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मत्ती 10:34-36 का अर्थ क्या है?


 मत्ती 10:34-36 का अर्थ क्या है?

क्या मत्ती 10:34-36 में यीशु मसीह लोगों को भड़का रहे हैं? क्या यीशु मसीह तलवार और क़त्ल करने की शिक्षा दे रहें हैं?

जवाब जानिए!

कुछ लोग हैं जो यीशु मसीह से बहुत नफरत करते है और बाइबल को भी नफरत करते हैं और हमेशा यही कोशिश में रहते है कि किसी भी हालत में हम बाइबल को गलत साबित करें और यीशु मसीह को गलत साबित करें। यह वह लोग हैं, जो कभी खुद अपने हाथों से बाइबल को निकालकर, ईसाइयत क्या हैं?, यीशु कौन है? और बाइबल क्या कहती है? कभी पढ़ते नहीं है और खुद अनुसंधान नहीं करते। यह वह लोग हैं जो सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट में आने वाली बातों को फेसबुक में आने वाली फ़ोटो को और यूट्यूब में आने वाली वीडियों के ऊपर भरोसा कर के, ईसाई लोगों के साथ तर्क करने चले जाते है, वाद विवाद करने चले जाते है। और वह उनको गलत साबित करने की कोशिश करते हैं और यह भी बताने की कोशिश करते हैं कि बाइबल गलत है, ईसाइयत गलत है, और यीशु मसीह भी गलत है।

यह वह लोग हैं, जो समय नहीं निकालना चाहते है यह जानने के लिए कि उनका बयान सही है या गलत है।

वैसे ही एक उदाहरण को हमने पिछले विडीयों में देखा। जहाँ पर एक हिंदू धर्म गुरु और एक मुस्लिम प्रचारक ने लूका की किताब 19:27 वचन को गलत तौर पर प्रस्तुत किया। हमनें उस विडीयों में बताया कि उस वचन को सन्दर्भ में कैसे समझना चाहिए। लेकिन कुछ लोग हैं जो मन में ठान रखें हैं कि हम समझेंगे नहीं, हम चाहे कितने भी सबूतों को लाकर दिखायेगें। हम अपने आँखों को बंद कर लेगें; क्योंकि वो यह लोग हैं जो यीशु मसीह से नफरत करते हैं। यह वो लोग हैं जो सच्चाई से बैर करते हैं, रोशनी से डरते हैं।

वैसे ही एक उदाहरण को आज हम लोग देखेंगे जो कि हम पढ़ सकते हैं। मत्ती की किताब 10:34-36 यह वचन को लेकर आकर कुछ लोग यह कहने की कोशिश करते हैं कि यीशु मसीह शान्ति का राज कुमार नहीं, यीशु मसीह इस दुनिया में एक दूसरे के विरुद्ध लोगों को भड़काने के लिए आया?

तो चलिए हम वह वचन को पढ़ कर देखते हैं और जानेंगे उसका अर्थ क्या है?

"यह मत सोचो कि में धरती पर शान्ति लाने आया हूँ। शान्ति नहीं बल्कि मैं तलवार का आवाहन करने आया हूँ। मैं यह करने आया हूँ: पुत्र पिता के विरोध में, पुत्री माँ के विरोध में, बहू सास के विरोध में होगें, मनुष्य के शत्रु, उसके अपने घर के ही लोग होंगे।" (मत्ती 10:34-36)

तो यह वचन में यीशु कहते हैं कि तुम यह मत सोचो कि मैं शान्ति देने के लिए आया हूँ और शान्ति लेकर आया हूँ बल्कि मैं तलवार का आवाहन करने आया हूँ, एक दुसरे के विरोध लोगों को खड़ा करने के लिए आया हूँ।

तो यह वचन का मतलब क्या है? क्या यीशु शान्ति का राज कुमार हैं? जैसे हम पुराने नियम में और नये नियम में कुछ वचन पढ़ते हैं, जिसमें लिखा है, "(Jesus Christ is the Prince of Peace) अगर यीशु मसीह शान्ति के राज कुमार हैं, वह शान्ति के दाता हैं"  दुनिया में शान्ति लायें हैं। लोगों को प्रेम सिखाने आये हैं, तो क्यों उन्होंने यह वचन में ऐसे कहा कि मैं लोगों को एक दूसरे के विरुद्ध खड़े करने आया हूँ? और यह मत सोचों शान्ति लाया हूँ बल्कि तलवार का आवाहन करने आया हूँ।

आगे बड़ने से पहले मैं एक घटना आपको याद दिलाना चाहूँगा, गतसमनी का बगीचा यह गतसमनी के बगीचे में जब यीशु मसीह को कैद करने के लिए सैनिक आते हैं। यीशु मसीह के चेलों में से जो मुख्य चेला पतरस है तुरन्त अपने चाकू को निकाल कर एक सैनिक के कान को काट देता हैं। यीशु मसीह ने वहाँ पर क्या किया। पतरस को शाबाशी दी? वाह! पतरस तुम ने मेरी रखवाली में एक सैनिक को काट दिया। बड़ीया काम किया “नहीं” यीशु मसीह ने वहाँ पर पतरस को डाँटा और यह कहा कि जो तलवार उठायेगा उसका अन्त तलवार से होगा।

तो वहाँ पर यीशु मसीह तलवार का विरोध कर रहे हैं ,पतरस को डाँट रहे हैं और यहाँ पर कह रहे कि है मैं शान्ति लाने नहीं आया हूँ बल्कि मैं तलवार का आवाहन करने आया हूँ। तो इसका मतलब क्या है? 

दोस्तों हमें यह जानना जरूरी है जैसे मैं हमेशा अपने विडीयों में कहता हूँ कि जब यीशु मसीह प्रचार करते हैं वह प्रचार का तरीका क्या है? उसका सन्दर्भ होता हैं।

यीशु मसीह का प्रचार किस तरीके से होता है, यह जानने से पहले एक आम आदमी, एक साधारण व्यक्ति जब बात करता है उसके बातों में क्या होती हैं। आपने सुना होगा जब कोई अच्छा काम बाहादुरी का काम कर देता है। तो दुसरा व्यक्ति उसको कहता है यह तो बहुत बड़ा शेर निकला; तब जब यह व्यक्ति कहता है कि यह बहुत बड़ा शेर निकला, इसका मतलब यह नहीं कहता है कि वह व्यक्ति वाकई में शेर है या फिर हम जब कलीसिया में जाते है, हम जवान है, हमे बड़े लोग देखकर कहते है, तुम कलीसिया के खम्बे हो। तो इसका मतलब यह है क्या हम वाकई में कलीसिया के खम्बे है? कितने चौड़े बड़े खम्बे हम! नहीं। जब भी लोग अपने बातों में किसी को देखकर कहते हैं कि तुम शेर निकले तुम तो खम्बे हो। तो वह शब्द का वास्तविक अर्थ नहीं माना जाता है, वह शब्द से क्या दर्शाता है वह शब्द से वह क्या कहना चाहते हैं? यह हमें जानना जरूरी है, एक इंसान के बाहादुरी को दर्शाने के लिए उसे शेर कहा जाता हैं। एक जवान को कलीसिया में खम्बा कहा जाता है, क्योंकि वह भविष्य में उस कलीसिया का एक मुख्य व्यक्ति बननेवाला है।

वैसे ही जब यीशु मसीह प्रचार करते हैं उनके भी प्रचार में बहुत सारे ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं; जो कोई बातों को समझाने के लिए वह इस्तेमाल करते है। यहाँ पर यीशु मसीह ने कहा तलवार का आवाहन, तो हमें जानना जरूरी है कि वह शब्द तलवार का मतलब क्या है? वह किस बात को दर्शाता है? जब तलवार की बात करते है तलवार किस लिए इस्तेमाल किया जाता है, काटने के लिए, अलग करने के लिए, आगे का वचन क्या लिखा है? आगे का वचन कहता है, पुत्र पिता के विरोध में, पुत्री माँ के विरोध में, बहू सास के विरोध में होगें, मनुष्य के शत्रु उसके घर के ही लोग होंगे।

तो दोस्तों! मैं आपको यह चीज बताना चाहूँगा, यदि कोई व्यक्ति कोई मुस्लिम धर्म से है या हिन्दू धर्म से है या फिर कोई भी विश्वास से है। वह अचानक यीशु को स्वीकार करता है, यीशु मसीह के प्रेम को देखकर, उनके सूली के दशा को देखकर, यीशु के बलिदान को देखकर, वह बहुत ही मोहीत होकर, बहुत ही मन में महसूस कर कर कि भैया! यीशु मसीह इतना प्यार करता है मुझ से ऐसे परमेश्वर, ऐसे मुक्ति दाता को मैं कैसे भुला सकता हूँ? कैसे छोड़ सकता हूँ? यह बोल कर जब वह व्यक्ति जब यीशु के पास आता है। तो क्या उसके घरवाले उसको पार्टी देगें? उसकी तारीफ करेंगे? यह बोलेगें वहा बेटा कि मैंने तुमको 20-25 साल से इतना खिलाया पीलाया मैंने तुमको पढ़ाया इतने साल से तुम नमाज़ पढ़ते थे, इतने साल से तुम ग्रन्थ गीता पढ़ते थे तुम आज ईसाई बन गए। वाह! ऐसे उनकी तारीफ करेंगे “नहीं” वह परिवार के लोग यह लड़के के विरोध उठेंगे यह है। यह वचन का मतलब और वह घरवालों को लगेगा कि यह लड़का इतने साल से हमारे साथ था आज खुद निर्णय लेकर हमारे विरोध खड़ा उठा है। तो यह वचन जो कहता है, कि पुत्र पिता के विरोध में यानी कि मान लो अगर पिता ने यीशु मसीह को स्वीकार किया या फिर पुत्र ने यीशु मसीह को स्वीकार कर लिया तो ऐसा हो सकता है कि पिता लगेगा कि मेरा बेटा मेरे विरोध में हो गया या फिर पुत्र को लगेगा कि मेरा पिता मेरे विरोध कर रहा है क्योंकि यीशु मसीह को स्वीकार किया।

दोस्तों हम ऐसे बहुत सारे उदाहरण को देख सकते है, जहाँ पर यीशु मसीह को स्वीकार करने के कारण परिवार वाले उस व्यक्ति का क़त्ल तक कर चुके हैं। हम ऐसे भी उदाहरण देखते हैं जो घर से भी लोग निकाल दिये जाते है।

