Showing posts with label Christian Living. Show all posts
Showing posts with label Christian Living. Show all posts

धन्य मनुष्य परीक्षा के मध्य स्थिर रहता है - याकूब 1:12- 16


धन्य मनुष्य परीक्षा के मध्य स्थिर रहता है - याकूब 1:12- 16


परिचय 


  • यह पत्री उन बारहों गोत्रों को लिखा लिखा गया था जो तित्तर बित्तर होकर रह रहे थे 

  • यह लोग अपने विश्वास के कारण विभिन्न परीक्षाओं का सामना कर रहे थे 

  • विभिन्न परीक्षाओं के कारण वह अस्थिर हो रहे थे 

  • विभिन्न परीक्षाओं का सामना वह परिपक्वता के साथ नहीं कर रहे थे 

  • याकूब उन्हें स्थिर होने के लिए प्रोत्साहन कर रहे हैं 


2 - 8 पद में याकूब विभिन्न परीक्षाओं के प्रति एक विश्वासी के स्वभाव के बारे में स्मरण दिलाते हैं। 

  • परीक्षा को आनंद की बात समझना 

  • परीक्षा के द्वारा हमारा विश्वास परखा जाता है 

  • परीक्षा के द्वारा धीरज का कार्य हमारे जीवन में पूरा होता है 

  • परीक्षा का सामना करने के लिए हमें परमेश्वर से बुद्धि मांगनी चाहिए

   

इन बातों को स्मरण दिलाने के बाद, याकूब यह समझाना चाहता है परीक्षा के मध्य स्थिर रहना क्यों आवश्यक है। सर्वप्रथम याकूब कहता है की एक धन्य मनुष्य की पहचान और परिचय यह है की वह परीक्षा के मध्य स्थिर रहता है। एक मनुष्य इसलिए धन्य नहीं कहलाता क्यूंकि वह भौतिक आशीषों से भरपूर है या फिर उसके जीवन में कुछ चिह्न - चमत्कार - चंगाई इत्यादि हुआ है। वह धन्य इसलिए भी नहीं है क्यूंकि उसके जीवन में कुछ बड़ा और अद्भुत कार्य हुआ है। वह अपने वैभव, बुद्धि, धन, ज्ञान इत्यादि के कारण भी धन्य नहीं है। इन सब के विपरीत वह धन्य इसलिए कहलाता है क्यूंकि वह विभिन्न परिक्ष्याओं के मध्य स्थिर रहता है। 


सच में, परमेश्वर के मूल्यांकन और मनुष्य के मूल्यांकन के मानक / पैमाने बिलकुल विपरीत है। हम में से अधिकांश लोग परमेश्वर के मूल्यांकन के मानक के अनुसार न तो सोचते हैं, न सीखने की इच्छा रखते हैं और न ही सिखाते हैं। हमारी सोच विकृत है, भ्रष्ट है, पापमय है और ईश्वरविरोधी है। परमेश्वर हमें सहायता करे और अनुग्रह दे की हम धन्य कहलाने के सही अर्थ को आज समझ सकें। 


तो परीक्षा के मध्य स्थिर रहने की आवश्यकता क्यों है?


विश्वासी परीक्षा के मध्य स्थिर रहेगा क्यूंकि यह परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम का प्रमाण है  (12)


परीक्षा के मध्य स्थिरता के कारण, हम खरे बनते हैं। यह मानक परमेश्वर ने ठहराया है। इससे कोई फरक नहीं पड़ता है की हम इस बारे में क्या विचार रखते हैं। सर्वज्ञानी परमेश्वर ने यही मानक ठहराया है खरा बनने के लिए। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प, उपाय, रास्ता नहीं है।      


परीक्षा के मध्य स्थिरता के कारण, हम मुकुट प्राप्त करते हैं। यहाँ पर यह बात महत्वपुर्ण नहीं है की इस मुकुट का वज़न कितना होगा, यह कैसा दिखेगा, किस रंग का होगा इत्यादि। मुख्य बात यह है की यह परीक्षा में स्थिर रहने का प्रतिफल होगा। यह एक निश्चित प्रतिफल होगा क्यूंकि यह प्रभु की प्रतिज्ञा है। यह झूटी, मनगढंत, भरमानेवाली बात नहीं है। यह सर्वशक्तिमान - संप्रभु - अटल - अनंत - जीवित - पवित्र परमेश्वर की प्रतिज्ञा है। मुकुट की सुंदरता हमारा प्रोत्साहन नहीं है, वरण इस प्रतिज्ञा की अटलता और आश्वशान्ता हमारा प्रोत्साहन है।  


परीक्षा के मध्य स्थिरता, परमेश्वर के प्रति हमारे प्रेम का प्रमाण है। परीक्षा में स्थिर रहना, उसके द्वारा खरा बनना, खरा बनने के कारण मुकुट प्राप्ति की प्रतिज्ञा पाना एक मनुष्य को परमेश्वर से प्रेम रखने वाला ठहराता है। परमेश्वर को इस प्रकार से प्रेम करने वाले के लिए यह प्रतिज्ञा है की उसे मुकुट मिलेगा। परमेश्वर से प्रेम रखने वाला - इसकी परिभाषा बनाने का अधिकार केवल परमेश्वर के पास है। हम अपने मन से, इच्छा से, बुद्धि से इसकी परिभाषा नहीं बना सकते। परमेश्वर ने उससे प्रेम रखने वालों के लिए जो परिभाषा ठहराया है वह यह है की वह मनुष्य परीक्षा में स्थिर रहेगा; वह अपनी खराई का प्रमाण परीक्षा में स्थिर रहने के द्वारा देगा।


विश्वासी परीक्षा के मध्य स्थिर रहेगा क्यूंकि अस्थिरता पाप और मृत्यु को लेकर आता है (13-16)


परीक्षा के उद्देश्य का अस्वीकरण शैतान को अवसर देता है की वह हमें बुरी अभिलाषा से प्रलोभित कर सके। परीक्षा के समय अब्राम का मिस्र देश को चला जाना (उत्पत्ति 12:10), इस्राएलियों का परीक्षा के समय कुड़कुड़ाना (निर्गमन 15:23-24)। परीक्षा का जीवन में आना बुरा नहीं है पर परीक्षा से बाहर निकलने के लिए या उसका सामना करने के लिए गलत रास्ता / उपाय का प्रयोग करना बुरा है और पाप है। परमेश्वर पर भरोसा न करना मूर्खता है। शैतान हमारी इस मूर्खता का लाभ उठाता है और हमें गलत उपाय का प्रयोग करने के लिए प्रलोभित करता है। यह वह बुराई है जिसके विषय में याकूब चेतावनी दे रहा है। यह बुरी अभिलाषा के विषय वस्तु अलग अलग हो सकते हैं पर उसका उद्देश्य यह होता है की हमें परीक्षा में अस्थिर बना दे। यीशु के जीवन में हम देखते हैं की शैतान कैसे यीशु को बुरी बातों / उपाय से प्रलोभित कर रहा था जब यीशु 40 दिन और रात के उपवास के बाद भूखा हो गया था (लूका 4:1-12)।


परीक्षा में बुरी अभिलाषा से प्रलोभित होना हमें धोखा देता है, बहला देता है और पाप में गिराता है। प्रलोभन एक जाल के सामान है जिसे हम देख नहीं सकते हैं। वह सतही स्तर में लाभदायक, अच्छा और सही दीखता है लेकिन अंत में वह बुराई लेकर आता है और हमें मृत्यु तक ले जाता है। वह इस सच्चाई से हमें वंचित करने का प्रयास करता है की परीक्षा हमारे विश्वास को परिपक्व करने के लिए और हमारी भलाई के लिए है। परमेश्वर की उस प्रतिज्ञा से हमें वंचित रखने का प्रयास करता है की वह हमें प्रतिफल में एक मुकुट देगा। 


निष्कर्ष 

  • हमें परीक्षाओं से भागने या बचने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 

  • हमें स्मरण रखना है की परीक्षा का उद्देश्य हमारे भले के लिए है। 

  • परीक्षा में स्थिर रहना एक धन्य मनुष्य का परिचय है। 


Article by Ps Monish Mitra

कैसे विश्वास पश्च्याताप की ओर ले जाता है


कैसे विश्वास पश्च्याताप की ओर ले जाता है

परिचय
    अगर "विश्वास" शब्द के बारे में लोगों को पूछा जाए, तो हमें भिन्न और अलग प्रतिक्रियाएं मिलेंगी। किसी व्यक्ति का विश्वास कोई मनुष्य के ऊपर होगा तो किसी और का किसी और मनुष्य के ऊपर। कोई कहेगा की वह किसी ख़ास विचारधारा पर विश्वास करते हैं, कोई कहेगा की वह खुद पर विश्वास करता है। लेकिन बाइबिल के सन्दर्भ में सोचा जाए, तो कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने आते हैं। क्या विश्वास से जुड़े लोगों के भिन्न सोच और मान्यताएं उन्हें पश्च्याताप की और लेकर जा सकते हैं? विश्वास में क्या विशेषताएँ होनी चाहिए, जिसके द्वारा विश्वास एक मनुष्य को पश्चाताप की ओर लेकर जाता है? इस लेख में हम विश्वास के उन विशेषताओं को देखेंगे जो हमें पश्याताप की और लेकर जाता है।

यीशु मसीह पर विश्वास
            यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है की हमारा विश्वास किस पर है ? पश्च्याताप के लिए हमारे विश्वास का आधार कौन है? अक्सर लोग अपने आवश्यकताओं की पूर्ति, इच्छाओं की पूर्ति, भौतिक विषयों के सन्दर्भ में किसी पर विश्वास करने के बात करते हैं। यह विश्वास इस पृथ्वी पर उनके जीवन काल से सम्बंधित बातों पर केंद्रित होता है। पर यहाँ, हम किसी भौतिक वास्तु की प्राप्ति के लिए विश्वास की बात नहीं कर रहे हैं पर पश्चाताप के सन्दर्भ में विश्वास की बात कर रहे हैं। इसीलिए, स्वयं पर विश्वास, मनुष्यों द्वारा बनाये गए विचारधाराओं पर विश्वास इत्यादि हमें पश्चाताप की ओर लेकर नहीं जा सकता है। पश्चाताप के लिए हमारा विश्वास यीशु मसीह पर होना चाहिए और यीशु मसीह का जन्म इसलिए हुआ क्योंकि वह अपने लोगों को उनके पापों से छुटकारा / उद्धार देने आया था (मत्ती 1:21) और वह हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है (1 यूहन्ना 1:9)। तो यीशु मसीह में क्या विशेषताएं हैं जिन पर विश्वास करना हमें पश्चाताप की ओर ले जाएगा?

