऐसे गलत आजमाइशों को लाकर उलझन पैदा कर सकते हैं; और लोगों को भी भरमा सकते हैं और यही तरीका डॉक्टर ज़ाकिर नाइक और बहुत सारे दावा प्रचारक जो है, वह इस्तेमाल कर रहे हैं।

यह जब मैं लगभग 17-18 साल का था तो लोकल ट्रेन पर मैं सुसामाचार बाँट रहा था, ट्रेक्स बाँट रहा था तो अचानक से एक व्यक्ति ने भीड़ में सबके सामने मुझे बुलाया कि यहाँ आओ। तो मैं भी उनके पास गया सोच कर कि कुछ पुछेंगे यीशु मसीह के बारे में तो उन्होंने तुरन्त पुछा कि तुम्हारे पास बाइबल है क्या? तो मैं ने बोला हाँ मेरे पास बाइबल है तो बोला कि निकालो मरकुस 16:17-18 और उन्होंने सबके, सब लोग खड़े थे वहाँ पर भीड़ जमी हुई थी। ट्रेन के अन्दर चलती हुई ट्रेन के अन्दर उन्होंने बोला कि पढ़ो और मैंने वह वचन पढ़ा। पढ़ने के बाद उन्होंने पुछा कि क्या तुम इस बात पर भरोसा करते हो? अब उस समय में मुझे नहीं पता था कि यह वचन का अर्थ क्या है?, इस वचन को किस तरीक़े से समझना चाहिए। तो एक 17-18 साल का लड़का मैं क्या करता मैं प्रभु के जोश में कि मैंने बोला कि हाँ इस बात पर विश्वास करता हूँ। तो उसने सबके सामने मुझे चुनौती दिया, कि तुम सच्चाई से इस बात को मानते हो। तुम इसे पीकर दिखाओ, अब उस समय मुझे पता नहीं चला मुझे क्या करना चाहिए? यदि आज वह भाई साहब मिलते तो शायद से मैं उनको अच्छे से बाइबल के वचनों के आधार पर समझा सकता था कि इसका मतलब क्या है? खैर!, ऐसा चुनौती देने के बाद मेरे पास तो एक ही मौका बचा था, मैंने बोला ठीक है! मैं पिऊँगा लेकिन ऐसा हुआ कि वह भाई साहब बहुत विवस कर रहे हैं थे, कि तुम नहीं पी सकते हो। मैं विवश कर रहा हूँ कि मैं पी सकता हूँ। तो एक स्टेशन आया जैसे ही उनके साथ में उतरने की कोशिश किया, चलो अंकल मुझे जेहर पीलाओं मैं पी कर दिखाऊँगा यीशु के नाम से और सभी लोग देख रहें थे ट्रेन में और मैं बोल रहा था यीशु के नाम से मैं पिऊँगा। तो वह मेरे जोश के देख कर थोड़ा सा सोच में पड़ गए कि यह लड़का पागल तो नहीं हो गया; तो तुरन्त उसने मुझे ट्रेन के अन्दर धक्का देकर, नीचें उतर कर चलें गए।

तो दोस्तों मेरा कहने का मतलब यह है कि आज आप कहीं पर भी जाएंगे यीशु मसीह के बारे में बोलने के लिए, कुछ लोगों को प्रशिक्षण दी होती हैं कि भाई यह वचन को निकाल कर क्रिश्चयन को वार करो और उनको सवाल पुछो और उनको जाँचों कि उनको बाइबल आता है या नहीं आता है, अगर आता भी है तो उनका बाइबल गलत है।

तो दोस्तों मैं सीधा जवाब में आना चाहूँगा कि मरकुस 16:17-18 में हमें क्या सीख मिलता है? वह वाकई में वचन कहती क्या है? यह जवाब को है जो मैं दो भाग में रखना चाहूँगा। पहिला: एक मैं आपको सवाल का सीधा जवाब पेश करुँगा बाइबल से और उसका अर्थ समझाऊँगा। दुसरा: जो तरीक़े से मुसलमान दोस्त हमारे पास यह सवाल को लेकर आये हैं। मैं भी वही तरीका इस्तेमाल करुँगा, यह विडीयों में एक चुनौती उनको भी दूँगा। एक आजमाइश उनके लिए भी है और मेरे दूसरे वाले विडीयों में इसके बाद जो अपलोड करुँगा वह वाले विडीयों में उन्हीं के किताब से और ऐसे ही बहुत सारे चुनौती मैं उनके सामने रखूँगा। देखेंगे! कि क्या वह उस चुनौती को स्वीकार करते हैं या फिर वह उनके किताब को वह गलत मानते हैं। तो यह रहा मेरा जवाब…