तो यह वचन जो तलवार कहते हैं यीशु मसीह वह वास्तविक तलवार को, वास्तविक चाकू को नहीं दर्शाता है। बल्कि यह दर्शाता है कि जब हम यीशु को स्वीकार करते हैं, दुनिया हम से नफरत करेगी। तो क्या इसका मतलब यह है कि यीशु मसीह ने दुनिया में शान्ति नहीं लाया। यीशु यह दुनिया में शान्ति लायें वह कहते हैं कि यदि कोई तुम से नफरत करता है, तुम उसके लिए प्रार्थना करों, यदि कोई तुम को मारने आता है एक गाल पर तो उसको दुसरा गाल दो, यदि कोई तुमको जबरदस्ती एक मील लेके जाता हैं  तो दो मील उसके साथ जाओ। तो यीशु मसीह शान्ति से जरूर सिखाते हैं। लेकिन जब भी बाइबल में यीशु कहते हैं कि मैं शान्ति लाने आया हूँ। हमें यह जानना जरूरी है कि यीशु कौन से शान्ति के बारे में बात कर रहे है।

उत्पत्ति की किताब 1और 2 अध्याय में पाप के कारण मनुष्य जो है, परमेश्वर के शान्ति को खो देता है और रोमियों की किताब 5:1 वचन में हम यह पढ़ते हैं कि यीशु मसीह का बलिदान, यीशु मसीह के कारण उस खोए हुए परमेश्वर के रिश्ते में हम जुड़ जाते हैं और मनुष्य और परमेश्वर के बीच में एक शान्ति हो जाता हैं। तो मुख्य शान्ति की जब बात की जाती हैं तो वह परमेश्वर और इंसान के बीच में है और जब इंसान परमेश्वर के साथ शान्ति बनाता है। तो क्या होगा दोस्तों, रोशनी की लड़ाई अंधेरे से होगी, बुराई की लड़ाई अच्छाई से होगी, मानलो एक व्यक्ति बहुत बुरा था वह दोस्तों के साथ मिलकर गालियां देता था, दारू पीता था, गलत हिसाब लिखता था। अचानक से वह यीशु मसीह को स्वीकार करके बदल जायेगा; उसको वह सारी चीजें छोड़नी पड़ेंगे जो उसे पाप में लेकर जाता हैं। इसके वजह से उसके दोस्त उससे बैर करेंगे उसके विरोध उठेंगे और यह भी सोचने लगेंगे कि गलत हिसाब लिखना छोड़ दिया है, इसके वजह से हम फंसेंगे यह तो हमारे विरोध खड़ा हो गया है।

तो यह वचन उस बात को दर्शाता है कि जब हम यीशु मसीह के पास आ जायेंगे। लोग हमसे नफरत करेंगे और उनको लगेगा कि हम उनसे नफरत कर रहे हैं। लेकिन सच यह है दोस्तों कि हम यीशु मसीह के साथ शान्ति में आ रहे है तो हम में यह दुनिया में फर्क देखा  और उस फर्क को दुनिया स्वीकार नहीं कर सकती है। जैसे हम युहन्ना की किताब 1अध्याय में पढ़ते हैं कि यीशु मसीह को भी उनके लोगों ने स्वीकार नहीं किया। तो यह यीशु मसीह के आगमन से उनके और उनके परिवार के बीच में ही जो है, तलवार आ गया है।

आज एक उदाहरण देता हूँ, जब मैं 2007-2008 में यीशु मसीह को पुरी तरह मैंने स्वीकार किया, एक बार शाम को प्रार्थना करके घर पर आया। तो मेरे घरवालों ने मेरा जो कपड़ा हैं वह सब बांधकर रखा था और जैसे ही मैं दरवाजे पर आया वह कपड़े का बन्डल मेरे मुंह पर फेंक दिया कि तुम घर से चले जाओ। तो उस समय में मुझे लगा कि मेरे घरवाले मेरे विरोध खड़े हो गए और मेरे घरवालों को लगा कि इतने साल से हमनें इसको पाला लेकिन अब ये पुरी तरह यीशु मसीह को स्वीकार के उन्हीं के पीछें जा रहे हैं, प्रार्थना में लगा हुआ है, उनको लग रहा था कि मैं उनके विरोध में हो गया।

तो यीशु मसीह यह वचन से यह दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं दोस्तों वह यह नहीं कह रहे हैं कि जाओ तुम घात करों, क़त्ल करों, एक दूसरे के साथ लड़ाई करों। लेकिन यह बात याद रखिए अगर लोग आपसे नफरत करते हैं, यीशु मसीह यूहन्ना की किताब 15:18 वचन में कहते हैं, "तुम बिल्कुल निश्चित रहो और यह जान लों कि जब लोग तुमसे नफरत करते हैं, यह जान लों कि तुम से नफरत करने से पहले लोगों ने यीशु मसीह से नफरत किया है।" तो शान्ति की बात होती है परमेश्वर और मनुष्य के बीच में। तो यह वचन का सन्दर्भ यह है इस वचन का मतलब यह है, जो सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट के सहारे पर है जो सिर्फ और सिर्फ यीशु मसीह को बदनाम करने में तुले हुए हैं, वह यह सत्य को सुनेंगे तो भी वह समझने की कोशिश नहीं करेंगे टिप्पणी में फिर से गालियां लिखेंगे।

हम प्रभु यीशु मसीह के प्रेम के लिए इस दुनिया में जी रहे हैं, लेकिन उसी समय में हम इस दुनिया के साथ शान्ति नहीं बना सकते हैं, दुनिया के पाप के साथ शान्ति नहीं बना सकते हैं। जब दुनिया के साथ हम शान्ति नहीं बनायेंगे। तो उनको लगेगा कि हम उनके विरोध हो गए हैं, हमारे विरोध वह हो जायेंगे।

यह हैं, मत्ती 10:34-36 का अर्थ। तो खुशखबरी है! कि जब यीशु कहते हैं मैं तलवार लाया हूँ, वह तलवार किसके बीच में है? वह तलवार अंधेरा और रोशनी के बीच में हैं, वह तलवार बुराई और अच्छाई के बीच में है, और यह तलवार अच्छा है आप शब्द को उसके सन्दर्भ में समझिये।

प्रभु आपको आशीष करें। 

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Transcription by Nini Pandit

Transcription Corrections are welcome in the Comments

पुराने नियम में इतने युद्ध क्यों हैं?

पुराने नियम में यहोवा परमेश्वर द्वारा अनुमति दी गई बहुत सारे युद्ध और हिंसा को देखते हैं। क्या यह वही प्रेम करने वाला परमेश्वर है जैसाकि उसे नये नियम में दिखाया (या चित्रित किया) गया है?

कुछ वचन ऐसे हैं जो हमें परमेश्वर के प्रेम करनेवाले चरित्र से एकदम विपरीत (घृणास्पद/प्रतिकूल) प्रतीत होते हैं। चलिए कुछ ऐसे वचनों को देखते हैं और विषय को गंभीरतापूर्वक से अध्यन करें। 

उदाहरण के लिए, व्यवस्थाविवरण 20 अध्याय में, यहोवा परमेश्वर द्वारा युद्ध के विषय में दिए गए आदेश व निर्देश शामिल हैं। इस अध्याय में दिया है कि यदि कोई नगर इस्राएल के शांति के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता और द्वार नही खोलते तो "जब तेरा परमेश्वर यहोवा उसे तेरे हाथ में सौंप दे तब उस में के सब पुरूषों को तलवार से मार डालना" (व्यवस्थाविवरण 20:13)। अन्य नगरों के संबंध में भी ऐसी आज्ञाएं पाई जाती है कि, "किसी प्राणी को जीवित न रख छोड़ना" (व्यवस्थाविवरण 20:16)।

शायद आपको यह भी याद आए कि किस प्रकार से यरीहो की दीवार को ढा दिया गया था और तब इस्राएलियों ने, "क्या पुरूष, क्या स्त्री, क्या जवान, क्या बूढ़े, वरन बैल, भेड़-बकरी, गदहे, और जितने नगर में थे, उन सभों को उन्होंने अर्पण की वस्तु जानकर तलवार से मार डाला" (यहोशू 6:21)। यह वचन हमें बिना संदेह के और साफ तौर से एक निर्दयता और बदले की भावना वाला लगता है। है ना? या फिर आप यहोशू 11:20 पर गौर कीजिए, "क्योंकि यहोवा की जो मनसा थी, कि अपनी उस आज्ञा के अनुसार जो उसने मूसा को दी थी उन पर कुछ भी दया न करे; वरन सत्यानाश कर डाले, इस कारण उसने उनके मन ऐसे कठोर कर दिए, कि उन्होंने इस्राएलियों का सामना करके उन से युद्ध किया।" आज जब हम अपने इक्कीसवीं सदी वाले दृष्टिकोण/नज़रिये से सोचते हैं तो यह प्रश्न पूछते हैं कि, "इन सारे विनाशों के ज़रिए कौनसी भलाई प्राप्त हुई?"

इसके बावजूद, हम देख सकते हैं कि इसका दूसरा पहलू भी है जो यहोवा परमेश्वर को अनुग्रह करनेवाले परमेश्वर के रूप में दर्शाता है। हालांकि हम पाते हैं कि भविष्यवक्ता यहेजकेल ने सब के सामने दुष्ट व्यक्तियों की निंदा/पर्दाफ़ाश किया है और अपनी इन निंदाओं में उन्होंने किसी भी दुष्ट को नहीं छोड़ा है। लेकिन इसके साथ ही वे यहोवा परमेश्वर के अनुग्रह वाले वचनों को भी दर्ज़ करते हैं। जैसाकि ये वचन हैं: 

"परन्तु यदि दुष्ट जन अपने सब पापों से फिर कर, मेरी सब विधियों का पालन करे और न्याय और धर्म के काम करे, तो वह न मरेगा; वरन जीवित ही रहेगा।" "प्रभु यहोवा की यह वाणी है, क्या मैं दुष्ट के मरने से कुछ भी प्रसन्न होता हूँ? क्या मैं इस से प्रसन्न नहीं होता कि वह अपने मार्ग से फिरकर जीवित रहे?" (यहेजकेल 18:21,23)। और वे इसके साथ आगे बढ़ते हुए वचन 32 में कहते हैं, "क्योंकि, प्रभु यहोवा की यह वाणी है, जो मरे, उसके मरने से मैं प्रसन्न नहीं होता, इसलिये पश्चात्ताप करो, तभी तुम जीवित रहोगे! (यहेजकेल 18:32)"। इसके अतिरिक्त 2 इतिहास 16:9 एक ऐसा वचन है, जो हमें परमेश्वर के अनुग्रहकारी चरित्र के प्रति झकझोर(विवश/बाध्य) करके रख देता है, "यहोवा की दृष्टि सारी पृथ्वी पर इसलिये फिरती रहती है कि जिनका मन उसकी ओर निष्कपट रहता है, उनकी सहायता में वह अपना सामर्थ दिखाए।"