यीशु के जीवन पर विश्वास
        यीशु को संसार में देहधारी होकर (यूहन्ना1:18) आने की क्या आवश्यकता थी ? इसको समझना बहुत आवश्यक है। बाइबिल हमें अपनी वास्तविकता और पहचान के बारे में स्पष्टता से अवगत कराती है। अधिकांश लोग सोचते हैं की वह अच्छे हैं, वह भले लोग हैं, सच्चे हैं इत्यादि। पर बाइबिल इसके विपरीत बात हमारे सामने लेकर आती है। हम सब पापी हैं (रोमियों 5:17a), परमेश्वर की महिमा से रहित हैं (रोमियों 3:23), पाप में मरे हुए हैं (इफिसियों 2:1)। परमेश्वर का क्रोध हम पर बना हुआ है (इफिसियों 2:3b) और इसीलिए हम पिता परमेश्वर से दूर हैं। इसी कारण से यीशु संसार में आया क्योंकि वह पापियों को बचा सके। वह इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा टहल करी जाए, परन्तु इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे और बहुतों की छुडौती के लिये अपने प्राण दे (मत्ती 20:28)। जब हम अपनी वास्तविकता से अवगत होते हैं तो हम समझते हैं की यीशु इस संसार में क्यों आया। वह अपनी व्यक्तिगत इच्छा के कारण, अपने किसी मनोरंजन के लिए नहीं आया। हमारे जैसे पापी मनुष्यों के छुडौती के लिये अपने प्राण को देने आया था। अब, अपने वास्तविकता की सच्चाई और यीशु का संसार में आने के कारण को जानने के बाद हम उसपर विश्वास करते हैं और यह हमें पश्च्याताप की ओर ले जाता है।

यीशु मसीह के कार्य पर विश्वास
        यीशु मसीह के कार्य पर विश्वास का अर्थ क्या है ? क्या हम यीशु के द्वारा किये गए चंगाई और चमत्कार पर विश्वास करने की बात कर रहे हैं ? नहीं। यहाँ, यीशु मसीह के कार्य पर विश्वास करने का अर्थ पिता परमेश्वर के प्रति यीशु का संपूर्ण और सिद्ध आज्ञाकारिता से भरे जीवन पर, हमारा विश्वास करना दर्शाता है (फिलिप्पियों 2:8, रोमियों 5:18)। यीशु का पिता परमेश्वर के प्रति यह सिद्ध और संपूर्ण आज्ञाकारिता उसका वह कार्य है जिसपर हमें विश्वास करना है क्योंकि यह विश्वास हमें पश्चाताप की ओर ले जाएगा। अपनी इस आज्ञाकारिता के कारण यीशु हमारे लिए वह निष्पाप, सिद्ध बलिदान बन पाया जिसके द्वारा हमारे पाप क्षमा हुए (1 पतरस 1:18, इब्रानियों 9:14)। यीशु का यह महान बलिदान हमें यह अवगत करता है की यीशु ने हमारे लिए जो किया वह हम अपने लिए नहीं कर सकते थे। हम पापी थे और परमेश्वर के क्रोध को शांत नहीं कर सकते थे। हमारे निमित यीशु वह बलिदान बना जिससे परमेश्वर का क्रोध शांत हुआ। अब, हमारे उद्धार के निमित यीशु के सिद्ध और संपूर्ण आज्ञाकारिता से भरे जीवन के महत्व को जानने के बाद हम उसपर विश्वास करते हैं और यह हमें पश्च्याताप की ओर ले जाता है।

निष्कर्ष
हमें यह स्मरण रखना होगा की यीशु क्यों इस संसार में आया ओर उसने इस संसार में रहकर कैसा जीवन जिया। वह यह सब केवल हमारे प्रति अपने प्रेम को दर्शाने के लिए किया। ओर इसका सबसे उत्तम प्रतिउत्तर यह होगा की हम उसपर विश्वास करें जिसके फलस्वरूप हम पश्च्याताप कर सकेंगे।

- Ps Monish Mitra

विश्वास से भटकने के चार कारण


परिचय

स्थानीय कलीसिया में एक रखवाले / उपदेशक / प्राचीन की भूमिका में सुसमाचार का प्रचार करना और पवित्र शास्त्र से शिक्ष्या देना एक बड़ी ज़िम्मेदारी होती है। इस सेवकाई के फलस्वरूप जब हम यह गवाही सुनते हैं की किस प्रकार सुसमाचार के प्रचार के द्वारा लोगों ने अनंत जीवन को पाया तो यह एक बहुत आनंद का विषय होता है। पर एक सच्चाई यह भी है की कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो विश्वास से पीछे हट जाते हैं जब उनके जीवन में दुःख, तकलीफ और परीक्षा आती हैं। वह मसीह संगति त्याग देते हैं और अपने पुराने जीवन में लौट जाते हैं। मत्ती 16:13-15 में हम यह पाते हैं की केसरिया फिलिप्पी के देश में लोग यीशु के बारे में अलग-अलग विचार रखते थे। कितने तो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला कहते थे और कितने एलिय्याह, और कितने यिर्मयाह या भविष्यवक्ताओं में से कोई एक कहते थे। पर यीशु ने अपने चेलों से कहा; "परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?"

यीशु कौन है? - जब तक हम इसकी सही समझ के आधार पर अपने विश्वास का अंगीकार नहीं करते, हम विश्वास से भटक जाएंगे। सामान्य तौर पे, लोगों का यीशु के बारे में चार भ्रम / गलतफ़हमी होता है भले ही वह अपने आप को विश्वासी कहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे अपने जीवन में क्लेश, परीक्षा और कठिन समय में विश्वास से भटक जाते हैं। इस लेख के माध्यम से हम उन चार बातों पर विचार करेंगे।

1. यीशु, परमेश्वर तक पहुँचने के अनेक रास्तों में से एक है या स्वर्ग तक पहुँचने के अनेक तरीकों में से एक है।
इस संसार में बहुत सारे लोग धार्मिक बहुलवाद / अनेकवाद विचारधारा रखते हैं। आस्था वादी होने के कारण वह स्वर्ग भी जाना चाहते हैं। धार्मिक बहुलवाद / अनेकवाद विचारधारा रखने वाले यह आस्था वादी लोग ईसाई धर्म को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। अनेक धर्मगुरुओं में से वह यीशु को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। शायद वह यीशु की नम्रता या सादगी या निष्कपटता से बहुत प्रभावित हुए हैं। इसलिए वे यीशु का अनुसरण करना चाहते हैं और उसपर विश्वास करते हैं। उन्होंने कभी भी यीशु के उन विशिष्ट दावों पर भरोसा नहीं किया जिसका उल्लेख यीशु ने यूहन्ना 6:48, 8:12, 10:9,11, 11:25, 14:6, 15:1 में किया था। वे प्रेरितों की शिक्षाओं पर भरोसा नहीं करते हैं जिन्होंने लिखा है कि स्वर्ग के नीचे कोई दूसरा नाम नहीं है जिसके द्वारा मनुष्य उद्धार पा सकता है (प्रेरितों के काम 4:12), परमेश्वर और मनुष्य के बीच केवल एक बिचवई है (1 तीमुथियुस 2:5)। इन बातों को गंभीरता से न लेने के कारण ऐसे लोग जीवन में क्लेश, परीक्षा और कठिन समय में विश्वास से भटक जाते हैं। जब तक किसी व्यक्ति का यीशु के प्रति समझ, उस पर विश्वास और अंगीकार यीशु के विशिष्ट दावों पर आधारित नहीं है, तब तक उनका विश्वास और अंगीकार केवल सतही है और वह अंततः विश्वास से भटक जाएंगे।

2. यीशु के पीछे चलने से हमें पृथ्वी पर एक आरामदायक और अच्छा जीवन मिलेगा।
बहुत से ऐसे लोग हैं जो पृथ्वी पर एक आरामदायक जीवन की तलाश में हैं। वे किसी ऐसे अगुवा की तलाश में हैं जो उन्हें इस धरती पर एक आरामदायक जीवन दे सके। हो सकता है कि इस वजह से वे उन चंगाई, चिन्हों और चमत्कारों से आकर्षित भो गए जो यीशु ने पृथ्वी पर रहते हुए लोगों के मध्य किया था। इसके आधार पर वे मानते हैं कि यदि वे यीशु को अपने जीवन में स्वीकार करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं तो यीशु भी उनके जीवन में ऐसे चंगाई, चिन्ह और चमत्कार करेंगे और उन्हें भौतिक आशीष प्रदान करेंगे जिनकी उन्हें आवश्यकता है। वे जीवन के बारे में चिंतित हैं और चाहते हैं कि यीशु उन्हें चिंताओं से मुक्त जीवन देंगे जहाँ आराम और शांति होगी। वे यह देखने में विफल जो जाते हैं कि यीशु ने हमें चिंता करने के बजाय अपने जीवन की आवश्यकताओं के लिए नियमित रूप से उस पर भरोसा और निर्भर रहने के लिया कहा है (मत्ती 6:11, 25-34)। ऐसा न करने के कारण वह जीवन के क्लेश, परीक्षा और कठिन समय में विश्वास से भटक जाते हैं। यीशु के जीवन को देखें तो हम पाते हैं की यीशु ने विलासमय जीवन नहीं जिया परन्तु वह स्वर्ग से उतरकर आया और परमेश्वर पिता की योजना को पूरा करने के लिए संपूर्ण आज्ञाकारिता और पिता परमेश्वर की निर्भरता में रहा (फिलिप्पियों 2:7-8)। यदि कोई व्यक्ति केवल चिंता मुक्त जीवन का आनंद लेने के लिए यीशु पर अपना भरोसा रखना चाहता है पर वह यीशु पर दैनिक रूप से निर्भर होकर जीना नहीं चाहता है, वह अंततः विश्वास से भटक जाएंगे।