दोस्तों, जब भी हम वचन को पढ़ते हैं हमें जानने की जरुरत है कि जब यीशु मसीह अपने चेलो को देख कर कह रहे थे कि तुम जाकर सुसामाचार सुनाओ। तो वह अपने चेलों को यह आज्ञा दे रहे थे कि तुम ऐसे-ऐसे जगहों में जाओगे; तुम्हें पता नहीं होगा कि क्या खाने के लिए मिलेगा, क्या पहनने के लिए मिलेगा, वहाँ पर परिस्थिति कैसी होगी? तो यीशु मसीह जो हैं वहाँ पर उनको एक वादा कर रहे हैं, पवित्र आत्मा का एक तौफा दे रहे हैं, गिफ्ट दे रहे हैं। यीशु मसीह यह नहीं कह रहे हैं कि तुम जाओ, जाकर जहाँ-जहाँ साँप मिलेगा उसे उठा लो जहाँ-जहाँ जेहर मिलेगा उसे पीलो और जाकर जादु का खेल या फिर जादु वाला कोई मनोरंजन कार्यक्रम करों। "यीशु ने यह नहीं कहा, यीशु उनको  वादा कर रहे हैं कि जब तुम सुसामाचार सुनाने जाओगे इस दुनिया में सच्चे विश्वासी के रुप में तो अनजाने में तुम्हारे विरोध कुछ गलत काम आ जायेगी; तो उस गलत चीजों में परमेश्वर का हाथ तुम्हारे साथ रहेगा और वह तुम्हें बचायेगा।"

तो दोस्तों यह एक आजमाइश नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर का वादा है उनके सच्चे लोगों के लिए। यह जो मरकुस 16:17-18 वा वचन में हम देखते है ठीक उसी प्रकार का एक वादा हम पुराने नियम में भी देख सकते है। भजन संहिता 91:13 में देख सकते है, जहाँ पर लिखा है कि तुम बिच्छुओं को रोंदोगे, तुम ताकतवर शेरों के ऊपर चलोगे यह वचन लिखा है।

तो दोस्तों पुराने नियम में जरा पढ़कर देखिए, क्या कोई भी नबी, कोई भी भविष्यद्वक्ता यह वचन को लेकर भजन संहिता 91:13 वा वचन को लेकर जंगलों में जाकर साँपो को पकड़ना, बिच्छुओं को पकड़ना बिच्छुओं को पकड़कर निचोड़ना और शेरो के साथ खेलना। ऐसा किया उन्होंने? क्या उन्होंने परमेश्वर के वादा को निकाल कर परमेश्वर को ही उन्होंने आजमाइश मेंडाला? परमेश्वर को ही उन्होंने कसौटी में डाला? 'नहीं!' लेकिन शैतान जब यीशु मसीह से बात करने के लिए आया था जब यीशु मसीह चालीस दिन के उपवास में, उस जंगल में थे शैतान उनके पास आया और वही शैतान वही तकनीक यीशु मसीह के पास इस्तेमाल करके कहा, कि यदि तुम खुदा हो तो इस पत्थर को रोटी बना कर खालों, क्या करो? तुम ऊपर से कुद जाओ क्योंकि वचन में तो लिखा है। लेकिन यीशु मसीह ने क्या जवाब दिया? यीशु मसीह ने कड़ाड़ा जवाब दिया उस शैतान को लुका के किताब 4:12 वा वचन में हम पढ़ते हैं कि तुम्हारे खुदा की परीक्षा न लो।