परमेश्वर के विषय में ये सभी बातें यह दर्शाती हैं कि वह बुराई पर कठोर दण्ड देने में अटल है। जबकि वह किसी को दंड देने से कभी-भी प्रसन्न नहीं होता है। ये सब बातें उसे उन सब लोगों के प्रति प्रेम और प्रोत्साहन में अटल रहनेवाले के रूप में भी दर्शाती हैं जिनके हृदय उसकी ओर फिर जाते हैं। परमेश्वर की स्पष्ट मनसा/इच्छा यह है कि पापी पश्चाताप करें और जीवन को पाएँ। लेकिन एक ऐसा समय-बिंदु आता है जहां पर आखिरकार पाप और बुराई असहनीय हो जाती है; जिसके कारण उसे एकदम पूरी तरह से ही नष्ट कर दिया जाता है।

हमें इन भयानक और कठोर दण्डों को इनके ऐतिहासिक संदर्भ या परिस्थिति में रखकर देखना चाहिए। उन समयों में बुराई का फैलाव इतना अधिक व्यापक था कि अनैतिकता, लोगों के चरित्रों में गिरावट और असभ्यता ने जीवन के हर एक पहलू में आक्रमणकारी रूप से अपने अधिकार को स्थापित कर दिया था। यहां तक कि बच्चों को मूर्तियों/बुतपरस्त देवताओं के लिए बलिदान किए जाते थे। पुरुष और स्त्रियों की वेश्यावृत्ति, धार्मिक रीति-रिवाजों के एक भाग के रूप में, एकदम मंदिर के अंदर ही होने लगी थी। मूर्ति पूजा प्रचलित थी और सामाजिक जीवन पूरी तरह से अशुद्धताओं से भरा हुआ था। बुराई संक्रामक रूप में (संपर्क से फैलने वाली बिमारी के समान) थी और परमेश्वर के लोग भी इससे संक्रमित होने के ख़तरे में थे। आखिर में परमेश्वर के द्वारा भयानक न्याय को प्रकट किया गया।

आज हम अच्छाई और बुराई के बीच के अंतर को, काले और सफेद रंग में अंतर के समान नहीं देख रहे हैं। मानो इस अंतर को हमने खो दिया है। सहनशीलता को एक महान धार्मिक गुण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। और वास्तव में विभिन्नताओं के प्रति सहनशीलता एक महान मसीही गुण भी है। लेकिन आज अक्सर सहनशीलता का अर्थ दुनिया में लगभग हर प्रकार के व्यवहार को स्वीकार करने के गुण के रूप में लिया जाता है। सहनशीलता के नाम पर आज कुछ भी किया जा रहा है! नैतिक सापेक्षवाद, इसी प्रकार की सहनशीलता का ही परिणाम है जो एक अंधाधुंध रूप से फैला हुआ है (नैतिक सापेक्षवाद ऐसी अवधारणा है जिसमें माना जाता है कि एक स्थान/समुदाय/वातावरण में अपनाए जाने वाले नैतिक मूल्य दूसरे स्थान/समुदाय/वातावरण के लिए अनैतिक हो सकते हैं)। इसके कारण बच्चों का मार्गदर्शन भी पूर्ण रूप से स्वतंत्र नैतिक मूल्यों की बजाय, कम और बहुत ही कम स्वतंत्र नैतिक मूल्यों के साथ हो रहा है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो, जिन नैतिक मूल्यों के साथ उनकी परवरिश/मार्गदर्शन किया जा रहा है वे स्थान/समुदाय/वातावरण के साथ ही बदलते रहते हैं और हर एक स्थान पर एक जैसे नहीं रहते हैं। हम अब शायद ही कभी 'पाप' नाम के शब्द को सुनते हैं। परंतु इसके विपरीत कहीं अधिक कोमल या हल्के शब्दों को इस्तेमाल में लाया जाता है। निश्चित रूप से परमेश्वर अपने पवित्रता के चरित्र के कारण इस घृणित बात को कभी भी सहन नहीं करेंगे।

ना ही हम इस सच्चाई को स्वीकार करना पसंद करते हैं कि जब बुराई फैलती है तो निर्दोष और दोषी, दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ता है। जब हिरोशिमा पर बम फैंका गया था तो इस शहर पर आई आपत्ति ने निर्दोष और दोषी दोनों को ही मार डाला था। कुछ दिनों के बीत जाने पर एक सीधे-सीधे परिणाम के रूप में, युद्ध अपनी समाप्ति पर आ गया। यह एक भयानक अंत था, लेकिन आखिरकार यह अंत था और इससे भी ज्यादा हो सकने वाले हत्याकांड को टाल दिया गया। आइए, बाइबल में न्याय के इस बहुत ही सख्त और सामूहिक दृष्टिकोण के बारे में स्पष्ट बनें। कनान देश के बुतपरस्त (अनेक देवी-देवताओं को मानने वाले या मूर्तिपूजक) सांप्रदाय अवश्य ही इस्राएलियों के साथ शादी-ब्याह करते थे और इसके कारण परमेश्वर के लोग उनकी व्यभिचार जैसी बुराईयों/विकृतियों और बुरी धार्मिक रीति-रिवाजों को अपनाने के खतरे में थे। आखिर में यह खतरा बहुत ही बड़ा बन गया।

संपूर्ण बाइबल शुरूआत से लेकर अंत तक, न्याय के साथ-साथ अनुग्रह के अपने इस अटल मानदण्ड से, कभी भी नहीं बदलती। यीशु बुराई करने वालों के दण्ड के विषय में एकदम स्पष्ट हैं,  क्योंकि न्याय के दिन परमेश्वर बुराई करने वालों से कहेंगे, "हे स्रापित लोगों, मेरे सामने से उस अनन्त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है" (मत्ती 25:41)। हमारा समाज दुख और दण्ड के बारे में सुनने की अधिक परवाह नहीं करता है। और यह एक ऐसे यीशु को पसंद करता है जो एकदम विनम्र और शांत है जैसाकि आज के कुछ आधुनिक लेखकों के द्वारा उसे (यीशु को) प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन नये नियम का परमेश्वर युगों-युगों से कभी न बदलने वाला परमेश्वर है और इस दृढ़ वचन में ही हमारी एकमात्र आशा बनी रहती है। 

यह बात एकदम साफ और स्पष्ट है कि हम सभी ने उस पूर्ण सिद्धता के चरित्र को (पहले मनुष्य आदम के ज़रिए  आए पापों के कारण) खो दिया है। हममें से हर एक लड़खड़ाता है, चोट खाता है और पाप करता है। यहां तक कि सबसे धर्मी व्यक्ति भी बार-बार इस बात की पुष्टि करते हैं। परमेश्वर के सदाकाल के लिए बने रहने वाले न्याय में, वह पाप पर बहुत ही साधारण तरीके से यों ही पलकें नहीं झपकाता है। लेकिन कहानी का अंत यह नहीं है और ना ही यह बाइबल की प्रमुख विषय-वस्तु है। लेकिन जब भी इंसानियत स्वयं के आनंद/आत्म संतुष्टि में बहुत गहराई से लिपटती जाती है तो परमेश्वर बीच में आते हैं। पुराना नियम तो वास्तव में ही, परमेश्वर द्वारा मानव परिस्थितियों में आशा के एक नये वायदे के साथ बीच में आने का, एक रिकॉर्ड/सुरक्षित विवरण है। नया नियम, पाप और विद्रोह में खोए हुए लोगों पर किए गए अनुग्रह का रिकॉर्ड(सुरक्षित विवरण) है। परमेश्वर को इस बचाव के कार्य का उत्तरदायित्व लेने की कोई विवशता या मजबूरी नहीं थी। लेकिन उसकी (पहले से ही निर्धारित) योजना ऐसी शानदार थी कि उसे शब्दों के द्वारा बयान नहीं किया जा सकता है। वह योजना अब भी शानदार है। परमेश्वर पाप और न्याय के बारे में नहीं भूला। बल्कि इसके विपरीत, यीशु मसीह - मानव देह में परमेश्वर - ने स्वयं पाप के दण्ड को अपने ऊपर लिया और इस प्रकार भयानक सजा का भुगतान किया। परमेश्वर के पाप-क्षमा के इस कार्य को ही मसीही/ईसाई लोग 'अनुग्रह' कहते हैं। बाइबल मुख्य रूप से अनुग्रह का एक रिकॉर्ड(जीवन-इतिहास) है जो कि डर और विपत्ति जैसे हालातों के विरुद्ध में निर्धारित किया गया है।

यह एक चिरस्थायी और अनंतकाल की कहानी है। हमें चारों ओर से घेरने वाली बुराई लगातार बढ़ती हुई प्रतीत होती है। लोगों में नैतिक मूल्यों के प्रति बेपरवाह (एकदम प्रभावहीन) होने की प्रवृति धीरे-धीरे हर जगह प्रवेश कर रही है। लेकिन इसके बीच अभी भी परमेश्वर के अनुग्रह की रोशनी चमकती है। उसका प्रेम बना रहता है। वह पुकारता है और बिल्कुल अंतिम क्षण तक भी पुकारता है। क्या आपने उसके अनुग्रह को पा लिया है? प्रतिदिन के जीवन में जीने के लिए यह अभी भी मौजूद है!

Translation: Shivani Kandera
Original Article: Click here

Should we use a printed Bible or a Digital Bible?


There are certain people who think that the printed Bible is Holy and therefore it should only be used in that form. The digital form of Bible when used in phones cannot be called as holy and it is not as effective as the printed Bible. When we use digital Bible in the Church, meetings, personal reading etc we get distracted by notifications, messages etc and therefore using digital Bible is not a correct and proper choice. You can also mark your favorite passages and keep short notes in the printed Bible. 

On the other hand, there are certain people who think that digital Bible is free to download, can be easily shared with others, can be carried anywhere, it can be used anywhere without any problem. Therefore, it’s a better option than the printed Bible which is often bulky in size and it’s not practically possible to carry it everywhere.

These arguments have led people to categorize people as holy & unholy, mature & immature, good & bad etc just on the fact that people use a printed version or a digital version of the Bible.

Here are few thoughts on this issue….

First of all, the printed version Bible what we have today was never in that form from the beginning. It wa​​s first inscribed by God on stone, was kept in the Ark of the Covenant and the Israelites were commanded to put the Word of God in their heart.

Secondly, with the addition of Mosaic Laws, Writings of the Prophets, Psalms, Wisdom Books etc. they were written on skins and papyrus which were then saved as scrolls.

Thirdly, even in the early Church the use of Mosaic Laws, Prophetical writings and later the Epistles and Gospel writings were preserved in form of scrolls. Until 5th century there was no concept of proper canons when the books were canonized.

            The important aspect throughout this time was never about carrying the scriptures in some written format like scrolls, but it was about having the Word of God in the heart. Deut. 4:9, Prov. 6:21, Psalms 119:11. All the scrolls were preserved in sacred places and were used for worship and for references during various occasions.