3. यीशु जो भला और प्रेमी है, मेरे जीवन में पीड़ा या बुराई को होने नहीं देगा।
कुछ ऐसे लोगों का समूह भी है जो इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकते कि मसीह जीवन में दुख भी शामिल होता है। हो सकता है कि वे सोचते हों कि चूंकि यीशु ने हमारे लिए क्रूस पर दुख उठाया है, इसलिए हमें इस जीवन में न तो दुखों को सहना है और न ही दुखों का सामना करना है। वे दुखों से भयभीत हो जाते हैं और मसीह के लिए कष्ट सहने से हिचकिचाते हैं। वे मानते हैं कि बाइबिल में दिए गए कुछ वचनों का दावा और घोषणा करना उन्हें दुखों और बुराई से प्रतिरक्षा करता है। वे यीशु द्वारा निर्धारित शिष्यता की माँगो को अनदेखा करते हैं जहाँ यीशु स्पष्ट करता है कि जब हम प्रतिदिन क्रूस उठाकर चलेंगे और उसका अनुसरण करेंगे, तो लोग हमें घृणा करेंगे, उसके लिए हम सताए जाएंगे (लूका 14:27, मत्ती 5:11, यूहन्ना 17:18,20)। वे प्रेरितों के उन शिक्षाओं को भी नज़रअंदाज़ करते हैं जहाँ प्रेरितों ने यह स्पष्ट कर दिया कि दुख और कष्ट हमारे विश्वास का एक हिस्सा है जिसे हमें सहना है और इन कष्टों और दुखों के पीछे परमेश्वर का एक उद्देश्य है जैसा कि 1 पतरस 1:6-7, 4:1, 5:10, 2 तीमुथियुस 3:12, याकूब 1: 2-4, 12, रोमियों 5:3-5, 2 कुरिन्थियों 1:3-4 में लिखा गया है। यदि कोई व्यक्ति यीशु के लिए कष्ट सहना नहीं चाहता है, एक स्वार्थी रवैया रखता है और दुःख-पीड़ा रहित मसीह जीवन जीना चाहता है वह अंततः विश्वास से भटक जाएगा।

4. यीशु हमें अपनी इच्छानुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है क्योंकि अब हम व्यवस्था के अधीन नहीं हैं परन्तु अनुग्रह के अधीन हैं।
कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मसीह का अनुसरण करना चाहते तो हैं, लेकिन वे जवाबदेह नहीं ठहराया जाना चाहते हैं। वे नहीं चाहते हैं की उन्हें कोई सुधारे, अनुशासित करें और न ही कोई उन्हें कुछ सिखाए। वे इस धारणा रखते हैं कि उन्हें मसीह ने स्वतंत्र ठहरा दिया है। इसलिए उनसे बिना कोई पूछताछ और जवाबदेही के अपनी स्वतंत्रता का आनंद लेने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि वे अनुग्रह के अधीन हैं। हाँ, यह सच है कि हम मसीह के द्वारा स्वतंत्र किए गए हैं, परन्तु यह लोग इस तथ्य को पसंद नहीं करते कि अब हम मसीह में धार्मिकता के दास बन गए हैं (रोमियों 6:18)। वे इस सच्चाई को पसंद नहीं करते हैं कि अनुग्रह के अधीन होने का मतलब यह नहीं है कि अब हम एक अनियंत्रित जीवन, जवाबदेह रहित जीवन जी सकते हैं और जो चाहे वह कर सकते हैं। हम अनुग्रह के अधीन हैं और हम मसीह की देह (स्थानीय कलीसिया) का भी भाग हैं जहाँ हम संगी विश्वासियों के साथ जुड़ते हैं और आत्मा के द्वारा परमेश्वर का निवास स्थान होने के लिये एक साथ बनाए जाते हैं (इफिसियों 2:19-22)। पवित्र शास्त्र के द्वारा उपदेश पाना, समझ प्राप्त करना, सुधार प्राप्त करना, और धर्म की शिक्षा पाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए (2 तीमुथियुस 3:16-7)। वास्तव में अनुग्रह के अधीन होना हमें मसीह में हमारे चाल चलन के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाता है। हमें अपने जीवन में पवित्रीकरण और पवित्रता का अनुसरण करना चाहिए (रोमियों 12:1, 1 कुरिन्थियों 6:19, 2 कुरिन्थियों 7:1, इफिसियों 5:3, 27, 1 थिस्सलुनीकियों 4:7, 1 पतरस 1:15-16)। यह तब नहीं हो सकता जब तक हम अनुग्रह के बहाने एक मनमर्जी का जीवन जीने की स्वतंत्रता चाहते हैं। यदि कोई व्यक्ति पूर्ण स्वतंत्रता चाहता है, उसके पास सीखने की प्रवृत्ति नहीं है, उसे अधीनता, जवाबदेही पसंद नहीं है पर वह मसीह का अनुसरण करना चाहता है, वह अंततः विश्वास से भटक जाएगा।

निष्कर्ष
भाइयों और बहनों, हमें यह याद रखना होगा कि एक व्यक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण और जरूरी है कि वह मसीह के बारे में क्या सोचता है, समझता है और स्वीकारता है। यदि उसका अंगीकार मसीह के बारे में एक ऐसी सतही समझ पर आधारित है जो उसके अनुकूल है, उन्हें लाभ और फ़ायदा पहुँचाता है, उनके लिए सहज और आसान जान पड़ता है, वह अंततः विश्वास से भटक जाएंगे। जब भी हम सुसमाचार को बताते हैं, आइए इसे बहुत स्पष्ट करें और लोगों को समझाएं कि यीशु कौन हैं, उसके विशिष्ट और अनोखे दावे क्या हैं और शिष्यता के जीवन में हमसे यीशु का क्या मांग है। यह सच है कि क्रूस का संदेश लोगों को असहज करेगा, लोग इस सुसमाचार को पसंद और प्रेम नहीं करेंगे। यह बहुतों के लिए ठोकर का कारण होगा, जिसे बहुतों ने ठुकरा दिया है, लेकिन सच्चाई तो यह है की हर एक विश्वास करने वाले के लिये यह उद्धार के निमित परमेश्वर की सामर्थ है।

Ps Monish Mitra

Four Common Reasons "Why People Fall Away In Faith"

The ministry of preaching and teaching from the Scriptures as a Pastor, Elder in the Local Church brings us moments of joy & happiness when we hear testimonies of people whose lives have been transformed by the Gospel. However, there are times of sorrow and grief when we hear of people who have fallen back, turned back to their former religion and some have rejected the faith who once had confessed their faith in Christ. In the region of Caesarea Philippi, the people were having different views on Jesus such as John the Baptist; others say Elijah; and still others, Jeremiah or one of the prophets. Jesus asked His disciples "Who do you say I am?" (Matthew 16:13-15).

Unless we have made a profession/confession of faith based on the correct understanding of who Jesus is, we will fall away. 

Let’s consider particularly four common misunderstandings that people have about Jesus even though they confess their faith in Jesus. This results in their falling away at a later stage of their life. 

1. Jesus is one of the ways of reaching God or one of the many ways to heaven. 

There are many people in this world who have a desire to go to heaven but they believe in religious plurality. Christianity is their favorite religion and Jesus is their favorite religious leader. Maybe they liked the humbleness or the simplicity or the honesty of Jesus and therefore they wanted to follow Jesus and confessed their faith in Jesus. They had never put their trust in the exclusive claims of Jesus which Jesus mentioned in John 6:48, 8:12, 10:9,11, 11:25, 14:6, 15:1. They don’t trust the teachings of the Apostles who wrote that there is no other name under heaven by which man can be saved (Acts 4:12), there is only one mediator between God and man (1 Timothy 2:5); therefore they fall away. Unless a person’s understanding and confession about Christ is not based on these exclusive claims, then the person’s faith & confession is superficial and he will eventually fall away. 

2. Following Jesus will help us to have a comfortable and good life on earth. 

There is also another group of people who are looking for a comfortable life on earth. They are looking for someone who can give them that comfortable life on this earth. Maybe they are attracted by the healings, signs, wonders, and miracles that Jesus did while on earth. Based on that they assume that if they confess & follow Christ then Jesus would also do such wonders and miracles in their lives and provide them the comfort and materialistic blessings they need. They are worried about life and want Jesus to give them a life free from worries. They fail to observe that Jesus emphasized trusting and depending on Him on a regular basis for the necessities of life instead of worrying (Matthew 6:11, 25-34) therefore they fall away. Even Jesus didn’t lead a luxurious life; rather He came down from heaven and lived in complete obedience, dependence on God the Father in order to fulfill the plan of redemption (Philippians 2:7-8). If a person just wants to put his trust in Jesus to enjoy a life free of worry and doesn’t want to live trusting and depending on Christ on a daily basis, he will eventually fall away. 

3. The good and loving Jesus wouldn’t allow suffering or bad things in my life. 

Then there is this group of people who can’t accept the fact that Christian life includes suffering also. Maybe they think that since Jesus has suffered for us on the cross we do not have to endure or face suffering in this life. They are afraid and hesitant to endure hardships for Christ. They assume that claiming and declaring few scriptures will make them immune from suffering. They neglect the demands of discipleship laid down by Jesus where He makes it clear that we have to take up our cross and follow Him, will be hated for His name, we will be persecuted for His sake (Luke 14:27, Matthew 5:11, John 17:18,20,). They neglect the writings of the Apostles who made it very clear that suffering is a part of our faith which we have to endure and God has a purpose behind these sufferings & trials as mentioned in 1 Peter 1:6-7, 4:1, 5:10, 2 Timothy 3:12, James 1: 2-4, 12, Romans 5:3-5, 2 Corinthians 1:3-4. If a person doesn’t want to endure suffering for the sake of Jesus and has a selfish attitude where he wants to be free of suffering and trails in Christian life, he will eventually fall away.