हाँ दोस्तों, यह हम पुराने नियम में भी पड़ते हैं, नये नियम में भी पड़ते हैं खुदा की परीक्षा नहीं लेना चाहिए हमें खुदा की आजमाइश नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि खुदा जब वादा करता है वह सही समय में पुरा करता है। तो क्या यह वादा पूरा हुआ? जी हाँ! हम दानिय्येल  कि जिंदगी में देख सकते है। दानिय्येल की किताब में 6 अध्याय में देखते हैं कि जब दानिय्येल को शेरों के गुफा में डाल दिया गया तो कोई भी शेर ने उनको हानि नहीं पहूँचाया। तो क्या दानिय्येल उसके पहले भजन संहिता 91:13 के अनुसार जंगलों में जाकर जबरदस्ती शेरों को ढूँढ ढूँढ कर उनके साथ लड़ाई करने गए कि देखों हाँ खुदा ने कह दिया है तो वह मुझे कुछ होने नहीं देगा। “नहीं” ऐसे अचानक से आने वाले परिस्थिति में, माहौल में प्रभु यीशु जो हैं अपने बच्चों को सम्भालते हैं, बचाते हैं वह है पवित्र आत्मा का वादा और नये नियम में भी क्या मरकुस 16:17-18 वा वचन का पुर्ती हम देखते हैं। जी बिल्कुल देखते हैं! आप देखिए प्रेरितो की किताब 2 अध्याय पढ़ कर देखिए, "लोग भिन्न-भिन्न भाषा में बोलते हैं आज भी कितने सच्ची मसीह लोग हैं वह भिन्न-भिन्न भाषा, अन्य भाषा में बोलते हैं। तो यह परिपूर्णता है उस वादा का।"

दुसरा आप प्रेरितों की किताब 5 अध्याय पढ़ के देखिये, "वहाँ पर भारी मात्रा में यीशु के चेलो ने जो है चमत्कार के काम किए और बड़े बड़े काम किए।" जैसे मरकुस 16:17-18 वचन में लिखा है। "मरे हुओं को जिलाना और जो लंगडे है, लूले है, लाचार हैं, बिमार हैं उनको चंगा करना और उससे भी बढ़ कर 19 अध्याय में आप देख सकते हो; कि पौलुस कितना करते हैं, पौलुस का गमछा गिरने पर कपडा गिरने पर लोग चंगे हो रहे हैं। तो "यह परिपुर्णता है" दोस्तों और उसी प्रकार अगर आप प्रेरितों के काम में 28 वा अध्याय में पढ़ेंगे, जब एक बार पौलुस जो है लकड़ी को जमा कर रहे थे तो अचानक से लकड़े के जलने के गर्मी से जो है वह साँप बाहर निकल आया और उनके हाथ में लिपट लिया। तो लोगों ने कहा कि यह खुनी है तो इसके वजह से इसके हाथ में वह साँप लिपट लिया है, करके लेकिन वहाँ पर क्या हुआ? पौलुस ने उसको झटक दिया। तो इसका मतलब यह नहीं कि हाँ, मरकुस 16:17-18 में लिख दिया करके कि 'मैं जंगल में जाऊँगा और जहाँ-जहाँ साँप मिले मैं अपने हाथ में लिपट लूँगा और दुसरो को मैं जादु का खेल दिखाऊँगा, देखों मुझे कुछ हुआ नहीं मैं सच्चा  विश्वासी हूँ।

तो दोस्तों यह सही समय पर जो है, यह वादा जो है पुरा होता है। यही चीज हम देखते हैं; "आजमाइश नहीं है" तो जितने भी लोग यह सवाल को लेकर आते हैं उनको हम एक चीज कहेंगे, "खुदा को आजमाना नहीं।" लेकिन अगर सच्चे विश्वासी के तौर पर कोई ऐसे स्थिति में परिस्थिति में अनजाने में कोई जहरीला वस्तु भी खा लेंगे या फिर साँप का सामना करना पडे़। प्रभु यीशु मसीह अपने पवित्र आत्मा के वादा के अनुसार जरूर सम्भालेंगे। तो दोस्तों "यह वादा है", यह आजमाइश नहीं। लेकिन जब हम आजमाइश के बारे में बात करते हैं, तो हमें हदीस के तरफ चलना चाहिए, क्योंकि हदीस में जब मैं पढ़ रहा था तो एक हदीस है शरीफ अल बुखारी का 7 किताब 65 हदिस न. 356 बुखारी  7:65/356 

दोस्तों यह हदिस में लिखा है अगर कोई व्यक्ति सुबह सात अजवे यानी कि साथ खजुर बीज को खाता है। तो वह दिन उसके ऊपर कोई भी चीज हावी नहीं हो सकती हैं, ज़हर भी नहीं।