With time and development of science & technology the printed form of the Word of God has been developed and we have the privilege to use it today. To carry the printed version of the Bible while going to the Church, preaching the Word, using it during various meetings or keeping in the self does not necessarily make a person a follower of the Word of God. At the same time using a digital form doesn't make a person an unbeliever & unholy.

A person can carry the Bible, read the Bible yet may not follow the Bible. A person who uses a digital version cannot be necessarily branded as an unholy & disobedient Christian.

We never thought time will come, we will have online prayer services, worships through digital medium, online teaching, preaching and fellowship. We must remember that the form will change, but our purpose must not change. Each one of must prayerfully, thoughtfully decide how best he can use the available resources whether printed or digital for his own edification and spiritual growth.

Amen!

Pastor Monish Mitra

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Should I quit my secular Job?

Should I quit my secular job and do full time ministry because secular job is waste of time and un-spiritual.

THE TWO MISTAKES

1. The first mistake some people make is that they tend to link ‘secular job’ as disobedience to God and link ‘doing ministry’ as obedience to God. One of the reasons behind this assumption is maybe because they heard testimonies of people who immediately left their secular jobs and joined ministry after becoming a believer. They argue that people in secular job are wasting time because they are not directly involved in the great commission. This is dangerous because such people leave the ‘secular’ job that God has given them based on a false assumption of obedience. At the same time, they put obedient people in the category of disobedient. It makes every Christian who has a secular job as ‘disobedient’ which is a very unfair statement. In other words, such people have an assumption that if we continue in our secular job after becoming a believer, if we don’t leave that secular job and get involved in mission then it is an act of disobedience. 

Such an argument is invalid because in the New Testament, it is clear that the Apostles did not teach that all Christians should leave their ordinary employment. Apostle Paul gives us a principle in 1 Corinthians 7:20. He says that “Each one should remain in the condition in which he was called”. When we are called to be a Christian, when we are born again there has to be visible radical change in your life, we need to display the fruit of the Spirit, walk in the Spirit, hate sin, overcome sin etc. In the immediate context Apostle Paul says that it is not mandatory for a man to get circumcised if he isn’t circumcised and vice-versa, but he should remain in the same condition in which he was called because these things do not matter in terms of obedience. Therefore, applying the same principle we can conclude that it is not mandatory for someone to leave his job & join ministry because it is not a measure for obedience after becoming a believer. A person does not have to leave his job in order to be a faithful & obedient Christian, according to those principles. However, if someone wants to quit his job after becoming a believer it can be his personal decision and choice. The person should not categorize others who are continuing in their secular jobs as disobedient.

2. The second mistake which some people make is that they tend to think that quitting the secular job and joining a Christian Organization or doing full time ministry is the proof that you are more devoted to Christ and continuing in the secular job is a proof that you are selfish. However, it is absolutely possible that even after being involved in full time ministry or working in a Christian organization a person can be least caring about the people around him. He would not display the fruit of Spirit with fellow believers in the Local Church and people around him. At the same time, it is possible that a person who is employed in a secular job exhibit the fruit of the Spirit and thereby win people to Christ. 

Therefore, we should not assume that leaving the job & joining ministry is the proof of a person’s devotion for Christ.

THE TWO EXHORTATIONS

1. As mentioned in the beginning, there are true testimonies where God places a burning desire, a burden and a restlessness in the heart of people for His mission. They quit their jobs, move to a new location, become missionaries and win people for the Kingdom of God. That burning desire, burden and restlessness in the heart etc are one of the many means/ways/parts by which God works in the lives of some people to lead them to quit their jobs, change their location and move in to a new place in order to do ministry. At the same time, we should remember that it is not a mandatory system by which God has to work in everyone’s life and those who didn’t experience such things cannot be used by God. Having a burning desire, burden and restlessness in the heart etc can definitely be ways by which God moves people but even without these people are still used by God as they stay in their respective vocations &  jobs even after becoming a believer.

2. Remember that isolation is not a necessary sign of spirituality. Most people try to figure out things by themselves regarding ministry, mission etc and believe in keeping things between themselves and God. At the end they get confused, irritated, develop bitterness towards other fellow believers and times towards God also. What is actually needed is that we need to be more connected in a fellowship of believers, where other believers can discern our gifts, talents, passion, maturity and in that way confirm God’s call, will, plan and desire in our life. That’s the way it should happen. That’s a healthy way we understand God’s call on our life; as a member of a body of Christ using our gifts in relationship to other people.

Author: Pastor Monish Mitra


ਕੀ ਬਪਤਿਸਮਾ ਲੈਣ ਦੇ ਲਈ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ? ਕੀ ਮਸੀਹ ਤੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਕਰਨਾ ਕਾਫ਼ੀ ਨਹੀਂ ਹੈ?

Baptism by Immersion | My nephew was baptized today. I was r… | Flickr

   ਅੱਜ ਸਾਡੇ ਸਾਹਮਣੇ ਜੋ ਚੁਣੌਤੀ ਹੈ, ਉਹ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣਾ ਅਤੇ ਬਪਤਿਸਮਾ ਲੈਣਾ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਲਈ ਸਿਰਫ ਇੱਕ ਰਸਮੀ ਗੱਲ ਬਣ ਗਈ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਲਈ ਉਹ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣਾ ਅਤੇ ਬਪਤਿਸਮਾ ਲੈਣ ਨਾਲ ਸੰਬੰਧਿਤ ਜਵਾਬਦੇਹੀ ਅਤੇ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਨੂੰ ਨਜ਼ਰ - ਅੰਦਾਜ਼ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਮਸੀਹ ਕਲੀਸਿਆ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਦੁਲਹਨ (ਲਾੜੀ) ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਦੇਖਦਾ ਹੈ। "ਜਿਵੇਂ ਮਸੀਹ ਨੇ ਵੀ ਕਲੀਸਿਆ ਨਾਲ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਉਸ ਦੇ ਲਈ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਭਈ ਉਸ ਨੂੰ ਜਲ ਇਸ਼ਨਾਨ ਤੋਂ ਬਾਣੀ ਨਾਲ ਸ਼ੁੱਧ ਕਰਕੇ ਪਵਿੱਤਰ ਕਰੇ। ਅਤੇ ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਲਈ ਇਹੋ ਜਿਹੀ ਪਰਤਾਪਵਾਨ ਕਲੀਸਿਆ ਤਿਆਰ ਕਰੇ ਜਿਹ ਦੇ ਵਿੱਚ ਕਲੰਕ ਯਾ ਬੱਜ ਯਾ ਕੋਈ ਹੋਰ ਅਜਿਹਾ ਔਗੁਣ ਨਾ ਹੋਵੇ ਸਗੋਂ ਉਹ ਪਵਿੱਤਰ ਅਤੇ ਨਿਰਮਲ ਹੋਵੇ ( ਅਫ਼ਸੀਆਂ. 5:25-27)। ਵਿਸ਼ਵਾਸੀਆਂ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਅਸੀਂ ਹੁਣ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਹਾਂ, ਇੱਥੇ ਹੁਣ ਸਾਨੂੰ ਇੱਕ - ਦੂਸਰੇ ਦੀ ਸੇਵਾ ਕਰਨ ਦੇ ਲਈ, ਪ੍ਰੇਮ ਰੱਖਣ ਦੇ ਲਈ ਦਾਨ - ਵਰਦਾਨ ਦਿੱਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਤਾਂਕਿ ਕਲੀਸਿਆ ਦੀ ਦੇਹ ਦੀ ਉੱਨਤੀ ਹੋ ਸਕੇ ( 1 ਕੁਰਿੰਥੀਆਂ. 1:7-28; 14:12)। ਇਹ ਕਲੀਸਿਆ ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਇਮਾਰਤ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਬਲਕਿ ਇਸ ਨੂੰ ਪਰਮੇਸ਼ੁਰ ਦੇ ਘਰਾਣੇ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਸੰਬੰਧਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ ਜੋ ਰਸੂਲਾਂ ਅਤੇ ਨਬੀਆਂ ਦੀ ਨੀਂਹ ਉੱਤੇ ਬਣੇ ਹੋਏ ਹੋ ਜਿਹ ਦੇ ਖੂੰਜੇ ਦਾ ਪੱਥਰ ਆਪ ਮਸੀਹ ਯਿਸੂ ਹੈ ( ਅਫ਼ਸੀਆਂ. 2: 19-20)।
       
ਇਹ ਉਹ ਘਰਾਣਾ ਹੈ, ਪਰਿਵਾਰ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਝੁੰਡ ਹੈ ਜਿਹਨਾਂ ਨੇ ਉਸ ਮਹਾਨ ਆਗਿਆ ( ਖੁਸ਼ਖ਼ਬਰੀ) ਤੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਕੀਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਹੁਣ ਇਹ ਉਹ ਸਥਾਨ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਉਹ ਜਵਾਬਦੇਹੀ ਅਤੇ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਦਾ ਅਭਿਆਸ/ ਪਾਲਣ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਹੈ ਅਤੇ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਹੋਣ ਦੀ ਭੂਮਿਕਾ ( ਗਲਾਤੀਆਂ. 6:2; ਕੁਲੁੱਸੀਆਂ. 3:16; ਅਫ਼ਸੀਆਂ. 5:19 ; 1 ਪਤਰਸ. 4: 10) ਵਿੱਚ ਦੱਸਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਅੱਜ ਕੱਲ ਲੋਕ ਇਹਨਾਂ ਭੂਮਿਕਾਵਾਂ ਨੂੰ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦੇ ਬਾਹਰ ਸਮਾਜਿਕ ਸੇਵਾ ਅਤੇ ਗੈਰ ਸਰਕਾਰੀ ਸੰਗਠਨਾਂ ਦੇ ਮਾਧਿਅਮ ਤੋਂ ਦਰਸਾਉਣਾ ਆਖਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਵਿੱਚ ਇਹਨਾਂ ਨੂੰ ਪਾਲਣ ਕਰਨ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਨੂੰ ਬਿਲਕੁਲ ਨਜ਼ਰ ਅੰਦਾਜ਼ ਕਰਦੇ ਹਨ।