4. Jesus gives us the freedom to do everything, we are no more under the law but we are under grace. 

There is still this group of people who want to follow Christ, but they do not want to be held accountable. They don’t want to be corrected, disciplined, and taught. They live under an assumption that they have been set free by Christ and so they should be allowed to enjoy the freedom without being questioned or being held accountable since they are under grace. Yes, it’s true that we are set free by Christ but they don’t like the fact that now in Christ we have become slaves to righteousness (Romans 6:18). They don’t like the fact that being under grace does not mean that we are to live uncontrolled lives just as we want. We are under grace and we are also part of the body of Christ (the Local Church) where we are joined together with fellow believers and being built together (Ephesians 2:19-22). We are supposed to be taught, rebuked, corrected, and trained in righteousness from the Holy Scriptures (2 Timothy 3:16-7). In fact, being under grace makes us more responsible towards our walk in Christ. We are supposed to pursue sanctification & holiness in our lives (Romans 12:1, 1 Corinthians 6:19, 2 Corinthians 7:1, Ephesians 5:3, 27, 1 Thessalonian 4:7, 1 Peter 1:15-16) and that can’t happen if we expect the freedom to do whatever we want under the excuse of being under grace. If a person wants absolute freedom, doesn’t have a learning attitude, doesn’t like submission, accountability but wants to follow Christ, he will eventually fall away.

Brothers and Sisters, let’s be reminded that it’s very important and crucial for a person that what he thinks, what he understands, and confesses about Christ. If his confession is based on such superficial understanding about Christ that suits him, benefits him, comfortable for him, easy for him, etc, he will eventually fall away. As we share the Gospel, let’s make it very clear and explain to people that who Jesus is, what are His claims, what are His demands. It’s true that the message of the Cross will be offensive, people will not like & love it. It will be a stumbling block for many, rejected by many but to those whom God has called Christ is the power of God and wisdom of God.


Amen!

Ps Monish Mitra

Click Here For More Articles


सुसमाचार - प्रतिज्ञा - आश्वासन

उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता है, यदि उस सुसमाचार को जो मैं ने तुम्हें सुनाया था स्मरण रखते हो; नहीं तो तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ। 1 कुरिन्थियों 15:2

मनुष्यों के उद्धार के निमित, परमेश्वर की और से दिया गया प्रकाशन "सुसमाचार" है। सुसमाचार वह एकमात्र सन्देश है जिसके द्वारा मनुष्य उद्धार को पा सकता है। इसीलिए सुसमाचार को समझना, थामे रहना और उसके अनुकूल अपने जीवन को जीना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए, उसे समझना चाहिए और उसकी समझ में बढ़ना भी चाहिए। अगर सुसमाचार को लेके हम गलती करते हैं, उसे गलत तरीके से समझते हैं और दूसरों को समझाते हैं, उसका गलत अर्थ निकलते हैं तो फिर हम उद्धार के समझ में एक संपूर्ण गलत दिशा में चले जाते हैं। पवित्र शास्त्र हमें उद्धार के भूत काल, वर्तमान काल और भविष्य काल के बारे में सिखाता है और 1 कुरिन्थियों में यह खंड उद्धार के वर्तमान काल के पहलु को दर्शाता है। 

भूत काल - जब परमेश्वर का अनुग्रह हमारे ह्रदय को परिवर्तन करता है, हमें पाप के दोष और दंड से बचाता है, हमें धर्मी ठहराता है। 

वर्तमान काल - जब हम पवित्रता में आगे बढ़ते रहते हैं, यीशु के चरित्र में बढ़ते रहते हैं, परीक्षा - क्लेश - ताड़ना का अनुभव करते हुए परिपक्वता में बढ़ते रहते हैं।  

भविष्य काल - यह हमारा महिमा करण है, जहाँ हम पाप की उपस्थिति से, प्रभाव से और समर्थ से आज़ाद हो जाते हैं। 

उद्धार के बारे में इन सब बातों को पढ़ने के बाद सवाल यह उठता है की मनुष्य क्यों इस उद्धार के समाचार को / सुसमाचार को गंभीरता से नहीं लेता है ? अगर सुसमाचार उद्धार के निमित परमेश्वर का सामर्थ है, तो फिर मनुष्य इस सामर्थ के प्रति आकर्षित क्यों नहीं होता है ? मनुष्य की इच्छा क्यों सांसारिक बातों में केंद्रित हैं ? और अगर वह सुसमाचार के प्रति आकर्षित होते भी हैं, ग्रहण करना चाहते भी हैं तो फिर क्यों उनकी सोच यह होती है की सुसमाचार उन्हें संसार में क्या लाभ दे सकता है?

सर्वप्रथम कारण यह है की प्रचारक अपने प्रचार में परमेश्वर के न्याय के बारे में गंभीरता से प्रचार नहीं करते, परमेश्वर के न्याय से, क्रोध से, दंड से बचने की आवश्यकता को उजागर नहीं करते हैं। इसीलिए लोगों को इन सच्चाइयों के अपेक्ष्यकृत संसार में जीवन के अभिलाषाओं की पूर्ति होने की आवश्यकता और जरूरत ज्यादा महत्वपूर्ण लगती है। सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति और समस्या का समाधान प्राप्त करना बड़ा लगता है और परमेश्वर के न्याय से, क्रोध से, दंड से बचने की आवश्यकता छोटी लगती है या फिर मनगढ़ंत बातें लगती है।

दूसरा कारण यह है की सामान्य तौर पे लोगों की रुचि अपने जीवन को इस संसार में बेहतर,सफल और सम्पन्न बनाने के लिए रुचि रखते हैं, उसके लिए मेहनत, परिश्रम करना चाहते हैं पर आत्मिक बातों में, यीशु के बलिदान स्वरूप पाप की माफ़ी के बारे में रुचि नहीं रखते हैं। 

भले ही कारण कुछ भी हो, या लोगों की प्रतिक्रिया कुछ भी हो, लोगों की मांग कुछ भी हो, पर एक सच्चे प्रचारक होने के नाते हमें केवल वही बताना है जो सत्य है। और सत्य यह है की सुसमाचार हमें केवल अनंत जीवन की प्रतिज्ञा देता है और इस संसार में क्रूस उठाकर के चलने की आज्ञा देता है। यही सच्चाई है और बहुत सारे लोग इससे असहज महसूस करते हैं। 1 कुरिन्थियों 15:1 में सुसमाचार में स्थिर रहने की बात की जा रही थी। सुसमाचार का कार्य हमारे जीवन में होने का एक सच्चा प्रमाण यह है की परमेश्वर हमें उस सुसमाचार में स्थिर बने रहने में सहायता भी करता है। इसीलिए हमें यह समझना है की भूत काल में हुए उस अनुभव, परमेश्वर का हमारे पापों को माफ़ करना हमारे लिए एक साधारण बात बनकर न रह जाए। यह जरूरी है की अब हम उस सुसमाचार में स्थिर रहें क्योंकि यह हमारे वर्तमान कल के उद्धार में बने रहने का प्रमाण है। हम लापरवाह नहीं हो सकते, हम वापस उसी सांसारिक मानसिकता में गिर नहीं सकते और न ही सांसारिक वस्तुओं को अपनी प्राथमिकता बना सकते हैं। हम उस झूठे आश्वासन में अपने जीवन को जी नहीं सकते जो हमें सांसारिक अभिलाषाओं की तृप्ति का आश्वासन देता है। 

हमारा आश्वासन आत्मिक है, अनंत जीवन का है, जीवित आशा का है। हमारा आश्वासन परमेश्वर के क्रोध, दंड और न्याय से मुक्ति का है जो यीशु के द्वारा संभव हुआ है। और अब हमें इस संसार में यीशु की उस प्रतिज्ञा को आशा के साथ थामते हुए  परीक्षा, समस्या, ताड़ना इत्यादि के मध्य स्थिर रहते हुए आगे बढ़ते जाना है। अब हमें भी अपने क्रूस को उठाकर इस संसार में चलना है। यही सुसमाचार की आज्ञा है और प्रतिज्ञा है।  

-Pastor Monish Mitra

सुसमाचार को ग्रहण करना


More Articles: Click Here



सुसमाचार को ग्रहण करना


            आज हम एक ऐसे समय में आ पहुँचें हैं जहाँ न केवल सुसमाचार के ऊपर आक्रमण हो रहा है पर सुसमाचार को गलत तरीके से प्रस्तुत भी किया जाता है। लोगों को खुश करने के लिए, अपने फायदे के लिए, लोभ और लालच के लिए बहुत सारे लोग आज एक मिलावटी सुसमाचार का प्रचार करते हैं।

इस लेख में सुसमाचार को प्रस्तुत करने से जुड़े कुछ मुख्य बातों को दर्शाया गया है।

1. सुसमाचार मनुष्य के उद्धार के निमित परमेश्वर का सन्देश है और इसीलिए सुसमाचार को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। यदि हमें परमेश्वर के साथ एक सही सम्बन्ध में जुड़ना है तो हमारे लिए सुसमाचार को ग्रहण करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। मनुष्य अपने कार्यों, बुद्धि, ज्ञान, अनुभव इत्यादि के आधार पे परमेश्वर के साथ सम्बन्ध को जोड़ नहीं सकता है। केवल समाचार को ग्रहण करने के द्वारा ही यह संभव हो सकता है।