दोस्तों, (मरकुस 16:17-18) तो परमेश्वर का वादा है, उसका जवाब मैंने आपको समझा दिया कि परमेश्वर की आजमाइश नहीं करनी है। खुदा को परीक्षा को में नहीं डालना है; लेकिन यहाँ पर मोहम्मद साहब ने एक दवाई बताया है। दवाई को क्या करना चाहिए? स्वाद करना चाहिए तो अगर हमसे कोई आकर चुनौती करता है कि तुम ज़हर पीकर दिखाओं। सच्चे क्रिश्चयन हो या नहीं, तो मैं आप को खुली चुनौती देना चाहूँगा। आप सुबह के समय में सात खजुर या सात अजवे खा लिजिए और उसके बाद ज़हर को पी लिजिए। अगर आप नहीं मरेंगे तो मैं मान जाऊँगा कि आप सच्चे मुसलमान हैं।

दोस्तों, बस इतना ही नहीं हदीस में और भी बहुत सारे दवाइयाँ हैं जो मोहम्मद साहब ने बताई हैं, जिसे हमें जाँच करना चाहिए। अगर वह सच नहीं है वह झूठ है तो आप को सोच लेना चाहिए; कि क्या वाकई में यह खुदा से आने वाली चीजें हैं या फिर मन में आने वाली बातें हैं। तो मेरे अगले विडीयों में जो है मैं आपको ऐसी हदीस में से कुछ ऐसे दवाइयों को दिखाना चाहूँगा मैं चुनौती देना चाहूँगा उन लोगों को जो हमें चुनौती करते हैं, कि विष पीओ; उन लोगों को चुनौती करना चाहूँगा कि तुम अगर सच्चे मुसलमान हो तो यह करके दिखाओं।

आखिर में एक छोटा सा उदाहरण देकर, मैं आप को  बताना चाहूँगा कि यह वचन का सुन्दरता क्या है?

दोस्तों, अगर आप एक लेपटॉप खरीदते हैं या फिर कोई एक इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट खरीदते हैं तो उसमें समझिये आपको दो साल की ऑरान्टी आती हैं। वहाँ पर कम्पनी वाले कहते हैं, कि अगर उसमें कुछ बिगड़ गया तो हम वह दो साल की या एक साल की ऑरान्टी में कवर देगें। लेकिन ऑरान्टी यह जो है वादा हैं वह कम्पनी का लेकिन ऑरान्टी को पाकर अगर आप उस मोबाइल को खोल कर उसके पार्टस वगैरा निकाल कर उसमें सॉफ्टवेयर की कोडिंग वगैरा कर कर अगर आप उसको बिगाड़ते है और फिर उस कम्पनी वाले के पास लेकर जायेंगे है तो वह क्या कहेगा? वह बोलेगा कि मैंने आपको ऑरान्टी दिया था; वादा किया था अगर अपने आप से वह खराब होगा, तो मैं सम्भालूँगा। तो अगर आपको कोई कहता है कि यदि तुम गिर जाओगे तुम्हारे गिरने के समय में आकर तुमको पकडूँगा। लेकिन मैं जानबुझ कर बिगाड़कर या फिर जान बुझकर नीचें गिराकर तौड़कर मैं आशा करुँगा कि सामनेवाला उसका जिम्मेदारी लें।

तो इसे हम क्या कहेंगे? दोस्तों, मैं कहूँगा कि आप बाइबल को अपने सुन्दरता और अपने सन्दर्भ में समझिए। "मरकुस 16:17-18 वा वचन मुझ जैसे और सच्चे क्रिश्चयन भाईयों के लिए एक वादा है; हर स्थिति में पवित्र आत्मा का हाथ हमारे साथ रहेगा। चाहें कुछ भी हो जाए, आन्धी आए, तुफान आए या फिर ऐसे विष भरें कार्य हमारे जीवन में आए, पवित्र आत्मा हमारा साथ देगा। कभी नहीं छोड़ेगा।"

आप भी प्रभु यीशु पर विश्वास कीजिए और अगले विडीयों में मैं कुछ चुनौती उठाऊँगा। हदीस में से, देखिए और अपने आपको सिखाइये और दूसरों को भी सिखाइये।

प्रभु आपको आशीष करें!