         ਜਦੋਂ ਅਸੀਂ ਬਪਤਿਸਮਾ ਦੇ ਬਾਰੇ ਗੱਲ ਕਰਦੇ ਹਾਂ, ਤਾਂ ਇਹ ਕਦੇ ਵੀ ਇੱਕ ਨਿੱਜੀ ਅਤੇ ਵੱਖਰਾ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਉਸ ਨਵੇ ਜਨਮ ਅਤੇ ਪਰਿਵਰਤਨ ( ਬਦਲਾਵ) ਦਾ ਇੱਕ ਬਾਹਰੀ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਹੈ ਜੋ ਸਾਡੇ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਹੋਇਆ ਹੈ ( ਰੋਮੀਆਂ. 6:3-6), ਪਰ ਇਹ ਬਾਹਰੀ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ, ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਰੂਪ ਨਾਲ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਅਜਿਹਾ ਕਰਨ ਨਾਲ ਇਹ ਵਿਅਕਤੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕਲੀਸਿਆ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀ ਅਧੀਨ ਹੋਣ ਨੂੰ ਦਰਸਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਖੁਦ ਨੂੰ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀ ਜਵਾਬਦੇਹ ਬਣਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਤਾਂਕਿ ਉਹ ਹੁਣ ਆਪਣੀ ਆਤਮਿਕ ਚਾਲ ਵਿੱਚ ਢਲ ਸਕੇ; ਨਿਰਦੇਸ਼ਿਤ ਹੋ ਸਕੇ, ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਹੋ ਸਕੇ, ਅਨੁਸ਼ਾਸਤ ਹੋ ਸਕੇ ਜਿਵੇਂ - ਜਿਵੇਂ ਉਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵਚਨ ਦੀ ਸਾਂਝ ਅਤੇ ਨਿੱਜੀ ਸਿੱਖਿਆ ਦੇ ਅਧੀਨ ਕਰਦਾ ਹੈ ( 2 ਤਿਮੋਥਿਉਸ. 3:16-17)। ਇਹ ਔਖਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਲਈ ਲੋਕ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਇੱਕ ਅਲੱਗ, ਬਿਨਾਂ ਜਵਾਬਦੇਹੀ ਦਾ ਮਸੀਹੀ ਜੀਵਨ ਜੀਣ ਦੇ ਬਹਾਨੇ ਲੱਭਦੇ ਹਨ ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਹੁਣ ( 1 ਯੂਹੰਨਾ. 1:9) ਦੇ ਹਵਾਲੇ ਤੋਂ ਜੋ ਚਾਹੇ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਭੱਜ ਸਕਦੇ ਹਨ। ਅਜਿਹੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਲਈ ਅਧੀਨ ਹੋਣਾ, ਜਵਾਬਦੇਹ ਹੋਣਾ ਅਤੇ ਅਧਿਕਾਰ ਦੇ ਅਧੀਨ ਹੋਣਾ ਬਾਈਬਲ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਨਹੀਂ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਲਈ ਨਵਾਂ ਨੇਮ ਤਾਂ ਸਿਰਫ ਦਯਾ ਅਤੇ ਪਿਆਰ ਦੇ ਬਾਰੇ ਵਿੱਚ ਹੀ ਹੈ।

        ਇਸ ਲਈ, ਸਾਨੂੰ ਇਹ ਸਮਝਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਕਿ ਬਪਤਿਸਮਾ ਸਿਰਫ ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਹ ਇੱਕ ਨਿੱਜੀ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਹ ਇੱਕ ਰਸਮੀ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਹ ਮਸੀਹੀ ਬਣਨ ਦੇ ਲਈ ਸਿਰਫ ਇੱਕ ਮਾਪਦੰਡ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਹ ਇੱਕ ਫ਼ੈਸਲਾ ਹੈ ਜਿਸ ਨੂੰ ਅਸੀਂ ਯਿਸੂ ਮਸੀਹ ਦੀ ਮੌਤ ਅਤੇ ਜੀ ਉੱਠਣ ਦੇ ਮਹੱਤਵ ਨੂੰ ਸਮਝਦੇ ਹੋਏ ਕਰਦੇ ਹਾਂ, ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦੀ ਅਧੀਨਤਾ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸਵੈ ਇੱਛਾ ਨਾਲ ਪੇਸ਼ ਕਰਨ ਦੇ ਮਹੱਤਵ ਨੂੰ ਸਮਝਦੇ ਹੋਏ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਜਿਸਦਾ ਸਿਰ ਯਿਸੂ ਮਸੀਹ ਹੈ ਅਤੇ ਸਵੈ ਇੱਛਾ ਨਾਲ ਖੁਦ ਨੂੰ ਪਰਮੇਸ਼ੁਰ ਦੇ ਘਰਾਣੇ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀ ਅਧੀਨ ਕਰਨਾ ਹੈ ਤਾਂਕਿ ਮਸੀਹ ਦੀ ਦੇਹ ਵਿੱਚ ਸੇਵਾ ਦੇ ਕੰਮ ਦੇ ਲਈ ਸਜਾਏ ਜਾ ਸਕੇ।

Author: Pastor Monish Mitra
Translation: Sister Kiran Sona

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लूत और उनकी बेटियाँ - पूरा सच (Lot & Daughters)



जय मसीह की मेरे प्रिय भाई-बहनों आप सभी को प्रभु यीशु मसीह के नाम से बधाई देता हूँ। और पिछले कुछ दिनों से आप देखते आ रहे हैं, कि किस प्रकार मसीह विरोधियों का विशेष तौर पर राहुल मलिक जैसे लोगों के सवालों का जवाब हम पेश करते आ रहे हैं, और बाइबल की सुन्दरता को हम जाँच रहे हैं।

जब हम बाइबल पढ़ते है उसकी परिपूर्णता में कॉन्टेक्स्ट में और सन्दर्भ में, तो हमें पता चलता है कि बाइबल की सुन्दरता क्या है? और इस प्रकार के लोग केवल बाइबल का मज़ाक बनाना चाहते हैं और उनके हृदय में जो गन्दगी है वह गन्दगी के साथ सब जगह गन्दगी ढूँढने के कारण उन्हें सिर्फ गन्दी चीजें नजर आती हैं।

तो चलिए, आज भी इस वीडियो के क्लिप में एक विशेष मुद्दें की ओर चलते है, जो राहुल मलिक जैसे लोग हमेशा आगे लेकर आते हैं।

राहुल आर्या: पैगम्बर लूत ने अपनी दोनों बेटियों को गर्भवती किया, यह विषय अत्यंत खराब होने के कारण छोड़ दिया..।

तो इस वीडियो क्लिप में राहुल मलिक ने कहा है कि पैगम्बर लूत ने अपने बेटियों को गर्भवती कर दिया और यह बहुत ही गन्दा विषय होने के कारण उन्होंने छोड़ दिया है, लेकिन उनके कुछ पहले वालें वीडियो में उन्होंने इन बातों का ज़िक्र किया है।

राहुल आर्या : ईसाइयों ने जो है अपने बाइबल में, ईसाइयों के बाइबल में, जो उत्पत्ति 19,20 उन में काफी यह चर्चा है। पैगम्बर लूत ने अपने ही बेटी के साथ ज़िना किया ज़िना समझते हो अर्थात अपने ही बेटियों के साथ उन्होंने सेक्स किया .............।

तो यह सवाल का जवाब हमें जानना बहुत जरूरी है और कुछ ईसाई यह भी पढ़ते समय में (Uncomfortable Feeling) असहज भावना आती है और जैसे मैं ने पिछले वीडियो में कहा, असहज भावना हमें तब आती है जब बाइबल को हम उसके सन्दर्भ में नहीं समझ पाते है। दोस्तों, जब भी हम बाइबल पढ़ते है और ऐसी कोई घटना आती है जिसे देखर आप असहज भावना लाते हो, तो आपको सब से पहला यह सवाल पूछना जरूरी है। क्या यह बाइबल इन चीजों को बढ़ावा दे रही है? इन चीजों को करने के लिए कह रही है? या फिर वहाँ पर (रोकॉर्डड्) दर्ज की गई है।

बाइबल की सुन्दरता यह है, बाइबल इतिहास में जो घटना हुईं हैं उन बातों को जैसा है वैसा ही (रिकॉर्ड) अभिलेख करता है, सामान्य रूप से धर्म ग्रथों में देखेंगे तो वो धर्म ग्रथों के जो शूरवीर होते है या फिर जो महापुरुष होते है उनके बारे में अच्छा-अच्छा ही लिखा जाता है और यह सच है इतिहास वही लिखते है जो जीतते है, जो हार जाते है वह इतिहास को लिखते नहीं हैं और ये चीज़ आप को देखने मिलता है राहुल मलिक के वीडियो में जब भी कोई गलत बात वेद में दिख जाए, मनुस्मृति में दिख जाए या फिर कोई भी उनके धर्म ग्रथों में दिख जाए वह कहते है कि ये मिलावट है, ये बदल दिया गया है, ये भी विशुद्ध है। "क्योंकि सत्य को सत्य जैसा प्रस्तुत करने के लिये किसी के पास हिम्मत नहीं है।" लेकिन बाइबल इतिहास में घड़ी हुईं कोई भी बात हो उसको ऐसे ही (रिकॉर्ड) अभिलेख करती है चाहे वह परमेश्वर की प्रजा का लज्जा होने वाली बात हो, परमेश्वर के नबियों ने जो गलत काम किया उसको भी वैसी ही अभिलेख करता है।

सब से पहले सवाल आपको पूछना है, क्या यह घटनाओं से बाइबल हमें यह शिक्षा देती है कि हमें भी उसे अनुसरण करना चाहिए? बिल्कुल नहीं, पूरे बाइबल में अगर आप पढ़ेंगे ऐसी चीजें आपको कहीं पर भी नहीं  मिलेंगी असल में बाइबल जो है लैव्यव्यवस्था में सफ़ाई से हमें यह आज्ञा देती है कि ऐसे प्रकार के सम्बन्ध में नहीं जुड़ना हैं माँ और बेटा या फिर पिता और बेटी।

आपने पिछले वीडियो में ये रेफरेन्स देखा होगा अगर नही देखा है तो वो वीडियो को एक बार देख लीजिए।

तो यह जो घटना है वो बाइबल में (रिकॉर्ड) अभिलेख किया गया है, (Suggest) सुझाव नहीं दिया गया है एक छोटा-सा उदाहरण देता हूँ आपको समझने के लिए और दूसरों को समझाने के लिये।
उदाहरण : एक न्यूज़ पेपर जब आप पढ़ते है, न्यूज़ पेपर में बहुत सारी घटनाएँ अभिलेख की जाती है बलात्कार के बारे में, क़त्ल के बारे में युद्ध  के बारे में, डकैती के बारे में, चोरी के बारे में, धोखा के बारे में, तो क्या यह कहेंगे कि देखों टाइम्स ऑफ इंडिया में या फिर मुंबई मिरर में या फिर कोई भी न्यूज़ पेपर में यह सारी बातें लिखी हुईं है; मतलब वो न्यूज़ चॅनल वाले, वो न्यूज़ पेपर वाले ये सब करने को कह रहे हैं??