2. सुसमाचार को ग्रहण करना सिर्फ एक प्रार्थना करना नहीं है की "यीशु, मेरे जीवन में आ”। भले ही यह वाक्यांश "सुसमाचार ग्रहण करना" सुनने में साधारण लगता है पर इसके साथ बहुत ही गहरी और गंभीर बात जुड़ी हुई है। जब हम सुसमाचार को ग्रहण करने की बात करते हैं तो हम प्रत्यक्ष रूप से उन सभी बातों को त्यागने की बात भी करते है, उन सभी चीज़ों से अलगाव की बात भी करते हैं जो सुसमाचार के विपरीत हैं। क्योंकि सुसमाचार की बातें सांसारिक विचारधारा के विपरीत हैं, तो जाहिर सी बात है की सुसमाचार को ग्रहण करने के द्वारा हमारे जीवन में अब तिरस्कार, निंदा, अपमान, क्लेश, लोगों के विद्रोह का अनुभव करना निश्चित है। सुसमाचार को ग्रहण करने का अर्थ अपने जीवन में खुद के स्वामित्व और अधिकारों को त्यागना और परमेश्वर के अधीनता में अपने आप को सौंपना है।

3. सुसमाचार को ग्रहण करने का अर्थ उन सभी विचारधाराओं से नाता तोड़ना है जो सांसारिक पैमानों में बहुमत आधारित हैं, ग्रहण योग्य हैं, आदरपूर्ण हैं और प्रचलित हैं। सुसमाचार को ग्रहण करना एक ऐसे मसीहा को अपना जीवन सौंपना है जिसपर 2000 साल पहले उस समय के धर्मगुरुओं और अधिकारिओं का विरोधी होने का इलज़ाम लगाया गया था और सजा सुनायी गयी थी और क्रूस पर चढ़ाया गया था। 

इन बातों को जानते हुए, अब, अपने जीवन की सभी सांसारिक अभिलाषाओं को त्यागकर इस मसीहा के दावों पर यकीन करना की वह जगत का उद्धारकर्ता है, हमारे पापों को माफ़ करने वाला है; यह सुसमाचार को ग्रहण करने का अर्थ है।

4. सुसमाचार को ग्रहण करने का अर्थ यह है की हम इस बात पर यकीन करते हैं की परमेश्वर से हमारा मिलाप केवल यीशु के द्वारा ही हो सकता है, हमारे पापों को धोने वाला केवल यीशु ही है। यीशु के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। सांसारिक विचारधारा के अनुसार यह एक मूर्खता है क्योंकि आधुनिक विचारधारा के अनुसार वही व्यक्ति बुद्धिमान है जो एक से अधिक विकल्प लेके चलता है। एक विकल्प अगर काम नहीं किया तो उनके पास दूसरा विकल्प मौजूद है। पर सुसमाचार में हमारा विकल्प केवल यीशु है।

5. सुसमाचार को ग्रहण करने का अर्थ यीशु की प्रभुता के अधीन होना है। हमें यह भी समझना है की यह एक गलत धरना है की यीशु को अपने जीवन का प्रभु मानकर ग्रहण करने के बाद ही यीशु हमारा प्रभु बन जाता है; वरन वास्तव में सच तो यह है की चाहे कोई यीशु से प्रेम रखे या फिर घृणा करें, वह तो सबका प्रभु है। 

फर्क इतना है की जो कोई इस प्रभु की अधीनता में आता है वह अनंत जीवन का भागीदारी होता है और जो कोई उस्से घृणा और बलवा करता है वह अनंत जीवन से वंचित रह जाता है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है की सुसमाचार को ग्रहण करने का कारण कोई लाभ को प्राप्त करना नहीं है पर इसका अर्थ यह है की अब हम यीशु की अधीनता में होकर, उसको स्वामी मानकर धार्मिकता की गुलामी में अपना जीवन व्यतीत करेंगे।

6. सुसमाचार को ग्रहण करने का अर्थ यह है की हम इस बात को समझें की प्रभु होने के नाते यीशु उन लोगों से कोई भी मांग कर सकते हैं जो उसके प्रभुत्व का अंगीकार करते हैं। इसीलिए प्रचारकों को यह ध्यान देना चाहिए की वह सुसमाचार का सन्देश सुनने वालों से सुसमाचार के हर एक पहलू को बताएं और किसी बात को न छुपाएं। सुसमाचार के सन्देश में जोखिम और खतरे से भरे हुए पहलू को छुपना नहीं चाहिए। परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा ही कोई मनुष्य इस सुसमाचार को, उसके संपूर्ण पहलुओं को सुनकर और समझकर सुसमाचार को ग्रहण करता है।

7. सुसमाचार को ग्रहण करने का अर्थ मसीह केंद्रित जीवनशैली जीना है। इसका अर्थ यह है की अब हर एक बातों का केंद्र मसीह है और मसीह को केंद्रित करते हुए हमें अपने जीवन के हर एक निर्णय को लेना चाहिए। अब सुसमाचार हमारे हर एक क्षेत्र को छूता है और हमें एक नया दृष्टिकोण और सन्दर्भ देता है जिसके आधार पर हम अपने जीवन को जीते हैं और वह मसीह है। मसीह अब हमारे जीवन का छोटा या बड़ा हिस्सा नहीं पर वह हमारे संपूर्ण जीवन को अपने अधीन ले लेता है।

8. सुसमाचार को ग्रहण करने का अर्थ यह समझना है की मसीह को ग्रहण करने से पूर्व का हमारा जीवन, उसकी उपलब्धियाँ, उससे जुड़े हुआ सम्मान, आदर, भली और अच्छी बातें और सब कुछ हमारी व्यर्थता का स्मारक है। ऐसा नहीं है की हमारे जीवन में अधिकतर बातें अच्छी थीं और जो थोड़ी बातों की कमी थी उसे यीशु ने पूरा कर दिया। ऐसा नहीं है की हमारे जीवन की अधिकतर बातों के श्रेय का कारण हम खुद हैं और बाकी बातों का श्रेय हम यीशु को दे देते हैं। सच्चाई तो यह है की हमारी उपलब्धियाँ, सम्मान, आदर, भली और अच्छी बातों के बावजूद भी हम परमेश्वर के क्रोध के संतान थे पर यीशु की महान दया के कारण हम परमेश्वर के संतान बन पाए हैं।

निष्कर्ष:- अगर आप एक सुसमाचार प्रचारक हैं, पासवान हैं, विश्वासी हैं तो आप इन बातों का ध्यान रखें। जब भी हमें लोगों तक या लोगों के मध्य सुसमाचार को सुनाने का या समझाने का मौका मिले, हम बिना किसी मिलावट के सुसमाचार को उसकी संपूर्ण सत्यता के साथ प्रचार करें क्यों की सुसमाचार आप में ही इतना सामर्थी है की वह विश्वास करने वालों के लिए उद्धार के निमित परमेश्वर का समर्थ है।

1 Corinthians 2:2, 15:19, Acts 2:36, Colossians 1:15-17, 1 Timothy 2:5, Philippians 3:4-8, Romans 3:23-24, Ephesians 1:18-22, 2:1-7.

-Pastor Monish Mitra

सुसमाचार को जानना और बताना - 1 Corinthians 15:1


              यह भले ही काम शब्दों में बताया गया है पर यह पर्याप्त है जिससे की हम अपनी विश्वास की दौड़ को पूरी करके अपने स्वर्गीय घर तक पहुंच सकते हैं। सुसमाचार एक छोटी बात नहीं है, यह कोई परिचय नहीं है, मसीह जीवन का एक छोटा हिस्सा नहीं है जिसे हम नज़रअंदाज़ करें। सुसमाचार संपूर्ण मसीहत का सन्देश है और इसीलिए एक मसीह के लिए इस सत्य को समझना, जानना और इसपर अध्ययन करना अपने संपूर्ण जीवन का कार्य और कर्तव्य बन जाता है। भले ही और भी ऐसी चीज़ें संसार में हैं जिसके बारे में जानना जरूरी है, मसीह जीवन से जुड़े हुए भी और भी विषय हैं जिसके बारे में हमें जानना चाहिए लेकिन सुसमाचार सबसे बड़ा और विशाल विषय है जो हमारे जीवन के लिए सबसे जरूरी है क्योंकि यह हमारे उद्धार का सन्देश है। 

सुसमाचार के बारे में जानना काफी नहीं है; हमें सुसमाचार के ज्ञान में बढ़ना भी चाहिए। कुरिन्थ की कलीसिया सुसमाचार को सुन चुकी थी और जानती थी, लेकिन प्रेरित पौलुस उसी सुसमाचार के ज्ञान में उनको बढ़ाना चाहते थे और इसीलिए उनको दुबारा सुसमाचार के बारे में लिख रहे थे। सुसमाचार में परमेश्वर के महिमा का खज़ाना भरा हुआ है और हम जीवन भर इसी महिमा के भेदों को, ज्ञान को, बातों को, प्रकाशन को खोजते जाते हैं, पाते जाते हैं, उससे सीखते जाते हैं और यह एक अद्भुत बात है। हमारे पास ऐसे बहुत साधन होंगे जिसे पढ़के हमने सुसमाचार में परमेश्वर की महिमा की बातों को जाना है और अपने आत्मिक जीवन की यात्रा में बहुत कुछ सीखा है। फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा की परमेश्वर की महिमा का धन इस सुसमाचार में इतना गहरा और ज्यादा है की मानो हम एवरेस्ट पहाड़ की तलहटी पर ही हैं। भले ही हमारे पास विकल्प के तौर पे मसीह जीवन से जुड़े हुए ऐसे विषय हैं जो बहुत ज़रूरी और गंभीर हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए है की इन सब का आधार और बुनियाद सुसमाचार है। सुसमाचार वह आधारभूत विषय हैं जिसपर सब बातें टिकी हैं।    

इतिहास में हम ऐसे लोगों को पाते हैं जिन्होंने सुसमाचार की एक झलक को पाने के बाद अपना संपूर्ण जीवन सुसमाचार के सेवकाई के लिए दे दिया और परमेश्वर के राज्य की सेवकाई को एक अद्भुत लगन और समर्पण के साथ किया। भले ही वह सब एक दूसरे के साथ सब बातों में सहमत नहीं थे पर उन सब में जो समानता थी वह यह था की उनका जीवन सुसमाचार के प्रति समर्पित था।  

सुसमाचार का अर्थ है भला सन्देश / शुभ सन्देश और इसीलिए सुसमाचार पर विश्वास करने वालों को एवंजलीकल कहा जाता है। सुसमाचार हमारा पाठ्यक्रम है और इसपर ही हमारा जीवन आधारित है। 