Transcription by Nini Pandit

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इस्लाम की 6 मुख्य बातें


6 मुख्य बातें जो हर ईसाई को जानना जरूरी हैं इस्लाम के बारे में और मुस्लिमस के बारे में।


1.मुसलमान क्या मानते हैं
सब से पहला : इस्लाम का अर्थ है सब्मिशन, इस्लाम की मानी है अधीन रहना और इस्लाम के शिक्षा के अनुसार एक खुदा को वह मानते हैं, नबियों को मानते है, वह किताबों को मानते है, तोराह, जबूर, इंजील और कुरान, वह फरिश्तों को मानते है, अल्लाह के आज्ञाओं को मानते है और न्याय के दिन को मानते हैं।

2.मुसलमानों की पहचान
दूसरी बात : मुस्लिम्स और अरब दोनों अलग-अलग है अरब सारे मुसलमान नहीं है क्योंकि कुछ अरब है जो मुसलमान नहीं है और इस्लाम में दो बड़े झुण्ड है शिया और सुन्नी।

3.इस्लाम की मुख्य शिक्षा
तीसरी बात : इस्लाम के पाँच अरकान है - पहला : शाहदा यानी उनके विश्वास का अंगीकार, दूसरा : सलात, उनका प्रार्थना, नमाज जो दिन में पाँच बार पढ़ते हैं, तीसरा : जकात यानी कि दान पुण्य, दान करना। चौथा : सौम यानी कि रोजा रखना, उपवास रखना और पाँचवा : हज्ज यानी कि पुण्य यात्रा में जाना मेका या मेदिना।

4.इस्लाम का ईसा कौन है?
चौथी बात : इस्लाम सिखाता है, कि यीशु एक अज़ीम पैगम्बर थे वह खुदा नहीं थे केवल एक साधारण नबी थे और इस्लाम सिखाता है कि यीशु मसीह को सूली पर नहीं चढ़ाया गया, यीशु मसीह सूली पर नहीं मरें।

5.मुसलमानों के प्रति गलत फहमी
पाँचवी बात : मुस्लिम्स आतंकवादी नहीं है क्योंकि कुछ लोगों का कहना है और मानना है मुस्लिम्स सारे आतंकवादी है जो बिल्कुल गलत हैं, मुस्लिस्म अच्छे दोस्त है और अच्छे दोस्त बन सकते हैं।

6.आपको और आपके कलीसिया को क्या जानना है?
छठा और मुख्य बात : जो आपके कलीसिया को और हमें जानना जरूरी है कि मुसलमानों को भी उद्धार की जरूरत है, मुसलमानों को भी यीशु मसीह की जरूरत है मत्ती 28:19 वचन में यीशु कहते हैं कि तुम सभी जाति के लोगों को शुभ सन्देश दो और उन्हें चेला बनाओ। तो आपको और अपने मुसलमान दोस्त को भी यीशु मसीह का शुभ सन्देश देना है; यदि कुछ लोग हमारा विरोध करें? हमें शत्रु माने तो भी हम यीशु मसीह के उस अनन्त काल के प्रेम को उन्हें प्रचार करेंगे।

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Translation Correction: Updated

सुसमाचार - प्रतिज्ञा - आश्वासन

उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता है, यदि उस सुसमाचार को जो मैं ने तुम्हें सुनाया था स्मरण रखते हो; नहीं तो तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ। 1 कुरिन्थियों 15:2

मनुष्यों के उद्धार के निमित, परमेश्वर की और से दिया गया प्रकाशन "सुसमाचार" है। सुसमाचार वह एकमात्र सन्देश है जिसके द्वारा मनुष्य उद्धार को पा सकता है। इसीलिए सुसमाचार को समझना, थामे रहना और उसके अनुकूल अपने जीवन को जीना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए, उसे समझना चाहिए और उसकी समझ में बढ़ना भी चाहिए। अगर सुसमाचार को लेके हम गलती करते हैं, उसे गलत तरीके से समझते हैं और दूसरों को समझाते हैं, उसका गलत अर्थ निकलते हैं तो फिर हम उद्धार के समझ में एक संपूर्ण गलत दिशा में चले जाते हैं। पवित्र शास्त्र हमें उद्धार के भूत काल, वर्तमान काल और भविष्य काल के बारे में सिखाता है और 1 कुरिन्थियों में यह खंड उद्धार के वर्तमान काल के पहलु को दर्शाता है। 

भूत काल - जब परमेश्वर का अनुग्रह हमारे ह्रदय को परिवर्तन करता है, हमें पाप के दोष और दंड से बचाता है, हमें धर्मी ठहराता है। 

वर्तमान काल - जब हम पवित्रता में आगे बढ़ते रहते हैं, यीशु के चरित्र में बढ़ते रहते हैं, परीक्षा - क्लेश - ताड़ना का अनुभव करते हुए परिपक्वता में बढ़ते रहते हैं।  

भविष्य काल - यह हमारा महिमा करण है, जहाँ हम पाप की उपस्थिति से, प्रभाव से और समर्थ से आज़ाद हो जाते हैं। 