तो आपको समझ में आ गया होगा इतने सरल तर्क से  कि लोग किस प्रकार बाइबल को गलत तरीके से समझते है। बाइबल में लिखा है न! इसका मतलब यह नहीं कि वह करना, वैसे ही न्यूज़ पेपर में जो लिखा है हमारे लिए वो जानकारी के लिए लिखी गई है आप सोच सकते हो इसमें क्या जानकारी हमें मिलती है? बहुत सारी चीजें आप इस घटनाओं से सिख सकते हो।

दूसरी बात, सन्दर्भ क्या है? आप इसको पढ़ सकते हो, उत्पत्ति 19 अध्याय में, जब उत्पत्ति की किताब 19 अध्याय आप पढ़ते हो वहाँ पर आपको एक घटना दिखाई देता है, एक कहानी आपको दिखाई देती है जहाँ पर बअब्राहम और लूत के बीच में बातचीत होती है और लूत जो है अपने लालसा के कारण जो चीज़ अच्छी दिखी उसी शहर में चले जाते। लेकिन जब हम बाइबल पढ़ते है, जो शहर को लूत ने चुना था "सदोम और अमोरा" वह जो पाप से भरा हुआ शहर है करके हम बाइबल में पढ़ते है तो ऐसा एक स्वार्थी मकसद ने लूत के स्वार्थी मकसद ने उसके आगे की जिंदगी को किस प्रकार बिगड़ा है।

आप 18,19 अध्याय में सब पढ़ेंगे, तो आपको पता चलेगा।

किस प्रकार लूत को जो है, वो शहर छोड़ना पड़ा, उस शरह को आग से जला दिया गया और असल में लूत ने अपने पत्नी को भी गवाँ दिया। इतना ही नहीं लूत जो है परमेश्वर के नजरों में धर्मी ठहरने के कारण परमेश्वर ने लूत और उसके परिवार को तो बचाया लेकिन उसके पत्नी को खो दिया। जैसे ही लूत उस शरह से बाहर आ गए, लूत ने पहली गलती की थी "(Selfishness) स्वार्थपरता" की जहाँ पर उन्होंने आँख से दिखने वाली जगहों को चुना और दूसरा स्वार्थ का काम : गलत काम उन्होंने क्या किया? उन्होंने वहाँ पर शराब पी लिया और नशीले पदार्थ का सेवन कर लिया।

जब हम बाइबल में जाते है तो हमें पता चलता है कि, नीतिवचन 20:1 वचन में सफ़ाई से पता चलता है कि ऐसे नशीले चीजों के बारे में बाइबल हमें क्या कहती?

"दाखमधु ठट्ठा करनेवाले और मदिरा हल्ला मचानेवाली है; जो कोई उसके कारण चूक करता है, वह बुद्धिमान नहीं (नीतिवचन20:1)।"

तो लूत ने यहाँ पर एक गलती की लेकिन वो गलती के बाद आगे क्या हुआ? आप पढ़ सकते हो, उत्पत्ति 19:30-33 तक, यहाँ पर एक घटना होती है वह घटना को हम पढ़ेंगे... "फिर लूत ने सोअर को छोड़ दिया, और पहाड़ पर अपनी दोनों बेटीयों समेत रहने लगा; क्योंकि वह सोअर में रहने से डरता था; इसलिए वह और उसकी दोनों बेटियाँ वहाँ एक गुफ़ा में रहने लगे (उत्पत्ति 19:30)।" तो यह जो सदोम और अमोरा के घटना के बाद लूत जो है डर कर अपने बेटियों के साथ वह पहाड़ पर रहने लगा। आगे पढ़ते है... "तब बड़ी बेटी ने छोटी से कहा, "हमारा पिता बूढ़ा है, और पृथ्वी-भर में कोई ऐसा पुरुष नहीं जो संसार की रीति के अनुसार हमारे पास आए। इसलिये आ, हम अपने पिता को दाखमधु पिला कर, उसके साथ सोएँ, जिस से कि हम अपने पिता के वंश को बचाए रखें। अतः उन्होंने उसी दिन रात के समय अपने पिता को दाखमधु पिलाया, तब बड़ी बेटी जा कर अपने पिता के पास लेट गई; पर उसने न जाना, (लूत ने न जाना) कि वह कब लेटी, और कब उठ गई (उत्पत्ति19:31-33)।"

अगर आप पूरा पढ़ते जायेंगे आपको सब से पहला वचन में यह पता चलता है कि लूत की बेटियों का (Assumption) कल्पना यानी कि वो ये सोच में आ गई कि हमारा पीढ़ी आगे नहीं बढ़ेगा। यह सब से पहली उनकी गलती थी, उन्होंने परमेश्वर के हवालें अपने भविष्य को देने के बजाय उन्होंने खुद निर्णय लिया, मान लिया कि कोई भी व्यक्ति बचा नहीं है, कोई भी पुरुष बचा नहीं है, उनको लगता है कि सदोम-अमोरा खत्म मतलब पूरी दुनिया खत्म कोई भी पुरुष नहीं है लेकिन वहाँ पर उन्होंने मान लिया करके यह बहुत बड़ी गलती की और खुद का निर्णय हाथ में ले लिया।

दूसरा (Assumption) कल्पना के साथ-साथ हमने पढ़ा था उन्होंने अपने पिता को क्या किया? दाखमधु पिलाया और ये जब दाखमधु पिलाया इससे हमें पता चलता है यदि लूत अपने होश में होते तो यह कार्य करने नहीं देते तो दूसरा वो कार्य करवाने के लिए उन बेटियों ने क्या किया है? लूत को दाखमधु पिलाया, दूसरा हुआ "(Deception) डिसेप्शन यानी कि उसको धोखा दिया।

पहला हुआ (Assumption) कल्पना, दूसरा हुआ (Deception) धोखा, फिर हुआ (Action) क्रिया, मतलब उसके साथ पाप हुआ और लूत को पता ही नहीं चला। तो मैं यह नही कह रहा हूँ कि लूत जो है इस पाप के लिए (Innocent) बेगुनाह है। लूत ने शराब पीकर ऐसे पाप का दरवाजा खुला कर दिया है उसके अनजाने में यह सब होने के लिए और उसके बाद क्या हुआ?
उसके बाद पाप होने के बाद उसके द्वारा मोआब और अम्मोन जैसे पीढ़ी पैदा हुईं। कुछ लोगों को लगता है इसके बाद कुछ नहीं हुआ? बिल्कुल नहीं!, यह भयंकर पाप के कारण जो पीढ़ी उनके बेटियों के द्वारा आगे आई मोआब और अम्मोन यह हमेशा परमेश्वर के प्रजा के विरुद्ध रहते थे, उनको परेशान करते रहते थे और उनका क्या हुआ घटना अगर आप पूरा घटना पढेंगे (न्यायियों 3:29,30) में, किस प्रकार मोआब जाति को ढाया जा रहा था, किस प्रकार उनको मिटाया जा रहा था, क्योंकि ऐसे पाप से निकलने वाले पीढ़ी का विनाश जो है वो होगा ही। उसके बाद क्या हुआ? यह जो गलत तौर पर जन्मी हुईं ये पीढ़ी है वह पीढ़ी न कि परमेश्वर के विरुद्ध रहने लगे बल्कि वह अन्य देवताओं के पीछे चलने लगे केमोश और मिल्क़ोन (1 राजाओं 11:33)।

तो दोस्तों, यहाँ पर हमें यह घटना से यह पता चल रहा है कि बाइबल बाप बेटी के बीच में गलत रिश्ता को बढ़ावा नहीं दे रहा है, एक घटना घटी है और उस घटना को वैसे ही दिखाया गया है और यह घटना से हम ईसाइयों को क्या सिख मिलता है? सब से पहले जैसे लूत ने किया वैसे यह दाखमधु का सेवन करने से हम जो है अपना संयम छोड़ देते है और गलत कामों के लिए हम अनुमति देते है।

दूसरा लूत की बेटीयों ने मान लिया उनको लगा कि कोई परमेश्वर हमें मदत करने वाला, हमें हमारा भविष्य का तय खुद करना पड़ेगा आज लोग भी यहीं सोचते है कि हमारा भविष्य हमकों ही बनाना है इसलिए वो खुद निर्णय लेते है। किस प्रकार का उन्होंने निर्णय लिया?  गलत तरीके का निर्णय लिया उसके पिता को दाखमधु पिलाकर उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने का गलत निर्णय लिया। आज जवान भाई-बहन या फिर बहुत सारे लड़के लड़कियाँ ऐसे ही गलत निर्णय लेते है सोचते है कि भविष्य में मैं मेरा क्या होने वाला है मुझे पता नहीं और वो खुद गलत निर्णय लेकर अपने आप को धोखे में  डालकर साथ में व्यक्ति को धोखे में डालकर गलत सम्बन्ध बनाती हैं और उनके द्वारा जो पीढ़ी निकलती है। जैसे लूत के बेटियों के लिए और परमेश्वर के जातियों के लिए हमेशा वह तकलीफ़ दायक रहा, वैसे हमारा निर्णय अगर परमेश्वर की महिमा से नहीं है, परमेश्वर के मर्जी से नहीं है, खुद के मर्जी से, गलत तरीके से अगर तिरछे नजर से निकलते हुए परिणाम होंगे तो हमारे जिन्दगी में हमेशा, दर्द तकलीफ़ होती आयेगी। यही ये घटनाओं से हमें सीखने को मिलता है।

एक और बात मैं आपको बताना चाहूँगा लूत की बेटीयाँ अपने पिता से लालसा करके, लालच करके या फिर शारीरिक सम्बन्ध काम वेदना बढ़कर यह शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाई; उनका गलत कल्पना था कि आगे हमारी पीढ़ी क्या होगी? ये घटना हमें समझना बहुत जरूरी है हमारे प्रिय भाई बहनों मैं वापस से एक बार ये चीज़ को स्पष्ट करना चाहूँगा। बाइबल बातों को वैसे ही अभिलेख करती है जैसे घटी थी वह हटाएगी नहीं चाहे पढ़ने वालों को गन्दा लगे या अच्छा लगे जो घटना घटी उसे वैसे ही (रिकॉर्ड) अभिलेख करती है ताकि उन चीजों देखकर हम सुधार ला सकते है। (2 तीमुथियुस 3:16) वचन में लिखा है कि बाइबल का हर एक वचन हमारे शिक्षा के लिये, ताड़ने के लिये, सुधारने के लिये, और हमारे धर्म की शिक्षा के लिये लिखी गई है और इन चीजों से क्या क्या सीख सकते है? मैंने आपको संक्षेप में बताया और विस्तार में पढ़ सकते है और जो मसीह विरोधी है इन गहराई को नहीं समझ सकते। लेकिन आशा करता हूँ आप समझ गए होंगे, दूसरों को भी समझाए, बाइबल की सुन्दरता को जानिए। अगर आपको अभी तक नहीं समझा है फिर से एक बार पढ़िए और वीडियो को देखिए और आपको समझने में आसानी होगी।

"बाइबल सुन्दर है उसे सुन्दर नजर के साथ देखों, क्योंकि जो पवित्र दिल से परमेश्वर के पास आते हैं वह परमेश्वर को दर्शन करता है और साथ-साथ परमेश्वर के शुद्ध वचनों को भी जानता है।"

प्रभु आप सभी को आशीष करें!