अकसर लोगों के अंदर परमेश्वर और मसीह के प्रति एक धुन को उजागर करने के लिए प्रचारक मंच पर आके संगीत, भावनात्मक बातें, प्रभावशाली वक्ताओं का इस्तेमाल करते हैं लेकिन जितनी तेज़ी से लोगों में वह जोश भरा जाता है वह उतनी ही तेज़ी से निकल भी जाता है। वह भूलने लगते हैं की परमेश्वर और मसीह के प्रति धुन को उजागर करना केवल सुसमाचार के सत्य के द्वारा ही हो सकता है और तभी वह धुन लोगों में बने रह सकता है। प्रेरित पौलुस असाधारण ज्ञान, दान और वरदान से भरे हुए व्यक्ति थे। फिर भी उन्होंने अपनी सेवकाई का आधार विश्वासयोग्य सुसमाचार प्रचार पर आधारित किया। उनका लक्ष्य भी केवल यही था की वह लोगों तक क्रूस की कथा को लेके जाएँ। वह सुसमाचार और उसके प्रचार के बारे में समर्पित थे, उसे वह अपनी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी समझते थे। 

आज, जब हम अपने चारों तरफ अन्य सुसमाचार प्रचारकों को देखते हैं हम पाते हैं की हमारे व्यक्तित्व अलग हो सकते हैं और इसीलिए कई बार हम आपस में भिन्नता को देखते भी हैं। पर जैसे ही हम सुसमाचार के बात करने लगते हैं, सुसमाचार का प्रचार करने लगते हैं तब हम उस गंभीरता में आ जाते हैं, अनंतकाल के उस दृष्टिकोण से हम अपनी बात को प्रस्तुत करते हैं और इसमें हम लोगों में कोई भिन्नता नहीं हो सकती है। सुसमाचार का वह धुन हमें निडर बना देता है, गंभीर बना देता है और लक्ष्य केंद्रित बना देता है।      

हमें यह नहीं भूलना चाहिए की अविश्वासियों के अपरिवर्तित ह्रदय की मांग और सुसमाचार के सत्य में बहुत अंतर है। इसीलिए उनकी मांग के अनुसार हम सुसमाचार को प्रस्तुत नहीं कर सकते क्योंकि उनकी मांग को पूरा करने से हम केवल उनके अपरिवर्तित ह्रदय की अभिलाषाओं को पूरा करते हैं और उनके अपरिवर्तित मन को उत्तेजित करते हैं। जब तक पवित्र आत्मा लोगों को कायल नहीं करता, पुनर्जीवित नहीं करता उनका रवैया सुसमाचार के प्रति घृणा और अरुचि का रहेगा। वह संसार के आनन्द को चुनेंगे और सुसमाचार को ठुकरायेंगे। इसीलिए हमें उनके अनुसार और उनकी इच्छा के अनुसार, उनको जैसे अच्छे लगता है वैसे सुसमाचार को बदलकर कहने की ज़रूरत नहीं है। भले ही वो सुसमाचार को नकारेंगे और वह भले ही सांसारिक सोच में हैं, फिर भी हमें सुसमाचार को वास्तविक रूप में प्रस्तुत करना चाहिए ताकि जब पवित्र आत्मा उनके जीवन में कार्य करेगा तब वह समझेंगे की सुसमाचार क्या है, वह उसे चखेंगे और जानेंगे की परमेश्वर कितना भला है। जब हम सुसमाचार को लुभावना बनाने के लिए, रोचक बनने के लिए या फिर समय के हिसाब से लोकप्रिय बनाने के लिए बदल देते हैं तो हम सुसमाचार की समर्थ पर प्रश्न उठा रहे हैं और उसकी समर्थ को नहीं समझ रहे हैं। हम सुसमाचार के समर्थ का समझौता ऐसी किसी चीज़ के साथ नहीं कर सकते हैं। सुसमाचार अपने आप में सामर्थी है और उसकी समर्थ पर्याप्त है।

Pastor - Monish Mitra

More Hindi Articles - Click Here

Should we use a printed Bible or a Digital Bible?


There are certain people who think that the printed Bible is Holy and therefore it should only be used in that form. The digital form of Bible when used in phones cannot be called as holy and it is not as effective as the printed Bible. When we use digital Bible in the Church, meetings, personal reading etc we get distracted by notifications, messages etc and therefore using digital Bible is not a correct and proper choice. You can also mark your favorite passages and keep short notes in the printed Bible. 

On the other hand, there are certain people who think that digital Bible is free to download, can be easily shared with others, can be carried anywhere, it can be used anywhere without any problem. Therefore, it’s a better option than the printed Bible which is often bulky in size and it’s not practically possible to carry it everywhere.

These arguments have led people to categorize people as holy & unholy, mature & immature, good & bad etc just on the fact that people use a printed version or a digital version of the Bible.

Here are few thoughts on this issue….

First of all, the printed version Bible what we have today was never in that form from the beginning. It wa​​s first inscribed by God on stone, was kept in the Ark of the Covenant and the Israelites were commanded to put the Word of God in their heart.

Secondly, with the addition of Mosaic Laws, Writings of the Prophets, Psalms, Wisdom Books etc. they were written on skins and papyrus which were then saved as scrolls.

Thirdly, even in the early Church the use of Mosaic Laws, Prophetical writings and later the Epistles and Gospel writings were preserved in form of scrolls. Until 5th century there was no concept of proper canons when the books were canonized.

            The important aspect throughout this time was never about carrying the scriptures in some written format like scrolls, but it was about having the Word of God in the heart. Deut. 4:9, Prov. 6:21, Psalms 119:11. All the scrolls were preserved in sacred places and were used for worship and for references during various occasions.

With time and development of science & technology the printed form of the Word of God has been developed and we have the privilege to use it today. To carry the printed version of the Bible while going to the Church, preaching the Word, using it during various meetings or keeping in the self does not necessarily make a person a follower of the Word of God. At the same time using a digital form doesn't make a person an unbeliever & unholy.

A person can carry the Bible, read the Bible yet may not follow the Bible. A person who uses a digital version cannot be necessarily branded as an unholy & disobedient Christian.

We never thought time will come, we will have online prayer services, worships through digital medium, online teaching, preaching and fellowship. We must remember that the form will change, but our purpose must not change. Each one of must prayerfully, thoughtfully decide how best he can use the available resources whether printed or digital for his own edification and spiritual growth.

Amen!

Pastor Monish Mitra

More Articles:

क्या आप एक मूर्ख या बुद्धिमान स्त्री हैं?



याकूब 3:14-17 में, हमें स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि एक मूर्ख और एक बुद्धिमान औरत कैसी होती है। दुःखद रूप से, हमारे इस संसार में बहुत सी मूर्ख औरतें हैं। वे परमेश्वर को नहीं जानती हैं और न ही उसकी आराधना करना चाहती हैं। वे अपनी खुद की ईश्वर बनना, अपने खुद के नियम बनाना और ऐसा जीवन जीना चाहती हैं जो उनको संतुष्ट करे। वे परमेश्वर की आज्ञा मानने की बजाय, अपनी इच्छानुसार चलने के लिए परमेश्वर के वचन को भी गलत अर्थों में प्रस्तुत कर देती हैं।

पर यदि तुम अपने अपने मन में कड़वी डाह और विरोध रखते हो, तो सत्य के विरोध में घमण्ड न करना, और न तो झूठ बोलना। यह ज्ञान वह नहीं, जो ऊपर से उतरता है वरन सांसारिक, और शारीरिक, और शैतानी है। इसलिये कि जहां डाह और विरोध होता है, वहां बखेड़ा और हर प्रकार का दुष्कर्म भी होता है। (याकूब 3:14-16)

1. मूर्ख स्त्रियाँ "कड़वी डाह/ईष्या" रखती हैं जैसाकि याकूब ने इसके संबंध में कहा है। जब मैं इंस्टाग्राम पर अपने बाथटब (नहाने का टब) की फोटो दिखाती हूँ तो वे स्त्रियाँ टिप्पणी (कमैंट्) करेंगी, "मैं निश्चित रूप से ऐसे बाथटब को बर्दाश्त नहीं कर सकती हूँ!" आज महिलाओं के बीच अत्यधिक कड़वी डाह/ईष्या है। "वे लालसा करती हैं और पाती नहीं।" इसीलिये परमेश्वर हमें जो हमारे पास है, उसी में संतुष्ट रहने की आज्ञा देता है। यदि आप अपने मन में किसी के रूप, वज़न, पति, घर, स्वास्थ्य या यहां तक कि बाथटब के लिए भी अत्यधिक डाह/ईष्या रखती हैं तो आप एक मूर्ख स्त्री हैं।

2. मूर्ख स्त्रियाँ "झगड़े" उत्पन्न करती हैं। वे दूसरों की झूठी निंदा करने व लोगों के बीच झगड़े/विवाद उत्पन्न कराने से आनंदित होती हैं। उनके घरों में शांति कम रहती है। वे स्वयं को सही ठहराने पर अड़ी रहने और अपने ही मार्ग को प्राप्त करने के कारण, अपने घरों को अपने ही हाथों से ढा देती हैं। वे अपने पतियों की अधीनता में रहने से इंकार करती हैं, परंतु इसके विपरीत बलपूर्वक अपना नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश करती हैं।

3. मूर्ख स्त्रियाँ "सांसारिक" होती हैं। सांसारिक स्त्रियाँ इस पृथ्वी की वस्तुओं से संबंध रखती हैं जिनमें घृणित और बुरी चीज़ें शामिल हैं। वे सांसारिक राज्य की स्त्रियाँ हैं न कि स्वर्गीय राज्य की, इसीलिए वे अपना जीवन केवल यहीं के लिए और वर्तमान के लिए और उन चीजों के लिए जीती हैं जिन्हें वे अपने लिए प्राप्त कर सकती हैं। "वे अपनी लज्ज़ा की बातों पर घमण्ड करती हैं" (फिलिप्पियों 3:19)। वे अपना धन स्वर्ग की बजाय पृथ्वी पर इकट्ठा करती हैं। वे संसार की मित्र और परमेश्वर की शत्रु होती हैं। वे उस प्रकार के कपड़े पहनती और व्यवहार करती हैं जो उनको भाता है, न कि प्रभु परमेश्वर को।