उद्धार के बारे में इन सब बातों को पढ़ने के बाद सवाल यह उठता है की मनुष्य क्यों इस उद्धार के समाचार को / सुसमाचार को गंभीरता से नहीं लेता है ? अगर सुसमाचार उद्धार के निमित परमेश्वर का सामर्थ है, तो फिर मनुष्य इस सामर्थ के प्रति आकर्षित क्यों नहीं होता है ? मनुष्य की इच्छा क्यों सांसारिक बातों में केंद्रित हैं ? और अगर वह सुसमाचार के प्रति आकर्षित होते भी हैं, ग्रहण करना चाहते भी हैं तो फिर क्यों उनकी सोच यह होती है की सुसमाचार उन्हें संसार में क्या लाभ दे सकता है?

सर्वप्रथम कारण यह है की प्रचारक अपने प्रचार में परमेश्वर के न्याय के बारे में गंभीरता से प्रचार नहीं करते, परमेश्वर के न्याय से, क्रोध से, दंड से बचने की आवश्यकता को उजागर नहीं करते हैं। इसीलिए लोगों को इन सच्चाइयों के अपेक्ष्यकृत संसार में जीवन के अभिलाषाओं की पूर्ति होने की आवश्यकता और जरूरत ज्यादा महत्वपूर्ण लगती है। सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति और समस्या का समाधान प्राप्त करना बड़ा लगता है और परमेश्वर के न्याय से, क्रोध से, दंड से बचने की आवश्यकता छोटी लगती है या फिर मनगढ़ंत बातें लगती है।

दूसरा कारण यह है की सामान्य तौर पे लोगों की रुचि अपने जीवन को इस संसार में बेहतर,सफल और सम्पन्न बनाने के लिए रुचि रखते हैं, उसके लिए मेहनत, परिश्रम करना चाहते हैं पर आत्मिक बातों में, यीशु के बलिदान स्वरूप पाप की माफ़ी के बारे में रुचि नहीं रखते हैं। 

भले ही कारण कुछ भी हो, या लोगों की प्रतिक्रिया कुछ भी हो, लोगों की मांग कुछ भी हो, पर एक सच्चे प्रचारक होने के नाते हमें केवल वही बताना है जो सत्य है। और सत्य यह है की सुसमाचार हमें केवल अनंत जीवन की प्रतिज्ञा देता है और इस संसार में क्रूस उठाकर के चलने की आज्ञा देता है। यही सच्चाई है और बहुत सारे लोग इससे असहज महसूस करते हैं। 1 कुरिन्थियों 15:1 में सुसमाचार में स्थिर रहने की बात की जा रही थी। सुसमाचार का कार्य हमारे जीवन में होने का एक सच्चा प्रमाण यह है की परमेश्वर हमें उस सुसमाचार में स्थिर बने रहने में सहायता भी करता है। इसीलिए हमें यह समझना है की भूत काल में हुए उस अनुभव, परमेश्वर का हमारे पापों को माफ़ करना हमारे लिए एक साधारण बात बनकर न रह जाए। यह जरूरी है की अब हम उस सुसमाचार में स्थिर रहें क्योंकि यह हमारे वर्तमान कल के उद्धार में बने रहने का प्रमाण है। हम लापरवाह नहीं हो सकते, हम वापस उसी सांसारिक मानसिकता में गिर नहीं सकते और न ही सांसारिक वस्तुओं को अपनी प्राथमिकता बना सकते हैं। हम उस झूठे आश्वासन में अपने जीवन को जी नहीं सकते जो हमें सांसारिक अभिलाषाओं की तृप्ति का आश्वासन देता है। 

हमारा आश्वासन आत्मिक है, अनंत जीवन का है, जीवित आशा का है। हमारा आश्वासन परमेश्वर के क्रोध, दंड और न्याय से मुक्ति का है जो यीशु के द्वारा संभव हुआ है। और अब हमें इस संसार में यीशु की उस प्रतिज्ञा को आशा के साथ थामते हुए  परीक्षा, समस्या, ताड़ना इत्यादि के मध्य स्थिर रहते हुए आगे बढ़ते जाना है। अब हमें भी अपने क्रूस को उठाकर इस संसार में चलना है। यही सुसमाचार की आज्ञा है और प्रतिज्ञा है।  

-Pastor Monish Mitra

सुसमाचार को ग्रहण करना


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