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मत्ती 5:29 का अर्थ क्या है?



यदि तेरी दाहिनी आँख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकालकर फेंक दे। (मत्ती 5:29)

अगर तेरा आँख तुझे लालसा दिखाता है, या फिर तुझसे पाप करवाता है तो तू क्या कर? अपना आँख को निकालकर फेंक दे, तू काना स्वर्ग में प्रवेश कर; लेकिन दो आँख के साथ नरक में प्रवेश मत कर, यह वचन लिखा है। और वचन में यह भी लिखा है, अगर तेरा हाथ तुझे पाप करने में मजबूर करता है तो क्या कर तू? उस हाथ को काट कर फेंक दे।

सच में इस वचन का अर्थ समझना है?
यहाँ पर यीशु मसीह यह बताने की कोशिश कर रहे हैं  कि अगर आप शरीर में एक कमी के साथ स्वर्ग सकते है, लेकिन वह कमी को घटाएँ बिना उसको वैसे ही परिपूर्ण रखकर पाप के साथ स्वर्ग में नहीं सकते उससे बेहतर आप नरक में चले जाओ।

यह यीशु मसीह का भयंकर शिक्षा है, वह बता रहे हैं कि एक पाप इंसान को किस प्रकार पुरे शरीर को लेकर वह क्या करेगा? नरक में चला जायेगा। उसका एक आँख ने पाप किया है ! किसने क्या पाप किया? वचन में क्या लिखा है? उसके एक आँख ने पाप किया लेकिन यह एक भाईसाहब के वजह से पूरा शरीर अंदर चला गया, दूसरा आँख बोलता है कि भाई तेरे गलती के वजह में भी अंदर, हाथ बोलता है मैंने तो कुछ नहीं किया, पैर बोल रहा है, दिल बोल रहा है मैंने तो कुछ नहीं किया; लेकिन वहाँ पर यह समझना ज़रूरी है जब एक अंग अपने आप को पाप के लिए सौंपता है, यह एक अंग दूसरे को कन्विंस कर ही लेता है।
इसीलिए यीशु मसीह ने कहा, कि अच्छा है तुम अपना आँख को निकालकर फेंक दो, तो कितने लोग फेंकने वाले है? अपने आँख को निकालकर?

क्योंकि सुबह से लेकर रात तक तो हमारे आँखो में क्या क्या स्कैनिंग होती है वह तो आप लोग अच्छे से जानते हैं। 
मोबाइल खुलते ही स्कैनिंग, रोड पर चलते ही स्कैनिंग, ऊपर से नीचे स्कैनिंग, आगे पीछे स्कैनिंग सब चालू रहता है। तो इस वचन का यह मतलब है "(This is Dangerous) यह बहुत ख़तरनाक है" आप क्या करो? या तो अपने आँख को सम्भालो या तो आँख को निकाल कर फेंको, तो यीशु मसीह यह कह  रहें है आँख को सम्भालने के लिए उतना मेहनत करो जहाँ पर आप  को निकालने की नौबत जाये।

वह आँख को निकालने का नौबत जाये; उतना हद तक अपने आपको क्या करो "सम्भाले रखो", और वचन में लिखा है,"तुमनें पाप से अपने आपको बचाए रखने के लिए खून नहीं बहाया है" (इब्रानियों12:4)

क्या हम ने कभी पाप से दूर भागने के लिए खून बहाया है? कि ब्रदर यह पाप मैं नहीं करना चाहता था लेकिन मैं खून बहाकर अपने आपको बचाना चाहता था लेकिन फिर भी वह पाप में गिर गया।

ऐसा कभी कोई पाप होते देखा क्या? ऐसा कोई है क्या?

बहुत कोशिश किया ब्रदर! इतना कोशिश किया इतना कोशिश किया मेरे आँख से खून के आँसू रहे थे फिर भी मैं सोचा कि, नहीं मैं देखूंगा नहीं, देखूँगा नहीं, मेरे  दोस्तों ने आकर मेरे आँखो के पर्दे को खींचकर मुझे दिखाया। ऐसा कभी होता है क्या?

"नहीं !"

यही वचन है, कि उतना हद तक मत जाओ जितना हद तक आपको अपने आँख को निकालना पड़े, उसके पहले ही आप क्या करो अपने आपको (कन्ट्रोल) नियंत्रण में रखो।

तो कुछ लोग बोलते है कि एकदम (Lofty Teaching) लॉफ्टी टीचिंग है, कुछ लोग इस शिक्षा का मज़ाक उड़ाते है जो गैर मसीही है, वह बोलते है कि ऐसा कैसा शिक्षा है?

लेकिन यहाँ पर क्या (डेंजर) भयंकर यीशु मसीह ने बताया है वह सिर्फ मसीही लोग समझ सकते है क्योंकि हम आत्मा से वचन को समझ रहे है।
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Video Content: Glory Apologetics
Transcription: Amarjeet S
Transcription Correction: Sushma Gupta

क्या यीशु भारत में आकर वेदों को सीखें?



क्या यीशु कश्मीर/भारत आए?

जय मसीह की भाई और बहनों मैं फ्रांसिस आप सभी का त्रिज्ञा परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह के नाम से स्वागत करता हूँ। यीशु मसीह एक ऐसे शख़्स हैं जिनके बिना सब कुछ अधूरा हैं : इतिहास अधूरा हैं, आत्मिकता अधूरा हैं, लोगों का प्रचार भी अधूरा हैं, क्यों मैं ऐसे कह रहा हूँ?? आप मुस्लिम को देखिए, उनके प्रचार में उनके दावा में उनको यीशु चाहिए। मोरमोंस को यीशु चाहिए, हरे कृष्णा वालों को भी यीशु चाहिए आजकल हर किसी को यीशु चाहिए क्योंकि यीशु के बिना सब कुछ अधूरा हैं और यह अच्छी बात हैं क्योंकि हमारा यीशु है युनिक, हमारा यीशु है, अलग हर कोई चाहेगा, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन कुछ लोग हैं वो यह कहते हैं और यह साबित करने की कोशिश करते हैं, कि यीशु भारत आए थे।

राहुल आर्या :  देखिए, जब आपके ईसा मसीह जीसस ने इस्त्राएल में जब गए यहाँ से भारत आने से का प्रचार करके .... वेदों का शिक्षा अध्ययन करके वहाँ पर प्रचार करने के लिए जब गए........।

यह हैं न! चौकाने वाली बात जी, आज इसी बात पर हम थोड़ा नजर डालेंगे और देखेंगे कि सच क्या है? आगे बढ़ने से पहले हमें जानना जरूरी हैं कि यह सोच कहाँ से सुरू हुआ होगा? यदि आप बाइबल पढ़ते हैं तो आपने एक चीज़ देखा होगा। जब यीशु मसीह का उम्र बारह होता हैं वो तब दिखाई देते हैं फिर उसके बाद सीधा वह तीसवें उम्र में जब वो बपतिस्मा लेते हैं जब सेवा सुरू करने के लिए वहाँ पर दिखाई देते हैं। तो बारह से लेकर तीस लगभग सतरा से अठारह साल यीशु मसीह का जिंदगी कैसा था? यीशु मसीह कहाँ गए थे? यीशु मसीह ने क्या किया? ये सवाल बहुत सारें लोगों के मन में आया और यह सवाल को ढूँढने के लिए सुरू कर दिया। शायद, आपके मन में भी यह सवाल आया होगा कि यीशु कहाँ गए थे? मेरे मन में भी यह सवाल आया था। तो सवाल गलत नहीं हैं लेकिन कुछ लोगों ने यह कहना सुरू कर दिया कि यीशु मसीह भारत आए थे और कश्मीर आए थे। क्यों आए थे?? घूमने के लिए जी नहीं, उनका कहना हैं कि यीशु मसीह भारतीय गुरुओं से, और संतों से शिक्षा लेने के लिए भारत आए थे। यीशु education शिक्षा के लिए भारत आए वो कहते कि यीशु मसीह ने भारतीय गुरुओं से, संतों से और बाबाओं से प्रवचन कैसे देना हैं वो सीखा, शास्त्र को सीखा, वेदों को सीखा, ज्ञान वाले बातों को सीखा और वो अपने प्रदेश लौटकर यहाँ पर जो वेद, शास्त्र, ज्ञान, प्रवचन सीखा। वहाँ पर अपने लोगों को सिखया और चेलों को भी सिखाया। क्या यह सच हैं?? क्या वाक़ई में यीशु मसीह भारत आए थे, कश्मीर आए थे?? क्या उन्होंने यहाँ पर जो शिक्षा ली थी। वेद-शास्त्र की वो अपने प्रदेश में सिखाए, चेलों को सिखाए थे। क्या बाइबल में वहीं लिखा हैं?? यह सारे सवालों को जवाब जो हैं हमे बाइबल में ढूंढा बहुत जरूरी हैं, हमें जानना जरूरी हैं इस विषय में बाइबल क्या कहती हैं??