4. मूर्ख स्त्रियाँ "कामुक" होती हैं। 1828 वैबस्टर डिक्शनरी के अनुसार, "वे अपने भाव या पहचान की संतुष्टि के प्रति समर्पित हैं; जो इच्छाओं के भोग के लिए दे दी गई हैं।" वे इसकी परवाह किए बिना कि यह उनके स्वयं के लिए और दूसरों के लिए कितना हानिकारक हो सकता है, अपने आपको अपनी सारी इच्छाओं को सौंप देती हैं। वे निर्लज्ज/उत्तेजित करने वाले(सैक्सी) कपड़े पहनती हैं जो दूसरी पत्नियों के पतियों को उत्तेजित करते हैं। वे अपने आपको बिना सोचे-समझे, अत्यधिक खाने, शराब पीने और अनैतिक यौन संबंध बनाने के लिए सौंप देती हैं।

5. मूर्ख स्त्रियाँ शैतानी होती हैं। "वे दुष्ट(शैतान) के लक्षणों को ग्रहण करने वाली; क्रूर; बहुत बुराई करने वाली और हानिकर; द्वेष करनेवाली होती हैं।" वे उस प्रकार की स्त्रियाँ नहीं होती हैं जिनकी मौज़ूदगी में आप रहना चाहेंगे क्योंकि वे विनाश करने से प्रसन्न रहती हैं। वे शैतान की प्रतिनिधि हैं और उसके कार्यों को कर रही हैं जोकि बाइबल में ईज़ेबेल का चरित्र है।

6. मूर्ख स्त्रियाँ "गड़बड़ी/भ्रम और हर बुरे काम" को उत्पन्न करती हैं। क्या आप जानना चाहते हैं कि अपनी संस्कृति या माहौल में इतनी गड़बड़ी(अस्तव्यस्तता) क्यों है? मूर्ख महिलाओं ने, परमेश्वर द्वारा उनके लिए ठहराई गई भूमिका में संतुष्ट न होने के कारण, अपने परिवारों को तबाह कर दिया है परंतु इसके विपरीत वे पुरुषों की भूमिका का पीछा करती हैं जिसके परिणामस्वरूप उनकी शादियाँ और बच्चे भी तबाह हो जाते हैं। इसने हमारी संस्कृति या माहौल में शासन प्रणाली से लेकर परिवार तक हर स्तर पर गड़बड़ी को पैदा कर दिया है। बच्चों को सिखाया जाता है कि वे जिस लिंग(पुरुष या स्त्री) को चाहते हैं उसे अपना सकते हैं! मैं इस बारे में निश्चित नहीं हूँ कि इससे अधिक गड़बड़ी और बुराई और क्या हो सकती है।

7. बुद्धिमान स्त्रियाँ पवित्र, शांतिपूर्ण, सभ्य, प्रार्थना/विनती के प्रति सहज, दया और अच्छे फलों से भरी, बिना भेदभाव, बिना ढोंग/कपट के और नम्र होती हैं (याकूब 3:17)। "भली पत्नी कौन पा सकता है? क्योंकि उसका मूल्य मूंगों से भी बहुत अधिक है" (नीतिवचन 31:10)। इस प्रकार की बुद्धिमान स्त्रियाँ सचमुच दुर्लभ हैं। वे हर प्रकार की बुराई के बीच रहने से बचती हैं। वे अपने घरों को भी इससे बचाती हैं। वे सभी पुरुषों के साथ शांति का पीछा करती हैं। वे इस बात को जानते हुए कि हम सभी के जीवनों में संघर्ष होते हैं, लोगों के साथ विनम्र होती हैं और इसलिए उनपर दया और अनुग्रह बरसाती हैं।

8. वे कलीसियाओं में अगुआ और शिक्षक नहीं होती हैं। नहीं, बल्कि वे शांत और पूरी अधीनता के साथ सीखती हैं। वे सादगी से कपड़े पहनती हैं और अच्छे कामों से अपने आपको संवारती हैं और अपने पतियों के अधीन रहती हैं। वे घर को संभालने के साथ, यदि वे ऐसा करने में समर्थ हैं, बच्चों को जन्म देने और उनका पालन पोषण करने से प्रेम करती हैं। वे परमेश्वर द्वारा निर्धारित अपनी भूमिका से प्रेम करती हैं और एक स्त्री होने के लिए उसकी धन्यवादी होती हैं। उनमें पुरुषों से मुकाबला करने और उनके जैसे बनने की कोई इच्छा नहीं होती। वे एक स्त्री को जैसा उचित है, वैसा व्यवहार करने वाली बनना चाहती हैं जो अपने प्रभु और उद्धारकर्ता परमेश्वर की आज्ञा मानने और उसके लिए जीवन जीने के द्वारा उससे प्रेम करती हैं।

तुम में ज्ञानवान और समझदार कौन है? जो ऐसा हो वह अपने कामों को अच्छे चालचलन से उस नम्रता सहित प्रगट करे जो ज्ञान से उत्पन्न होती है। याकूब 3:13

Credit: Lori Alexander(Transformed wife)
Translated by Shivani kandera

Should I quit my secular Job?

Should I quit my secular job and do full time ministry because secular job is waste of time and un-spiritual.

THE TWO MISTAKES

1. The first mistake some people make is that they tend to link ‘secular job’ as disobedience to God and link ‘doing ministry’ as obedience to God. One of the reasons behind this assumption is maybe because they heard testimonies of people who immediately left their secular jobs and joined ministry after becoming a believer. They argue that people in secular job are wasting time because they are not directly involved in the great commission. This is dangerous because such people leave the ‘secular’ job that God has given them based on a false assumption of obedience. At the same time, they put obedient people in the category of disobedient. It makes every Christian who has a secular job as ‘disobedient’ which is a very unfair statement. In other words, such people have an assumption that if we continue in our secular job after becoming a believer, if we don’t leave that secular job and get involved in mission then it is an act of disobedience. 

Such an argument is invalid because in the New Testament, it is clear that the Apostles did not teach that all Christians should leave their ordinary employment. Apostle Paul gives us a principle in 1 Corinthians 7:20. He says that “Each one should remain in the condition in which he was called”. When we are called to be a Christian, when we are born again there has to be visible radical change in your life, we need to display the fruit of the Spirit, walk in the Spirit, hate sin, overcome sin etc. In the immediate context Apostle Paul says that it is not mandatory for a man to get circumcised if he isn’t circumcised and vice-versa, but he should remain in the same condition in which he was called because these things do not matter in terms of obedience. Therefore, applying the same principle we can conclude that it is not mandatory for someone to leave his job & join ministry because it is not a measure for obedience after becoming a believer. A person does not have to leave his job in order to be a faithful & obedient Christian, according to those principles. However, if someone wants to quit his job after becoming a believer it can be his personal decision and choice. The person should not categorize others who are continuing in their secular jobs as disobedient.

2. The second mistake which some people make is that they tend to think that quitting the secular job and joining a Christian Organization or doing full time ministry is the proof that you are more devoted to Christ and continuing in the secular job is a proof that you are selfish. However, it is absolutely possible that even after being involved in full time ministry or working in a Christian organization a person can be least caring about the people around him. He would not display the fruit of Spirit with fellow believers in the Local Church and people around him. At the same time, it is possible that a person who is employed in a secular job exhibit the fruit of the Spirit and thereby win people to Christ. 

Therefore, we should not assume that leaving the job & joining ministry is the proof of a person’s devotion for Christ.

THE TWO EXHORTATIONS

1. As mentioned in the beginning, there are true testimonies where God places a burning desire, a burden and a restlessness in the heart of people for His mission. They quit their jobs, move to a new location, become missionaries and win people for the Kingdom of God. That burning desire, burden and restlessness in the heart etc are one of the many means/ways/parts by which God works in the lives of some people to lead them to quit their jobs, change their location and move in to a new place in order to do ministry. At the same time, we should remember that it is not a mandatory system by which God has to work in everyone’s life and those who didn’t experience such things cannot be used by God. Having a burning desire, burden and restlessness in the heart etc can definitely be ways by which God moves people but even without these people are still used by God as they stay in their respective vocations &  jobs even after becoming a believer.

2. Remember that isolation is not a necessary sign of spirituality. Most people try to figure out things by themselves regarding ministry, mission etc and believe in keeping things between themselves and God. At the end they get confused, irritated, develop bitterness towards other fellow believers and times towards God also. What is actually needed is that we need to be more connected in a fellowship of believers, where other believers can discern our gifts, talents, passion, maturity and in that way confirm God’s call, will, plan and desire in our life. That’s the way it should happen. That’s a healthy way we understand God’s call on our life; as a member of a body of Christ using our gifts in relationship to other people.

Author: Pastor Monish Mitra


ਕੀ ਬਪਤਿਸਮਾ ਲੈਣ ਦੇ ਲਈ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ? ਕੀ ਮਸੀਹ ਤੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਕਰਨਾ ਕਾਫ਼ੀ ਨਹੀਂ ਹੈ?

Baptism by Immersion | My nephew was baptized today. I was r… | Flickr

   ਅੱਜ ਸਾਡੇ ਸਾਹਮਣੇ ਜੋ ਚੁਣੌਤੀ ਹੈ, ਉਹ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣਾ ਅਤੇ ਬਪਤਿਸਮਾ ਲੈਣਾ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਲਈ ਸਿਰਫ ਇੱਕ ਰਸਮੀ ਗੱਲ ਬਣ ਗਈ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਲਈ ਉਹ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਮੈਂਬਰ ਹੋਣਾ ਅਤੇ ਬਪਤਿਸਮਾ ਲੈਣ ਨਾਲ ਸੰਬੰਧਿਤ ਜਵਾਬਦੇਹੀ ਅਤੇ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਨੂੰ ਨਜ਼ਰ - ਅੰਦਾਜ਼ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਮਸੀਹ ਕਲੀਸਿਆ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਦੁਲਹਨ (ਲਾੜੀ) ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਦੇਖਦਾ ਹੈ। "ਜਿਵੇਂ ਮਸੀਹ ਨੇ ਵੀ ਕਲੀਸਿਆ ਨਾਲ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਉਸ ਦੇ ਲਈ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਭਈ ਉਸ ਨੂੰ ਜਲ ਇਸ਼ਨਾਨ ਤੋਂ ਬਾਣੀ ਨਾਲ ਸ਼ੁੱਧ ਕਰਕੇ ਪਵਿੱਤਰ ਕਰੇ। ਅਤੇ ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਲਈ ਇਹੋ ਜਿਹੀ ਪਰਤਾਪਵਾਨ ਕਲੀਸਿਆ ਤਿਆਰ ਕਰੇ ਜਿਹ ਦੇ ਵਿੱਚ ਕਲੰਕ ਯਾ ਬੱਜ ਯਾ ਕੋਈ ਹੋਰ ਅਜਿਹਾ ਔਗੁਣ ਨਾ ਹੋਵੇ ਸਗੋਂ ਉਹ ਪਵਿੱਤਰ ਅਤੇ ਨਿਰਮਲ ਹੋਵੇ ( ਅਫ਼ਸੀਆਂ. 5:25-27)। ਵਿਸ਼ਵਾਸੀਆਂ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਅਸੀਂ ਹੁਣ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਹਾਂ, ਇੱਥੇ ਹੁਣ ਸਾਨੂੰ ਇੱਕ - ਦੂਸਰੇ ਦੀ ਸੇਵਾ ਕਰਨ ਦੇ ਲਈ, ਪ੍ਰੇਮ ਰੱਖਣ ਦੇ ਲਈ ਦਾਨ - ਵਰਦਾਨ ਦਿੱਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਤਾਂਕਿ ਕਲੀਸਿਆ ਦੀ ਦੇਹ ਦੀ ਉੱਨਤੀ ਹੋ ਸਕੇ ( 1 ਕੁਰਿੰਥੀਆਂ. 1:7-28; 14:12)। ਇਹ ਕਲੀਸਿਆ ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਇਮਾਰਤ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਬਲਕਿ ਇਸ ਨੂੰ ਪਰਮੇਸ਼ੁਰ ਦੇ ਘਰਾਣੇ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਸੰਬੰਧਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ ਜੋ ਰਸੂਲਾਂ ਅਤੇ ਨਬੀਆਂ ਦੀ ਨੀਂਹ ਉੱਤੇ ਬਣੇ ਹੋਏ ਹੋ ਜਿਹ ਦੇ ਖੂੰਜੇ ਦਾ ਪੱਥਰ ਆਪ ਮਸੀਹ ਯਿਸੂ ਹੈ ( ਅਫ਼ਸੀਆਂ. 2: 19-20)।
       
ਇਹ ਉਹ ਘਰਾਣਾ ਹੈ, ਪਰਿਵਾਰ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਝੁੰਡ ਹੈ ਜਿਹਨਾਂ ਨੇ ਉਸ ਮਹਾਨ ਆਗਿਆ ( ਖੁਸ਼ਖ਼ਬਰੀ) ਤੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਕੀਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਹੁਣ ਇਹ ਉਹ ਸਥਾਨ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਉਹ ਜਵਾਬਦੇਹੀ ਅਤੇ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਦਾ ਅਭਿਆਸ/ ਪਾਲਣ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਹੈ ਅਤੇ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਹੋਣ ਦੀ ਭੂਮਿਕਾ ( ਗਲਾਤੀਆਂ. 6:2; ਕੁਲੁੱਸੀਆਂ. 3:16; ਅਫ਼ਸੀਆਂ. 5:19 ; 1 ਪਤਰਸ. 4: 10) ਵਿੱਚ ਦੱਸਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਅੱਜ ਕੱਲ ਲੋਕ ਇਹਨਾਂ ਭੂਮਿਕਾਵਾਂ ਨੂੰ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦੇ ਬਾਹਰ ਸਮਾਜਿਕ ਸੇਵਾ ਅਤੇ ਗੈਰ ਸਰਕਾਰੀ ਸੰਗਠਨਾਂ ਦੇ ਮਾਧਿਅਮ ਤੋਂ ਦਰਸਾਉਣਾ ਆਖਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਵਿੱਚ ਇਹਨਾਂ ਨੂੰ ਪਾਲਣ ਕਰਨ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਨੂੰ ਬਿਲਕੁਲ ਨਜ਼ਰ ਅੰਦਾਜ਼ ਕਰਦੇ ਹਨ।

         ਜਦੋਂ ਅਸੀਂ ਬਪਤਿਸਮਾ ਦੇ ਬਾਰੇ ਗੱਲ ਕਰਦੇ ਹਾਂ, ਤਾਂ ਇਹ ਕਦੇ ਵੀ ਇੱਕ ਨਿੱਜੀ ਅਤੇ ਵੱਖਰਾ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਉਸ ਨਵੇ ਜਨਮ ਅਤੇ ਪਰਿਵਰਤਨ ( ਬਦਲਾਵ) ਦਾ ਇੱਕ ਬਾਹਰੀ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਹੈ ਜੋ ਸਾਡੇ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਹੋਇਆ ਹੈ ( ਰੋਮੀਆਂ. 6:3-6), ਪਰ ਇਹ ਬਾਹਰੀ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ, ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਰੂਪ ਨਾਲ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਅਜਿਹਾ ਕਰਨ ਨਾਲ ਇਹ ਵਿਅਕਤੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਕਲੀਸਿਆ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀ ਅਧੀਨ ਹੋਣ ਨੂੰ ਦਰਸਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਖੁਦ ਨੂੰ ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀ ਜਵਾਬਦੇਹ ਬਣਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਤਾਂਕਿ ਉਹ ਹੁਣ ਆਪਣੀ ਆਤਮਿਕ ਚਾਲ ਵਿੱਚ ਢਲ ਸਕੇ; ਨਿਰਦੇਸ਼ਿਤ ਹੋ ਸਕੇ, ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਹੋ ਸਕੇ, ਅਨੁਸ਼ਾਸਤ ਹੋ ਸਕੇ ਜਿਵੇਂ - ਜਿਵੇਂ ਉਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵਚਨ ਦੀ ਸਾਂਝ ਅਤੇ ਨਿੱਜੀ ਸਿੱਖਿਆ ਦੇ ਅਧੀਨ ਕਰਦਾ ਹੈ ( 2 ਤਿਮੋਥਿਉਸ. 3:16-17)। ਇਹ ਔਖਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਲਈ ਲੋਕ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਇੱਕ ਅਲੱਗ, ਬਿਨਾਂ ਜਵਾਬਦੇਹੀ ਦਾ ਮਸੀਹੀ ਜੀਵਨ ਜੀਣ ਦੇ ਬਹਾਨੇ ਲੱਭਦੇ ਹਨ ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਹੁਣ ( 1 ਯੂਹੰਨਾ. 1:9) ਦੇ ਹਵਾਲੇ ਤੋਂ ਜੋ ਚਾਹੇ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਭੱਜ ਸਕਦੇ ਹਨ। ਅਜਿਹੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਲਈ ਅਧੀਨ ਹੋਣਾ, ਜਵਾਬਦੇਹ ਹੋਣਾ ਅਤੇ ਅਧਿਕਾਰ ਦੇ ਅਧੀਨ ਹੋਣਾ ਬਾਈਬਲ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਨਹੀਂ ਹਨ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਲਈ ਨਵਾਂ ਨੇਮ ਤਾਂ ਸਿਰਫ ਦਯਾ ਅਤੇ ਪਿਆਰ ਦੇ ਬਾਰੇ ਵਿੱਚ ਹੀ ਹੈ।

        ਇਸ ਲਈ, ਸਾਨੂੰ ਇਹ ਸਮਝਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਕਿ ਬਪਤਿਸਮਾ ਸਿਰਫ ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਹ ਇੱਕ ਨਿੱਜੀ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਹ ਇੱਕ ਰਸਮੀ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇਹ ਮਸੀਹੀ ਬਣਨ ਦੇ ਲਈ ਸਿਰਫ ਇੱਕ ਮਾਪਦੰਡ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਹ ਇੱਕ ਫ਼ੈਸਲਾ ਹੈ ਜਿਸ ਨੂੰ ਅਸੀਂ ਯਿਸੂ ਮਸੀਹ ਦੀ ਮੌਤ ਅਤੇ ਜੀ ਉੱਠਣ ਦੇ ਮਹੱਤਵ ਨੂੰ ਸਮਝਦੇ ਹੋਏ ਕਰਦੇ ਹਾਂ, ਨਜ਼ਦੀਕੀ ਕਲੀਸਿਆ ਦੀ ਅਧੀਨਤਾ ਵਿੱਚ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸਵੈ ਇੱਛਾ ਨਾਲ ਪੇਸ਼ ਕਰਨ ਦੇ ਮਹੱਤਵ ਨੂੰ ਸਮਝਦੇ ਹੋਏ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਜਿਸਦਾ ਸਿਰ ਯਿਸੂ ਮਸੀਹ ਹੈ ਅਤੇ ਸਵੈ ਇੱਛਾ ਨਾਲ ਖੁਦ ਨੂੰ ਪਰਮੇਸ਼ੁਰ ਦੇ ਘਰਾਣੇ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀ ਅਧੀਨ ਕਰਨਾ ਹੈ ਤਾਂਕਿ ਮਸੀਹ ਦੀ ਦੇਹ ਵਿੱਚ ਸੇਵਾ ਦੇ ਕੰਮ ਦੇ ਲਈ ਸਜਾਏ ਜਾ ਸਕੇ।

Author: Pastor Monish Mitra
Translation: Sister Kiran Sona

For English Click Here
हिंदी के लिए यहाँ क्लिक करें