तो, बाइबल के आधार पर मैं आपको पाँच कारण बताना चाहूँगा। जिससे साफ़ साबित होता हैं कि यीशु मसीह भारत नहीं आए थे, कश्मीर नहीं आए थे।

पहिला कारण: यहूदियों की प्रथा थी जो व्यक्ति जो भी व्यापार करता था अपने बेटों को वो सीखता था उदाहरण के तौर पर अगर कोई लकड़े का काम करता था, सुतार का काम करता था तो, अपने बेटों को वो सिखाता था। अगर आप मरकुस की किताब 6:3 और मत्ती की किताब 13:55 पढ़ते हैं, इससे हमें साफ़-साफ़  पता चलता हैं कि यीशु मसीह को जो हैं लोग एक बढ़ई के नाम से, एक सुतार के नाम से, काफी समय से पहचानते थे। अब यह  वचनों को पढ़के देखिये, उसमें साफ़-साफ़ लिखा हैं लोग यीशु को देखकर कहते हैं ये तो वही बढ़ई हैं न!, ये तो वहीं सुतार हैं न! ये युसुफ का बेटा हैं न! ये तो मरियम का लड़का हैं न! जो सुतार का बेटा हैं इसका भाई यह हैं, इसके रिश्तेदार यह हैं, तो वहाँ के लोग यीशु मसीह को बचपन से जानने के कारण आसानी से पहचान पा रहे हैं थे कि ये वहीं यीशु हैं न! तो पहिले पॉइंट में मैं आपको यह बताना चाहूँगा कि उस समय के लोग यीशु मसीह को बचपन से जानते थे और उसकी पहचान क्या है करके हम ने यह वचन में देख लिया इससे साफ़ साबित होता हैं कि यीशु मसीह कश्मीर नहीं आए यीशु मसीह भारत देश नहीं आए।

दूसरा कारण: दूसरी बात अगर आप लुका की किताब 4:16 पढ़ेंगे, उसमें आपको और भी सफ़ाई से पता चलेगा उसमें लिखा है रीति के अनुसार यानि कि हमेशा कि तरह यीशु मसीह भवन में गया। यह कैसे सम्भव हैं? अगर यीशु मसीह 12-30 उम्र यानी कि सतरा से अठारह साल उन्होंने अपना बचपन और थोड़ा-सा जवानी का समय भारत में बिताया होता। तो हमेशा की तरह भवन कैसा जा सकते थे?? सोचने वाली बात हैं और उसी वचन में लिखा हैं कि यीशु मसीह का पालन-पोषण जो हैं वो नासरत में हुआ तो ये वचन लुका 4:16 साफ़-साफ़ बताता हैं कि यीशु मसीह भारत नहीं आए कश्मीर नहीं आए। क्योंकि वो पले-बड़े पालन-पोषण वहीं पर था उनका नासरत में और हमेशा के जैसा वो नासरत में जाकर भवन में उपस्थित रहते थे।

तीसरा कारण: जब यीशु मसीह प्रचार कर रहे थे तो उस समय में जो लोग थे जो फरीसी लोग थे और बहुत सारें यीशु के विरोध करने वाले लोग थे। उन्होंने यीशु के ऊपर कई सारे इल्ज़ाम लगाए उन्होंने यीशु के ऊपर यह भी इल्ज़ाम लगाया कि तुम सब्त को तोड़ते हो परमेश्वर के विरोध बात करते हैं तुम ईश-निंदा करते हो, तुम्हारे अंदर शैतान की आत्मा है; ऐसे यीशु के ऊपर काफी सारे इल्ज़ाम लगे। लेकिन एक चीज़ आप देखिए, कि चारों सुसमाचार के किताब में ऐसा कोई भी इल्ज़ाम यीशु मसीह के ऊपर लगा नहीं कि तुम दूसरे प्रदेश के और दूसरे शास्त्र के शिक्षा को तुम यहाँ पर बाट रहे हो। तो, देखिए उनके विरोध करने वालों ने भी, कभी  उनको ये चीजों के ऊपर में इल्ज़ाम नहीं लगाया, दोष नहीं लगाया कि तुम भारत से सीखे हुए मंत्र को श्लोका को और ज्ञान को, और प्रवचन को यहाँ पर तुम बाटते हो करके, इससे साफ साबित होता हैं कि यीशु मसीह भारत भी नहीं आए यह मेरा तीसरा पॉइंट हैं।

चौथा कारण: अब यीशु मसीह के बारे में अगर आप देखोगे, तो यीशु मसीह पुराने नियम में तोरह में, भजन संहिता में और भविष्यद्वाक्ताओं के किताब में बहुत ही निपुण थे। आज के जमाने में स्कॉलर जो उस्ताद जो हैं पुराना नियम, इब्रानी ज़बान, तोरह और  भविष्यद्वाक्तायों की किताब को जाँचने के लिए सालों बिता देते हैं। लेकिन यीशु मसीह का जो ज्ञान था तोरह से और पुराने नियम से इतना ज्यादा था तो हमें सोचने में मजबूर करता हैं क्या वाक़ई में यीशु मसीह भारत में से शिक्षा लिए?? अगर यीशु मसीह भारत में से शिक्षा लिए तो भारत के वेद-शास्त्र में से कभी भी एक भी बात उन्होंने कोई भी वचन, कोई भी शास्त्र, कोई भी श्लोका मंत्रों को क्यों नहीं बोला?? क्यों यीशु मसीह के प्रचार में वो हमेशा पुराने नियम को ही संकेत करते थे पुराने नियम से ही बात करते थे। और मैं आपको ये चीज बताना चाहूँगा दोस्तों, कि ये जो यहूदी लोग है बहुत ही स्मार्ट हैं वो बहुत ही निपुण हैं वो आप किस तरीके से बात करते है उससे भी पहचान लेते हैं कि आप  कहाँ के हो। जब यीशु मसीह को पकड़के ले गए तो पतरस डर के भाग रहे थे (मत्ती 26:73)। तो, कुछ लोग खड़े थे तो उन्होंने सीधा पतरस को देखकर क्या कहा तुम्हारे बात करने के तरीके से हमको लगता है कि तुम उसके साथ हो देखो, कितने निपुण हैं वो, वो बात करने के तरीके से भी उनको पता चल जाता हैं। यदि यीशु भारत आए होते, सतारा-अठारह साल थोड़ा समय नहीं होता हैं दोस्तों, सतरा-अठारह में यीशु मसीह का बात करने का तरीका भी बदला होगा। यीशु मसीह पूरे के पूरे जो हैं वो यहूदियों का रीति-रिवाजों को वो करते आते थे पुराने नियम के बलिदानों को, पुराने नियम के त्याहारों को, फसल को सब अनुसरण करते थे लेकिन एक भी बार भारत देश में से सीखे हुए कोई भी कार्य को उन्होंने अनुसरण क्यों नहीं किया?? तो कहीं पर भी ऐसा प्रमाण नहीं हैं कि यीशु मसीह ने भारत में से शिक्षा लिया और वहाँ पर शिक्षा दिए कभी भी भारतीय वेद को उन्होंने संकेत नहीं किया यह मेरा चौथा पॉइंट हैं।

भारत का थोड़ा तो स्वाद होना चाहिए वहाँ पर जाने के बाद, कुछ भी नहीं हैं।

पाँचवा कारण: मैं आपको कहना चाहूँगा बढ़िया पॉइंट हैं, यीशु मसीह ने सिखाया परमेश्वर एक है जी हाँ, लेकिन भारत में जो गुरु हैं संत हैं उनका मानना क्या हैं भारत में तो तैतीस करोड़ परमेश्वर को मानते हैं।

कुछ लोग यह कहकर बहाना बनाएँगे तैतीस करोड़ नहीं तैतीस प्रकार हैं description में दिये लिंक का आर्गुमेंट साबित करता हैं तैतीस करोड़ ही हैं।

अभी हिन्दू खुद आपस में मिलकर निर्णय करें कितने है, चाहे कितने भी हो यीशु ने तैतीस करोड़ या तैतीस प्रकार के नहीं एक ही खुदा का प्रचार किया हैं।

भारत में गुरुओं और लोगों का मानना है कि खुदा ने कुदरत को बनाया कुदरत ही खुदा हैं आप भी खुदा हो सकते हैं तो यहाँ पर देखिए, खुदा का जो नजरिया है। परमेश्वर को जो जानने का ज्ञान हैं वो बिलकुल अलग नहीं हैं यहूदियों से परमेश्वर यीशु मसीह जो सीखाते थे वो अलग था और जो भारत देश के गुरु जो मानते हैं वो अलग हैं तो यह पाँच पॉइंट्स से मैं साफ साबित कर चुका हूँ, कि यीशु मसीह भारत देश में नहीं आए थे।

पहला पॉइंट यहूदी लोग और वहाँ के नासरत के लोग यीशु मसीह को पहचानते थे उनके व्यापार से और परिवार से।

दूसरा पॉइंट हमेशा की तरह यीशु मसीह भवन में जाया करते थे और उनका पालन-पोषण वहीं पर हुआ था।

तीसरा पॉइंट यीशु मसीह के दिनों में लोगो ने उनको बहुत सारे चीजों से दोष लगाया लेकिन कभी भी दूसरे प्रदेश के ज्ञान के बारे में शिक्षा देने के दोष में उनको कभी नहीं खड़ा किया।

चौथा पॉइंट यीशु मसीह हमेशा शास्त्र के नाम पर पुराने नियम से ही उन्होंने बाते बताई न कि दूसरे शास्त्र से, दूसरे वेद , दूसरे देश से।

पाँचव पॉइंट यीशु मसीह ने सिखाया एक परमेश्वर हैं लेकिन भारत के गुरु, संत मानते हैं कि बहत सारे खुदा हैं तैतीस करोड़ हैं आप भी खुदा बना सकते हैं मैं भी खुदा बन सकता हूँ।

क्यों यह झूठ फैल रहे हैं?? बाइबल हम पढ़ते हैं कि झूठो का पिता हैं कौन? शैतान हैं झूठ। वो चाहता है कि किसी भी हालत में हम रास्ता भटक जाये क्योंकि ये जितने भी लोग आकर कहते हैं यीशु नबी हैं, यीशु शैतान का भाई हैं और यीशु एक अच्छे शिक्षक हैं वो भारत आए थे कश्मीर गए थे तीबेत गए थे ग्रेकमिलियन  गए थे वो सारे चीज यह कहना चाहते हैं, कि यीशु एक व्यक्ति थे सिर्फ, नबी के रूप में, शिक्षक के रूप में, गुरु के रूप में लेकिन खुदा नहीं क्योंकि शैतान भी यहीं चाहता हैं कि आप अपना विश्वास छोड़ दे। जिस समय आप विश्वास छोड़ दोगे कि यीशु खुदा नहीं हैं करके उस समय शैतान का पूरा काम हो गया लेकिन हमारा परमेश्वर बहुत महान हैं उनका सत्य हमेशा अटल है उनका वचन हमेशा अटल है वो हमेशा अंधकार के ऊपर प्रबल होते हैं। और दोस्तों, अगर आपके मन में कभी भी ऐसा कोई भी सवाल आए तो आप तुरंत निर्णय न लीजिये आप बाइबल खोलिए, आप बाइबल को पढ़िये प्रार्थना कीजिये पवित्र आत्मा का सहायता   मांगिए। सारे झूठ दूर हो जाएँगे सत्य को जानिए और सत्य आपको छुड़ाएगा "यीशु ही खुदा हैं।"

पचास कारण पेश किया है यह साबित करते हुए कि यीशु ही खुदा है। आप उन पचास कारण को देखिए और सीखिए, लोगों को सिखाइए, सुसमाचार बांटिए।

"यीशु ही खुदा है" यीशु के अलावा उद्धार नहीं, पूरे आकाश में, निचे पृथ्वी में, कहीं पर भी यीशु के नाम के अलावा उद्धार नही है, और यह सत्य को जानिए। दोस्तों को बताइए यह सत्य आप को भी छुड़ाएगा, आपके दोस्तों को भी छुड़ाएगा।
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Transcription: Sushma Gupta
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